Monthly Magzine
Sunday 19 Nov 2017

अवकाश के बाद


 संतोष झांझी
डी-7, स्ट्रीट-12,
आशीषनगर (पश्चिम)
भिलाईनगर (छ.ग.) 490006
मो. 09300211142

फूलों के तीन-चार हार, तीन-चार गुलदस्ते, गिफ्ट में मिला ट्राली बैग, इलेक्ट्रानिक वॉल क्लॉक, दीक्षित जी समेटने लगे। फेयरवेल पार्टी खत्म हो चुकी थी। साथियों के वक्तव्य और खुद वक्तव्य देते-देते वो कई बार भावुक हो गए और कई बार अपनी उपलब्धियां और तारीफ दूसरों के मुंह से सुनकर उनका चेहरा खुशी से दमकने लगा। शेष बचे उनके दो खास साथियों और चपरासी ने गिफ्ट में मिला सामान उनके स्कूटर पर रखवाकर हाथ जोडक़र उन्हें विदा दी। घर की तरफ बढ़ते हुए उन्हें लगा कि जैसे वो बहुत थक गए हों। जैसे वो आज साठ साल के नहीं अस्सी साल के हो गये। घर भी जैसे दस किलोमीटर नहीं पचास किलोमीटर दूर हो गया हो।
वो घर पहुंचे तो देखा मीरा गेट पर बनी सीमेंट की सीट पर बैठी उनका रास्ता देख रही थी। दोनों के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गई। अन्दर से दोनों बेटे बहुएं बच्चों सहित दौड़े आए और आनन-फानन में स्कूटर का सारा सामान उतारकर अंदर ले गए। कोई घड़ी देख रहा था तो कोई ऊपर नीचे से ट्राली बैग का निरीक्षण कर रहा था।
-बढिय़ा है, कुली की आवश्यकता नहीं, खुद ही हैंडिल पकडक़र घसीट ले जाओ। चाहे जितना सामान भर दो। अमर बोला।
-भारी हो जाएगा तो घसीटने में कठिनाई नहीं होगी? बहू बोली।
अरे भाभी कठिनाई कैसी? चक्के लगे हैं न, कोई बच्चा भी आराम से घसीट लेगा। अजीत बोला।
इन सब बातों से दूर मीरा और दीक्षित जी अपनी ही सोच में डूबे थे।
-तुम लोगों ने खाना खाया? दीक्षित ने पूछा।
-नहीं, सब आपकी राह देख रहे थे। मीरा बोली।
-जाओ भई, तुम खाना वाना खाओ। हम तो वही खाकर आए हैं। बताया तो था तुम्हें।
-वो कोई खाना होता है। समोसा, ढोकला, नाश्ता ही तो होगा? मीरा ने कहा।
-ठीक है पर उतने से ही पेट भर गया। अब खाना नहीं खाया जाएगा। तुम सब खाना खा लो जाकर।
रात को दोनों अगल-बगल लेटे जरूर थे पर अपनी-अपनी सोच में डूबे थे। थोड़ी देर पहले ग्वालियर से दीक्षित जी की बहन दुर्गा का फोन आया था- भइया नौकरी से फुरसत पा गया। अब मेरी बात कान खोलकर सुन लो। वैसे तो तुम सब जानते हो। हम दोनों प्राणी क्या-क्या भुगत रहे हैं। अब आप जरा होशियार रहना। रिटायरमेंट अकेला नहीं आता। अपने साथ छत्तीस तरह की मुसीबतें लेकर आता है। उम्र तो हो ही जाती है पर हम लोग खुद ही खुद को बेकार समझकर और पचासों रोग पाल लेते हैं। ऐसे में यही पैसा काम आता है। आप दोनों तो बस घूमो-फिरो ऐश करो। अपना पैसा संभाल लेना। बच्चे बड़ी चालाकी से पैसा निकलवाते हैं जैसे हमसे निकलवा लिया। कभी बच्चों का एडमिशन, कभी मकान की मरम्मत। पचासों बहाने हैं उनके पास। इस उम्र में जाने कौन पहले साथ छोड़ दे। जो पीछे रह जाएगा उसकी पैसे के बिना पूरी दुर्गति समझो।
दुर्गा के फोन के बाद दोनों प्राणी अलग ही सोच में डूब गये। मीरा ने ही पहल की- क्या सोच रहे हो?
- दुर्गा की बातों पर विचार कर रहा था।
-वैसे कितना पैसा मिलेगा?
-करीब बीस बाइस लाख... दो या तीन चेक मिलेंगे।
-सुनो... चेक लेकर घर मत आना। वहीं का वहीं बैंक में ब्याज पर डाल देना। उसी ब्याज से बच्चों को भी देंगे और अपना खर्च भी निकालेंगे।
-सोचा तो मैंने भी यही है। आजकल समय बहुत खराब चल रहा है, मीरा। महंगाई भी बहुत बढ़ गई है पर नई जनरेशन ने अपनी जरूरतें भी बहुत बढ़ा ली है।
दीक्षित जी रोज की तरह सुबह छह बजे अपने कमरे से नहीं निकले। सीधे नहा-धोकर आठ बजे कमरे से बाहर आए। बड़ी बहू ने आवाज लगाई- अम्मा देखो, बाबूजी उठ गए। अब वो आठ बजे चाय तो क्या लेंगे। आप उन्हें नाश्ता ही बनाकर दे दो। मीरा पहले से किचन में थी। दीक्षित जी का मन तो वैसे अभी चाय पीने का था पर बहू का फरमान सुन चुप रह गये। वो रोज सुबह छह बजे एक कप चाय पीकर मीरा के साथ टहलने निकल जाते थे। कल देर रात तक सोच में डूबे रहने के कारण ठीक से सो नहीं पाये और आज से तो उन्हें फुरसत ही फुरसत थी इसलिए सीधे नहा धोकर ही बाहर आए थे। वे चुपचाप पेपर पढ़ते हुए नाश्ते का इंतजार करने लगे।
-अम्मा आप नाश्ता बना रही हैं तो गुल्लू और मोनी के स्कूल का टिफिन भी तैयार कर देना। छोटी बहू बोली। मीरा जल्दी-जल्दी रसोई से दीक्षित जी का नाश्ता लेकर बाहर निकली।
-आप नाश्ता करिये मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूं।
-और तुम्हारा नाश्ता?
-बच्चों का स्कूल का टिफिन बनाकर लाती हूं। कहते हुए मीरा हड़बड़ी में चली गई। दीक्षित जी इस नई व्यवस्था में थोड़ा चकित हुए। काफी देर बाद प्लेट में ठंडा पोहा और एक कप चाय लेकर मीरा आई और उनके सामने टेबल पर बैठकर बेमन से खाने लगी। चेहरे पर थकान और हताशा थी। दीक्षित जी ने जग से गिलास में पानी उड़ेलकर मीरा की तरफ बढ़ाया- दवा खा लो शुगर है तुम्हें। आज तुम्हें नाश्ता करने में ही दस बज गये। मीरा ने चुपचाप दवा खा ली।
दूसरे दिन दीक्षित जी अपने पुराने समय से उठे। हमेशा टेबल पर रहने वाला अखबार आज नदारत था। बड़ी बहू रसोई से दो कप चाय लेकर सीधी अपने कमरे में चली गई। छोटे का कमरा अभी तक बंद था। मीरा ने कुछ देर तक इंतजार किया फिर दो कप चाय बनाकर ले आई। अभी वह चाय लेकर दीक्षित जी की तरफ बढ़ रही थी कि छोटी बहू ने आंखें मलते दरवाजा खोला और मीरा के हाथ से चाय की ट्रे लेकर बोली- ‘‘प्लीज अम्मा आप बाबूजी के लिए दूसरी चाय बना लेना। इन्हें आज जल्दी आफिस जाना है।’’ मीरा और दीक्षित जी हैरानी से देखते रह गए, छोटी बहू चाय लेकर फिर कमरे में समा गई और दरवाजा फिर से बंद हो गया।
दीक्षित जी ने मीरा को इशारा किया... चलो...
-ठहरिये, पहले आपके लिए चाय बना दूं। मीरा नजरें झुकाकर बोली। चाय पीने का अब मन नहीं है... चलो
दोनों टहलते हुए पार्क के गेट तक पहुंचे। गेट के बाहर चाय की गुमटी से दीक्षित जी ने दो कप फीकी चाय ली। दोनों वही बेंच पर बैठकर पीने लगे। डायबिटिक होने के कारण मीरा का सुबह टहलना बहुत जरूरी है ऐसा जब से उनके डॉक्टर ने बताया तब से दीक्षित जी उसे लेकर सुबह अवश्य टहलने निकलते। वापसी में हमेशा की तरह आज भी फुटपाथ पर लगने वाले बाजार से दोनों ताजी सब्जी लेकर घर लौटे।
डायनिंग टेबल पर दोनों बेटे और बहुएं किसी बहस में मशगूल थे। उन दोनों को देखते ही उन्होंने उन्हें भी उस बहस में शामिल करने के लिए अपने पास बैठा लिया।
-पापा मैं कह रहा था हमारा परिवार बड़ा है, हमें इनोवा जैसी कोई बड़ी गाड़ी ही लेनी चाहिए, ताकि हम कहीं भी एक साथ जा सकें। क्यों मैं ठीक कह रहा हूं? अजीत ने दीक्षित पर खोजी निगाह डाली।
-इतनी बड़ी गाड़ी अच्छी नहीं लगती। जैसे टैक्सी हो, आई ट्वेन्टी बढिय़ा गाड़ी है। अमर ने अपने विचार रखे।
-पापा आप बताइए, ये दोनों तो बहस ही करते रहेंगे, बड़ी बहू बोली।
-अब मैंने तो इस विषय में कभी कुछ सोचा नहीं। मुझे गाडिय़ों के विषय में अधिक जानकारी भी नहीं है, दीक्षित जी उदासीन स्वर में बोले।
-हां, हां पापा ठीक कह रहे हैं। आप ही लोग तय करके पापा को बता दो। पापा और अम्मा तो सीधे-साधे हैं वो ये सब क्या जाने? क्यों पापा ठीक कह रही हूं? छोटी बहू ने मस्का लगाया।
मीरा ने शंकित नजरों से दीक्षित जी को देखा।
-वैसे पापा आपको पैसा कब मिलेगा? अमर ने जानकारी चाही।
-पता नहीं, घर बनाने के लिए लोन लिया था, वो सब कांट-छांट कर पता नहीं, पता नहीं कब तक... कितना मिले?
मेरे विचार में बीस बाईस लाख मिलना चाहिए क्यों पापा? अजीत बोला।
-गॉड नोज... मैं फ्रैश होकर आता हूं। तुम सबने अभी तक नाश्ता नहीं किया? दीक्षित जी उठ गये।
-बस अभी बनाते हैं नाश्ता। बड़ी ने सुस्त स्वर में कहा।
रात के खाने में फिर वही कार की चर्चा थी। साथ ही एक नई बात और उठी।
-पापा आपने सूझबूझ से समय पर  मकान बना लिया। अब बच्चे बड़े हो रहे हैं तो एक कमरे में कमी लगती है। एकाध टायलेट भी और होना चाहिए था। बड़ी बहू बोली।
मीरा ने दीक्षित जी की तरफ देखा। दीक्षित जी बिना कोई जवाब दिए उठ गए।
-क्यों अम्मा एकाध कमरा विथ टायलेट और होना चाहिए न? छोटी ने फिर मस्का लगाया। मीरा से रहा नहीं गया।
-हां होना तो बहुत कुछ चाहिए। पन्द्रह साल पहले हमने अपने परिवार और हैसियत के हिसाब से तीन बेडरूम, हॉल किचन का एकदम सही सैट बनाया था। अब जैसे जैसे परिवार बढ़ता है वैसे-वैसे ही समय के साथ घटता भी है। तुम्हारे बच्चे बड़े होकर बाहर पढऩे चले जाएंगे। हो सकता है कोई बाहर काम धंधा भी करे और हमने कौन सा अमर फल खाया है देर सबेर हमारा कमरा भी खाली हो जाएगा। बहुत ही आवश्यक हुआ तो पांच-छह साल बाद बनवा लेना एकाध कमरा और जल्दी क्या है अभी तो बच्चे प्रायमरी में हैं।
मीरा की बात सुनकर चारों हतप्रभ रह गए। किसी के मुंह से बोल नहीं फूटा। जब मीरा कमरे में पहुंची तो देखा दीक्षित जी मुस्कुरा रहे थे- एकदम सही हमने इतना बड़ा घर बनवा दिया। अब ये अपने बच्चों के लिए एक कमरा भी हम ही से बनवाने के मूड में हैं। अब तो इन्हें कार भी चाहिए।
-पूरा हिसाब लगाकर बैठे हैं चारों के चारों। मीरा उदासी से बोली।
-प्रभा और विभा कब आ रही हैं?
-प्रभा पन्द्रह तारीख को पहुंचेगी, विभा सोलह की रात को।
-सुनो दस को चेक मेरे खाते में पहुंचेगा। भूलकर भी यह बात किसी के सामने भी मुंह से न निकले। बेटियों के सामने भी चुप रहना।
बारह तारीख तक दीक्षित जी रोज बैंक का फेरा लगाते रहे। बेटों ने साथ जाने का आग्रह किया। उन्होंने प्यार से समझाया अभी तो हिसाब-किताब चल रहा है, जब पैसा मिलेगा तब चलना। वे स्वयं चुपचाप बैंक में अपना सारा पैसा ब्याज पर जमा कर आए। ज्वाइंट खाते में, दोनों के नाम, फोटो और सिग्नेचर सब हो गया।
प्रभा पति और बच्चों सहित आ गई। बेटे बहुए आशंकित से घूम रहे थे। बेटी दामाद जिद कर रहे थे। हमारे साथ बनारस चलो, वहां से इलाहाबाद भी घुमा लाएंगे, अब कौन सी नौकरी है जो छुट्टी लेने पड़ेगी। आप लोग तो बस अब घूमो फिरो और इन्जाय करो। दोनों प्राणी सोच रहे थे, जवानी में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, फिर शादी-ब्याह, उसके बाद कभी बेटी जचकी के लिए मायके आ गई, कभी किसी बहु की जचकी। दोनों प्राणी अगर कभी कहीं गए हों तो बस वह भी गिनती के दो चार दिन छुट्टी लेकर। अब जब पैसा मिला तो सभी उसमें सेंध लगाने को तैयार बैठे हैं। इस उम्र में भी अब क्या घूमने जाएंगे अब शरीर में भी तो ताकत नहीं रही।
रात को सबके सो जाने के बाद प्रभा और विकास पापा के कमरे में आ गए। लम्बी चौड़ी भूमिका बांधने के बाद दोनों ने कहा- काम धंधा बहुत खराब चल रहा है। काम्पीटीशन भी बहुत है। कितना भी अच्छे डिजाइन का फर्नीचर रखो, ग्राहक झट उसे आउट ऑफ डेट कर देता है। पैसा मार्केट में फंसा हुआ है। ऊपर से नई मुसीबत बरसात में दुकान टपकने लगी तो कितना ही फर्नीचर खराब हो गया। अब दुकान की रिपेयरिंग में करीब डेढ़ लाख का खर्च है। पापा अगर आप डेढ़ लाख उधार दे दें तो मैं दो-चार महीने बाद आपको पचास हजार करके लौटा दूंगा।
भूमिका से ही दोनों को बात समझ आ गई कि पैसे की डिमांड होने वाली है। दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा। मीरा तो चुप रही। दीक्षित जी  बोले- मैं कहां से उधार दे सकता हूं? अरे भई अभी तो पैसा मिला ही नहीं। जब मिलेगा तो देखूंगा कितना मिलता है। तुम सब की शादी ब्याह और मकान बनवाने के लिये जो लोन लिया था वो नान रिफन्डेबल लोन था। सब कट कटाकर पांच सात लाख मिलेगा तो उसके ब्याज में हम दोनों प्राणी का खाना-पीना, दवा पानी का ही खर्च कठिनाई से चल पाएगा। हम कहां से...
प्रभा और विकास दोनों के चेहरे तन गये... प्रभा उस दुकान में तुम्हारा देवर भी तो बराबर का हिस्सेदार है। उसके ससुराल वाले भी करोड़पति है। उसे कहो कुछ भी इंतजाम करे। मीरा बोली।
दोनों मुंह बनाकर उठकर चले। अब दोनों को विभा का इंतजार था जो कल रात को पहुंचने वाली थी। दीक्षित जी चुपचाप बिस्तर पर लेट गये- हम बेटे-बेटियों में फर्क नहीं करेंगे। बेटियों को जो भी उचित है उतना ही हिस्सा देंगे, पर... चारों के चारों बच्चे इतने उतावले क्यों हो रहे हैं? मीरा चुप रही। वह सोच रही थी कल रात विभा आकर देखो, क्या कहती है। रिटायर होने के बाद बच्चों ने हमें जैसे कटघरे में खड़ा कर दिया है। सौ बहाने करने पड़ रहे हैं। चौबीसों घंटे जैसे सर पर तलवार लटकती रहती है। बच्चे तो साफ-साफ मांग रहे हैं पर हम हैं कि उन्हें साफ-साफ मना नहीं कर पा रहे हैं। हम उनका दिल नहीं तोडऩा चाहते। कब तक हमारे ये बहाने काम आएंगे कि अभी पैसा नहीं मिला।
विभा बच्चों सहित अकेली आई। दामाद को छुट्टी नहीं मिली। घर में सबकी आंख बचाकर, घूमने के बहाने सुबह-सुबह पार्क में आकर विभा ने डायरेक्ट दीक्षित जी से  बात की- पापा आप तो जानते ही हैं अगले महीने मेरी ननद की शादी है। उसके ससुराल वालों ने इंडिका कार की डिमांड की है। आपके दामाद ने आपसे तीन-चार लाख की मदद मांगी है। बाद में वो धीरे-धीरे आपका पैसा लौटा देंगे।
दीक्षित जी हंसने लगे। विभा ने हैरानी से पूछा- क्या हुआ पापा? आप हंस क्यों रहे हैं?
-शादी के बाद तुम्हें शायद मेरे सिद्धांत याद नहीं रहे कि कभी भी मित्रों और प्रिय करीबी रिश्तों से उधार का लेनदेन नहीं करना चाहिए। रिश्ते खराब हो जाते हैं। दामाद ने तीन-चार लाख उधार मांगा है और मुझे सारी कटिंग के बाद मुश्किल से पांच छह लाख मिलेगा, जो अभी तक मिला नहीं है। उस पैसे के ब्याज से तुम्हारी मां का और मेरा कपड़े-लत्ते, दवा-पानी का खर्च ही कठिनाई से पूरा होगा। चलो अगर मैंने दामाद को पैसा दे भी दिया और वह लौटा न सका तो क्या मैं उसका कालर पकड़ूंगा या उसे कोर्ट कचहरी में घसीटूंगा? बोलो...? अब तो इस उम्र में मैं कमा नहीं सकता।
-क्यों, दोनों भाई तो अच्छा कमा रहे हैं? तो आप दोनों का खर्च नहीं उठा सकते? विभा तुनककर बोली। दीक्षित जी ने हैरानी से बेटी की तरफ देखा- तुम्हारा मतलब है मैं अपने जीवन की अंतिम पूंजी तुम्हें देकर बहू-बेटे के सामने कभी दवा के लिए, कभी चश्मा बनवाने के लिए भिखारी की तरह हाथ फैलाता रहूं? इससे तुम्हें खुशी होगी?
-क्या तुम्हारे भाई भाभी हमें ताना नहीं मारेंगे? अपना पैसा तो बेटी को दे दिया अब हमारा बोझ बढ़ा दिया। तुम्हारे संबंध क्या तुम्हारे भाई-भाभी से मधुर रह पाएंगे और तुम्हारी बहन प्रभा कभी तुम्हारा और हमारा मुंह देखेगी? हमने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, शादी-ब्याह के लिए कभी भी किसी से मदद नहीं मांगी। अपनी कंपनी से ही अपनी जमा पूंजी से कर्ज लेते रहे। अब हम अपना बुढ़ापा बिताने के लिए कभी भी किसी से मदद नहीं लेंगे। मरने के बाद यह पैसा चारों में बांट देंगे उससे पहले नहीं। इतना कहकर तमतमाते हुए दीक्षित जी पार्क की बेंच से उठकर टहलने चले गए। विभा का चेहरा उतर गया। वह बिना मां की तरफ देखे, बिना कुछ कहे उठकर चली गई।
इसके बाद एक हफ्ते तक दोनों बेटियां मायके में रही। पर भाई-भाभियों में मस्त। जाते समय मुंह फुलाये हुए उनसे क्षणभर के लिए अवश्य मिलीं। मीरा अपने कमरे में आंसू बहाती रही। दीक्षित जी कई रातों तक सो नहीं पाए। जब बेटियों का यह हाल है तो बहू बेटे पता नहीं अभी कौन-कौन सा रंग दिखाएंगे। दोनों चुपचाप आने वाले तूफान का इंतजार कर रहे थे।
रिटायरमेंट के बाद भी दीक्षित जी पहले की तरह रोज सुबह ताजी सब्जी फल लेकर ही घर आते। घर में दोनों बहुएं थीं दो बेटे और उनके चार बच्चे। साल भर उनके जन्मदिन हो या मैरिज एनीवरसरी, दीवाली हो या दशहरा। वो सब नेग देना कभी नहीं भूले, फिर भी उन्हें साफ दिखाई दे रहा था कि घर में अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा। मीरा भी बच्चों को खुश रखने का भरपूर प्रयास करती दिन भर घर के कामों में हाथ बंटाती। जैसे नई बहुएं ससुराल वालों को खुश करने के लिए करती हंै, फिर भी कोई खुश नहीं था। सब केवल दिखावा भर करते। परिवार में खुशी लाने के लिए मीरा के कहने पर दीक्षित जी ने पहले की रखी जमा पूंजी निकालकर बच्चों की पसंद की गाड़ी की डाउन पेमेंट कर दी और बाकी की पेमेंट हर महीने किश्तों पर देना तय किया। पूरा परिवार कुछ दिनों चहकता रहा, फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ गया। आए दिन घर में बहस होने लगी।
-पिछली बार हमने पेट्रोल भरवाया था। बस एक ही बार हम घूमने गये। पांच लीटर पेट्रोल था। इतनी जल्दी खतम कैसे हो गया?
-महंगे वाले सीट कवर तो हमने ही बनवाया था। उसका भी हिसाब करो।
बेटियों ने कार की बधाई देने के बहाने खूब खरी खोटी सुनाई- हमारी मुसीबत में आप उधार नहीं दे सके।  बेटों के लिए कार खरीद दी। विभा चिढक़र बोली।
-ये जो पैसे आपने कार पर खर्च किये हैं, वो क्या आपके लाड़ले बेटे आपको लौटाएंगे। हम तो लौटा ही देते। बेटे सगे हैं बेटियां पराई है। प्रभा बोली।
दोनों जानते थे ऐसा ही कुछ होगा। दीक्षित जी ने देखा धीरे-धीरे मीरा का सुबह टहलना एकदम ही बंद हो गया। उस समय कभी वह बच्चों का टिफिन बना रही होती। कभी छत पर कपड़े सुखाने चली जाती। कभी सब्जी काटकर रखती। छोटी बहू अक्सर अपने तीन साल के बच्चे को मीरा के हवाले कर कभी बाजार कभी पिक्चर और कभी अपनी किसी सहेली के घर चली जाती और मीरा बच्चे के पीछे पूरे मोहल्ले में दौड़ती परेशान होती रहती। जिस दिन दोनों बहुओं को कहीं जाना होता। चारों बच्चे मीरा को रखने पड़ते। उनके स्कूल से आने पर कपड़े बदलवाने से लेकर खाना नाश्ता दूध पिलाने के लिए हलाकान होती रहती। अब यह सब अक्सर ही होने लगा। दीक्षित जी ने गंभीरता से सोचा कि पहले तो ऐसा नहीं था। अब ऐसा क्यों हो रहा है? मकान हमारा, पहले की तरह सब्जी फल हम ला रहे हैं। बिजली बिल, दूध का हिसाब, मकान का टैक्स हम दे रहे हैं। फिर ऐसा क्यों? मैं रिटायर हो गया पर क्या मीरा कभी रिटायर नहीं हो पाएगी। उसे क्या कभी आराम नसीब नहीं होगा। कारण गृह कलह से बचने के लिए हम चुप हैं। हम कोई विरोध नहीं कर रहे। उन्होंने मन ही मन कुछ तय किया।
अब दीक्षित जी घरवालों के प्रोग्राम पर नजर रखने लगे। जहां उनका कहीं जाने का प्रोग्राम बनता देखते झट मीरा को आवाज लगाते- मीरा जल्दी करो आज शुकुल जी के घर जाना है। या जल्दी करो भई आज हम लोग पिक्चर देख आते हैं। घर बैठे बोर हो गए।
कुछ ही दिनों बाद एक महीने का पैकेज लेकर मीरा के साथ हरिद्वार, कुलू मनाली, शिमला घूमने निकल गए। राह में दोनों ने जी भरकर मन की बातें की, जो वो आजकल घर में नहीं कर पाते थे। दीक्षित जी गंभीर थे उन्होंने प्यार से मीरा का हाथ थामकर कहा-
हम बच्चों को डांटना फटकारना नहीं चाहते, अगर हम ऐसा करेंगे तो आजकल उनके जो तेवर हैं उससे साफ जाहिर है घर में कलह का सूत्रपात हो जाएगा। वह अच्छा नहीं होगा। पर मीरा मेरे जाने के बाद तुम पैसे पर अपना अधिकार मत खो देना। संभलकर रहना। आज मैं हूं तुम्हारा साथ देने के लिए। कल को अकेले तुम्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए उपाय सोचने होंगे। दीक्षित जी की आंखें आंसुओं से लबालब भरी थीं। छलकती आंखों से मीरा ने कसकर दीक्षित जी का हाथ थामकर कहा- क्या पता पहले कौन जाएगा जी। अगर मैं चली गई तो आप घबराना नहीं। ऐसे ही सूझबूझ के बिना कलह के सब संभालकर मस्त रहना। सुबह की चाय न मिले तो पार्क की गुमटी में पी लेना। सिनेमा देख आना। क्या करें दीक्षित जी, समय बहुत खराब आ गया है। नाते रिश्ते पैसों के मोहताज हो गए हैं। दोनों एक-दूसरे को थामकर फूट-फूटकर रोने लगे।