Monthly Magzine
Friday 17 Nov 2017

कमरा नं. सोलह

डॉ. संगीता झा
201, सनाली शिराजी एपार्टमेंट
रोड नं. 1-10-2-289/19
शांति नगर मासाब टैंक, हैदराबाद-28
वही माहौल, वही कमरा, कहने को तो बीस साल बीत गए पर लगता है जैसे कल की ही बात हो। इस कमरे में डॉ. शुभदा ने किसी की जिन्दगी पूरी तरह से बदल डाली थी। तब वह चेन्नई की प्रसिद्ध कैंसर सर्जन डॉ. शुभदा की हैसियत से इसी लाइफ हॉस्पिटल में कार्यरत थी। तब कमरा फाइव स्टार होटल के कमरे की तरह था। अब सुविधाएं बढऩे से सेवन स्टार की तरह हो गया है। अपने कमरे से ही दरवाजे के बीच की जगह से वे लम्बे-लम्बे डग भरती हुई अंजुम को बड़ी मुस्तैदी से अस्पताल का राउंड लेते देख रही थीं। उनकी आंखें सुबह से अंजुम के कदमों का पीछा कर रही थीं। और करे भी क्यों ना, अंजुम आखिर उनकी ही ब्रेन चाइल्ड जो थी।
अपने अलग अंदाज, निडरता और अपनी शल्य चिकित्सा में कुशलता की वजह से अपने मरीजों के बीच काफी लोकप्रिय थी डॉ. शुभदा। वो सभी मरीजों के लिए उनकी शुभदा मैडम और मरीज उनके लिए एक संख्या- कमरा नं. दस, आईसीयू का बेड नं. टेन या डीलक्स रूम नं. सेवेन।
आज से बीस साल पहले प्राइवेट वार्ड कमरा नं. सोलह यानी इसी कमरे में एक मरीज भरती हुआ था अब्दुल्ला बिन फहद। वो करीब सत्तर बरस का था और दुबई का जाना माना शेख था। दुबई से चेन्नई अपना इलाज कराने आया था, उसके साथ चेन्नई का ही मुसलमान भाई था जो उसकी बातों का उर्दू और मद्रासी में अनुवाद करता था। डॉ. शुभदा इसी लाइफ हॉस्पिटल में बतौर कैंसर सर्जन कार्यरत थी। जैसे ही अब्दुल्ला ने अपने सर्जन के रूप में एक यंग लेडी को देखा तो वो बिफर पड़़ा, उसने अपनी अरबी जबान में जोर-जोर से कुछ कहा जिसका आखरी शब्द था ‘खल्लास’। अनुवादक ने बताया ये कह रहा है कि किसी जनाना को ये अपने शरीर पर हाथ नहीं लगाने देगा। ये दूसरे मर्द डॉक्टर को बुलाने या दूसरे अस्पताल ले चलने की जिद कर रहा है। उसके बाद डॉक्टर शुभदा ने अपनी आवाज में गुस्सा जाहिर करते हुए कहा ‘ठीक है जहां जाना है इसे ले जाओ पर इसका ऑपरेशन जल्दी कराओ।’ क्योंकि उसकी रिपोर्ट से डॉक्टर पहले से ही वाकिफ थी जो दुबई से उसके डॉक्टर ने डॉ. शुभदा को फैक्स कर दी थी। पता नहीं, डॉक्टर शुभदा के बोलने में क्या जादू था कि वो चुपचाप उनके कमरे में अपनी जांच कराने बैठ गया। डॉ. शुभदा ने बड़े ही सधे शब्दों में अनुवादक को ऑपरेशन से हो सकने वाले काम्पलीकेशन और साइड इफेक्ट्स की जानकारी भी दे दी। शेख की बस एक ही रट थी जो अनुवादक ने डॉ. शुभदा को बताया- ‘अब जान और गरदन आपके हाथों में है। आप चाहे जो सलूक करें बन्दा उफ भी नहीं करेगा।’
मरीज की शुरूआती जांच के बाद ऑपरेशन का दिन मुकर्रर किया गया। उसे गले में स्थित थाइराइड ग्रंथि का कैंसर था जो सांस की नली और खाने की नली से चिपक गया था। डॉक्टरी भाषा में एडवान्सड केस ऑफ थाइराइड कैंसर कहा जाता है। डॉ. शुभदा उसकी पूरी थाइराइड ग्लैंड साथ में गले की कई मसल निकाल कर श्वांस नली में छेद कर एक ट्यूब डालने वाली थी। श्वांस नली में छेद कर ट्यूब डालने को ट्रैकियोस्टामी कहते हैं।
शेख के अस्पताल में भरती होने वाले दिन उसके साथ अनुवादक और एक हर तरफ से बुर्के से ढंकी महिला आई। उसने अपने हाथों में भी काले दस्ताने पहने थे। डॉक्टर शुभदा की नजरें सहसा उसकी पानी भरी आंखों पर ठहर गई। ठीक ऐसी ही आंखें उन्होंने अपने पड़ोसी मुसलमान के यहां बकरीद में शहीद होते बकरे में देखी थी। सहसा अपनी सोच पर उन्हें हंसी आ गई। एक पल लगा शायद काजल लगाने से आंखों में पानी आ गया है लेकिन तभी ये ख्याल भी जुड़ गया कि काजल आंखों को मिमियाने पर मजबूर नहीं करता है। खैर, शेख भी कई मरीजों में से एक था और उसके साथ आने वाले भी। इससे उसके भरती होने के बाद उस दिन की कोई याद बाकी नहीं रही। डॉ. शुभदा अपने डेली रूटीन में व्यस्त हो गई। ये ऑपरेशन उनके द्वारा किए जाने वाले रोजमर्रा के ऑपरेशनों की तुलना में काफी कठिन था और ऑपरेशन के दौरान मरीज की जान को बराबर खतरा बना हुआ था। ऑपरेशन की सफलता में झूमती हुई डॉक्टर शुभदा का सामना फिर उसी मेमनी आंखों से हुआ। आज उसने हाथों में दास्ताने नहीं पहने थे। दोनों हाथ बड़े सुन्दर गोरे और मेहंदी से रंगे हुए थे। वह दौडक़र डॉ. शुभदा की ओर लपकी और उनके ये बताने पर कि मरीज अब खतरे से बाहर है, उसकी आंखें बड़ी आश्वस्त हुई। उसने अपने चेहरे के हिजाब को उठाते हुए डॉ. शुभदा का शुक्रिया अदा किया। उसके चेहरे पर जो नजर ठहरी, हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। शहद सी सुनहरी आंखें, बाएं गाल का गड्ढा, सुर्ख लाल रंग की लिपस्टिक, वो लगभग बीस साल की होगी। मन में ख्याल आया, विधाता ने फुरसत में मास्टर पीस बनाया है। उन्हें लगा वो जरूर शेख की पोती है। शेख को दो दिनों तक आईसीयू में रखा गया जहां मरीज के साथ कोई अटेन्डेन्ट भी एलाउड नहीं था। दो दिनों बाद डॉक्टर उसे रूम में शिफ्ट करने जा रही थी तो दिमाग में एक ही परेशानी थी कि रूम में उसकी ट्रैकियोस्टॉमी (सांस नली में लगी हुई ट्यूब) की देखभाल कौन करेगा। बड़ी मुश्किल से इतना बड़ा ऑपरेशन किया था जिसे वे सर्जन्स की इंटरनेशनल कांग्रेस में प्रेजेन्ट भी करने वाली थी। मरीज को देखने के बाद उन्होंने आई.सी.यू. की इंचार्ज नर्स से कहकर मरीज के उस अटेन्डेन्ट को बुलाने कहा जो रूम में 24 घंटे मरीज की तीमारदारी में रहेगा। बुलाने पर वही लडक़ी आई, पहली बार उससे बात हुई तो लगा ये तो अपने उच्चारण से मद्रासी मुसलमान ही लगती है। उन्हें यह देखकर दुगुना आश्चर्य हुआ कि बड़ी मुस्तैदी से पांच ही मिनट में उस लडक़ी ने इंचार्ज से सब कुछ सीख लिया। अंदर ही अंदर डॉ. ने राहत की सांस ली कि अब वे बेहिचक मरीज को उसके कमरे में भिजवा सकती हैं। वे उसे कमरा नं. सोलह की परिचारिका कहकर बुलाने लगी। कभी लगता वो शायद अनुवादक की बेटी या पोती है। लेकिन व्यस्तता हमेशा उन्हें मरीज की निजी जिन्दगी से दूर ही रखती थी। जब भी वे अपने राउण्ड में कमरा नं. सोलह में घुसती, उसी लडक़ी के पास मरीज की सारी जानकारी बड़े अच्छे तरीके से उपलब्ध रहती। उस मरीज को खाना पीसकर नाक से डली एक ट्यूब, जिसे राइल्स ट्यूब कहते हैं, के द्वारा दिया जा रहा था। पेशाब के लिए भी कैथेटर लगा हुआ था। उस लडक़ी ने  बड़े ही अच्छे अक्षरों में एक चार्ट बनाया और उसमें सारी जानकारी रहती थी। मसलन मरीज को कब क्या खिलाया गया, हर घंटे पेशाब की थैली में कितनी पेशाब एकत्रित हुई इत्यादि। उसकी इस कार्य कुशलता ने डॉ. शुभदा का जी खुश कर दिया। अब वे स्वयं भी उस परिचारिका से मिलने के लिए बेचैन रहने लगी थीं। शेख के गले में ट्यूब होने से वह बोल नहीं पाता था, लेकिन अनुवादक के जरिए उसका एक ही प्रश्न रहता था, ‘‘मैं अपने वतन कब जाऊंगा?’’ डॉ. शुभदा उसे ढांढस बंधाती कि जिस तरह से लडक़ी उसकी देखभाल कर रही है वो जल्दी ही अपने वतन वापस जा सकता है। जैसे ही डॉ. शुभदा शेख के वतन जाने की बात करती उसकी परिचारिका की पनियल आंखों में उदासी सी छा जाती। एक यही बात डॉ. शुभदा को हैरान कर रही थी कि वे जब भी अन्य मरीजों के घर जाने की बात करती, रिश्तेदार बल्लियों उछलने लगते, लेकिन यहां तो माजरा बिलकुल उल्टा था। आखिर क्या राज है उसके पीछे? अपनी परिचारिका की तीमारदारी से शेख में काफी सुधार हो गया था। वैसे तो बाकी मरीजों के रिश्तेदारों को ट्रैकियोस्टोमी मैनेजमेंट सिखाकर डॉक्टर शुभदा एक हफ्ते में ही घर भिजवा देती थी। लेकिन इस शेख की बात दूसरी थी। उसे पैसों की कोई कमी नहीं थी और वो होटल में रहने की बजाय अस्पताल के सुपरडीलक्स रूम में ठहरा हुआ था जो लगभग पांच सितारा होटल की तरह सुविधाएं लिए हुए था। अस्पताल में छ: हफ्ते रहने से डॉ. शुभदा को शेख से अन्य मरीजों की तुलना में ज्यादा लगाव हो गया था। वे जब भी राउंड के लिए रूम में जाती, उस लडक़ी को शेख की सेवा में व्यस्त पाती। कभी वो शेख के लिए जूस निकाल रही होती, कभी उसका मुंह साफ कर रही होती और कभी उसका सिर सहलाकर ढांढस देती रहती। और तो और उसने तो अब अनुवादक का काम भी करना शुरू कर दिया था। फर्राटे से वो अरबी बोलने लगी थी। डॉ. शुभदा ने एक दिन उस मरीज को अस्पताल से छुट्टी देने की बात कही। वो जैसे ही कमरे से बाहर निकली वह लडक़ी हिरणी जैसे दौड़ते-दौड़ते उनके पीछे आई। उसने डॉ. शुभदा से प्रार्थना की कि वह अकेले में मिलना चाहती है। डॉ. शुभदा ने उसे ओ.पी.डी. के बाद तीन बजे अपने चेम्बर में आने के लिए कहा। उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि वो उनसे अकेले में क्यों मिलना चाहती  है। अपनी ओ.पी.डी. खत्म डॉ. शुभदा अपनी चेयर पर लदकर पसर गई और अपने दोनों पैर सामने रखे टेबल पर रख लिए। किसी ने धीरे से उनका दरवाजा थपथपा कर बड़ी मधुर आवाज में ‘‘मे आई कम इन मैडम’’ कहकर अंदर आने की इजाजत मांगी। कोयल की कूक की तरह वो आवाज डॉ. शुभदा के कानों में गूंजने लगी, अपनी दबंग आवाज में उत्तर दिया ‘‘यस, कम इन’’। झट से अपने पैर टेबल से हटा जमीन पर रख लिए। उसके साथ कमरे के अंदर एक ठंडी हवा का झोंका भी आया। कुछ देर तो डॉ. शुभदा अपलक उसे देखते रह गई। आज उसने बुर्का भी नहीं पहना था। बसंती रंग के सलवार कुरते में वो खिली-खिली धूप सी लग रही थी। उसके कमरे में घुसते ही कमरे के अंदर की सिहरन उसके शरीर से आती अरोमा की वजह से गुनगुनी गरमाहट में तब्दील हो गई। डॉ. शुभदा ने उसे सामने वाली कुर्सी पर बैठने का संकेत दिया। कुर्सी पर बैठने के बाद जब उसने अपनी हालत का बयान किया तो डॉक्टर सकते में आ गई। डॉ. शुभदा जैसी मर्दानी महिला ने सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी दूसरी महिला की जिन्दगी इस तरह भी हो सकती है।
उसका असली नाम अंजुम था और वह चेन्नई के मुस्लिम बहुल इलाके रोयापेटा की रहने वाली थी। मां-बाप बहुत गरीब और घर में सात भाई-बहिन थे। अंजुम और शेख की कांट्रेक्ट मैरिज, जिसे ‘मुत्ता’ कहा जाता है, थी। शेख को अपनी तीमारदारी के लिए एक नौकरानी की जरूरत थी और अंजुम के माता-पिता को भुखमरी से बचने के लिए पैसों की। जिब्रान की तरह रोयापेटा में कई एजेंट थे जो लडक़ी के बदले पैसों की अदला-बदली करते थे। शेख को भी लगा कि केयर टेकर के बदले उतने ही रुपयों में बड़ी सुन्दर दुल्हन खरीदी जा सकती है। बस फिर क्या था शेख ने मोटी रकम देकर एक प्यारी सी चहकती चिडिय़ा अंजुम को सोने के पिंजरे में कैद कर लिया। अब डॉ. शुभदा को समझ आया जिसे वे शेख की पोती समझ रही थी वो उसकी अस्थायी बीवी थी जिसे वो अपने वतन जाने के पहिले तलाक देने वाला था।
अंजुम शेख की बड़ी शुक्रगुजार थी कि उसकी वजह से उसने अपने छोटे भाई-बहिनों के चेहरे पर मुस्कुराहट देखी थी। घर में बिना ईद के सबके बदन पर नए कपड़े थे। अंजुम को गहनों से लादा गया था। उसने डॉ. शुभदा को बताया कि बिकना तो उसकी किस्मत थी, यहां तो कम से कम सम्मान से सबके सामने काजी को बुलाकर निकाह हुआ। बहुत सारे शेख तो अरब देशों से मद्रास, हैदराबाद, विजयवाड़ा सिर्फ भोली-भाली लड़कियों से पैसों के बदले अय्याशी करने ही आते हैं। निकाह के दूसरे दिन ही शेख का ऑपरेशन हुआ। अंजुम के भोले भाले दिल में यह डर समाया हुआ था कि अगर डॉ. शुभदा शेख को अस्पताल से डिस्चार्ज कर देंगी तो उसके वैवाहिक जीवन का भी अंत हो जाएगा। वो एक तलाकशुदा महिला बन जाएगी। डॉ. शुभदा को अंजुम की इस रुढि़वादी सोच पर इतना तरस आया- वाह रे हिन्दुस्तान ! कब्र पर पैर डाला हुआ सत्तर बरस का पति और सुन्दर कमसिन बीस साल की  बीवी को तलाक का डर। डॉ. शुभदा ने ठान लिया इस प्यारी होनहार लडक़ी के लिए कुछ न कुछ जरूर करना है। उन्होंने अंजुम को आश्वस्त किया कि वे शेख को एक और हफ्ते अस्पताल में रखेंगी। उन्होंने अंजुम के माता-पिता से मिलने की इच्छा जाहिर की। अंजुम ने कहा कि वो उसके माता-पिता से कुछ न कहें, वे लोग गरीब जरूर हैं पर दिल के बड़े भले हैं। बहुत मजबूरी में उन्होंने अपनी बेटी का सौदा किया है।
डॉ. शुभदा ने उसे समझाया कि उसे वे जीवन में एक नई राह देना चाहती हैं और वे उसके माता-पिता को नाराज नहीं करेंगी। शहदी आंखें बड़ी आश्वस्त हुई और आंखों के अंदर का मेमना भी बाहर निकल गया। दूसरे दिन बड़े सहमे से अंजुम के माता-पिता डॉ. शुभदा से मिलने आए। उन्होंने डॉक्टर से डरते हुए कहा- ‘‘शेख साहेब से अंजुम का निकाह अंजुम की मर्जी से ही हुआ है, हममें से किसी ने भी उससे जबरदस्ती नहीं की है।’’ डॉ. शुभदा हंसने लगी- ‘‘अरे डरो मत, मैंने तुम्हारी बेटी के अंदर एक बड़ी समर्पित नर्स देखी है। मैं उसकी जिन्दगी के आयाम बदलना चाहती हूं। शेख उसे तलाक देकर जाए उससे अच्छा क्यों न तुम्हारी लडक़ी ही उसे छोड़ दे।’’ उसके पिता मोहम्मद युसुफ तो डर गए- ‘‘अरे नहीं मैडम, इस्लाम में औरत तलाक नहीं देती है उसे खुला कहते हैं और उसके लिए काजी साहेब को अर्जी देनी पड़ती है। ब्रोकर जिब्रान हमारा जीना हराम कर देगा। मेरी और तीन छोटी बेटियां हैं, उनसे तो कोई शादी नहीं करेगा। शेख साहेब ने पैसों से हमारी बड़ी मदद की है। आपकी बड़ी मेहरबानी होगी यदि आप बीच में ना पड़े। हमें हमारे हाल पर छोड़ दें।’’ डॉ. शुभदा अब बड़े असमंजस में पड़ गई वे कुछ ऐसा भी नहीं करना चाहती थी जिससे रक्षा में हत्या हो जाए, यानि अंजुम की मुसीबतें बढ़ जाएं। बेचारे गरीब लोग बस्ती में रहते हैं और सामाजिक दबाव और मान्यताएं उन्हें कभी लीक से हटकर कुछ नहीं करने देती। डॉक्टर शुभदा ने किसी और दुभाषिये के जरिये शेख से बात करने का मन बनाया।
शेख सचमुच दिल से बड़ा अच्छा आदमी था। अंजुम की उम्र के उसके नाती पोते थे। दुभाषिए के जरिए जब डॉ. शुभदा ने उसे बताया कि उसकी जिन्दगी अंजुम की कर्जदार है। वह भी बड़ा शर्मिन्दा हुआ। वो डॉ. शुभदा की कोई बात टाल ही नहीं सकता था। उसने डॉ. शुभदा से वादा किया कि वो ना केवल अंजुम को आजाद कर देगा बल्कि उसकी नर्सिंग ट्रेनिंग का पूरा खर्च उठाएगा उसे पैरों पर खड़ा करेगा जिससे वो भविष्य में भूले से भी किसी दूसरे जिब्रान जैसे बाघ के पंजे में न फंसे। वही अंजुम आज बीस साल बाद लाइफ हॉस्पिटल की नर्सिंग सुप्रिन्टेन्डेन्ट बनी आत्मविश्वास भरे लम्बे-लम्बे डग भरती हुई राउंड ले रही थी।
आज डॉ. शुभदा रिटायरमेंट के बाद कैंसर से लडऩे के लिए पुन: उसी अस्पताल में डॉक्टर की भूमिका में नहीं, मरीज की भूमिका में। ... वही कमरा नं. सोलह... शायद अंजुम को पता नहीं है। वो शायद उसके लिए अभी महज बेड नं. सिक्सटीन हैं..
न... शायद उसे संदेह हो गया है। रजिस्टर बंद कर वह इसी ओर आ रही  है। खट-खट-खट... शुभदा के दिल की धडक़नें बढ़ती जा रही हैं। थोड़ी झेंप सी हो रही है। अरे अपने से भी क्या शरमाना... वह भी तब जब वह चंद दिनों की मेहमान है।
कदमों की आहट उनके बेड के पास आकर ठहर गई  है... आंटी! शुभदा आंटी...
डॉ. शुभदा नहीं-नहीं मरीज शुभदा ने करवट ली और आंखें टेक दी... ‘‘मेरी अंजुम मेरी बेटी’’...
‘‘आंटी मेरी मां’’, दोनों लिपट जाती हंै।
‘‘आपका कैंसर इतना बढ़ कैसे गया? आप तो खुद इतनी बड़ी और तर्जुबेकार डॉक्टर रही हैं। कोई बात नहीं, अब आप अपनी  बेटी के पास आ गई हैं। याद है, 20 साल पहिले कभी आपने मुझे बाघ के जबड़े से छुड़वाया था, अब बीस साल बाद कर्ज और फर्ज चुकता करने का वक्त आ गया है। मैं मौत के जिन्नात से लड़ कर आपको छुड़ा लूंगी- आय विल।’’
हंसती है उदास सी हंसी शुभदा। मौत से लडऩे ही तो आई हूं... जिन्दा बचने...
जिन्दा रही तो जिन्दा रही, मर भी गई तो मरूंगी नहीं... तुममें अपनी अंजुम में जिन्दा रहूंगी।