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Tuesday 21 Nov 2017

मेरे अंदर का सच

सुधा गोयल
290-ए, कृष्ण नगर
डॉ. दत्ता लेन,
बुलंदशहर-203001
मो. 09917869962
कनु, मेरी बेटी विदा होकर ससुराल जा चुकी है। मैं आज बिल्कुल अकेला रह गया हूं। मेरे मन पर विगत पन्द्रह वर्षों से एक बोझ रखा है जिसे उतार फेंकना चाहता हूं। स्वयं से डरता भी हूं। अपना अपराध स्वीकार करना आसान नहीं होता। हर वक्त एक भय सताए रहता है। मेरी बेटी कनु कुछ भी नहीं जानती। मैं जब भी उदास हुआ हूं वह यही समझती है कि मैं अपनी पत्नी शोभा की याद में व्यथित हुआ हूं।
सच उस मासूम को क्या मालूम? उसे तो जैसा बताया गया वैसा ही सच समझ बैठी। कई बार मन हुआ कि कनु को सब कुछ साफ-साफ बतला दूं, लेकिन जिस आग को मैं अकेला झेल रहा था, शायद कनु की नजर बर्दाश्त न कर पाता। संभव है तब वह भी मानसिक तनाव में जीती।
कनु तो उस समय स्कूल से लौटी थी। उससे पहले ही बहुत कुछ घट गया था। कनु उस समय चार बरस की थी। मैं यहीं से अपनी कहानी प्रारंभ कर रहा हूं। पाठकों के सामने अपना अपराध स्वीकार कर शायद मेरी आत्मा को शांति मिले। समाज की अदालत से मैं उसी समय बरी हो गया था, पर मन की अदालत हमेशा कचोटती रही कि शोभा का असली हत्यारा तू है।
हां शोभा मेरी पत्नी थी। मैं उसे बहुत प्यार करता था। कभी ऐसा भी हो जाएगा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। वैसे शोभा बहुत गंभीर और समझदार थी। उसने मुझसे कभी मां की शिकायत नहीं की। बल्कि मां ही मेरे दफ्तर से लौटने पर अपनी शिकायतों का पिटारा लेकर बैठ जाती। मजबूर मुझे मां की सब बातें सुननी पड़ती। मैं कभी ऊब भी जाता तो शोभा मुंह पर अंगुली रख चुप रहने का संकेत करती।
एक दिन मैंने ही शोभा से पूछा- ‘‘तुम्हें बुरा नहीं लगता? मां हमेशा तुम्हारी बुराई करती रहती हैं।’’
‘‘नहीं, इसमें बुरा मानने की क्या बात है? मां जी ने इतना कुछ अकेले झेला है कि परिस्थितियों ने उन्हें चिड़चिड़ा बना दिया है। भरी जवानी में विधवा हो गईं। तुम्हें यहां तक पहुंचाने में काफी कुछ झेलना पड़ा है।’’
‘‘... लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि मां तुम्हें सदा भला बुरा कहें’’ मैंने प्रतिवाद किया।
‘‘अब बस भी करो वरुण। तुम बेटे होकर भी मां को नहीं समझते। मैं उनकी बहू बनकर उन्हें जानती हूं। मां जी मन की बुरी नहीं है। उन्हें लगता है कि मैंने उनका बेटा या एकाधिकार छीन लिया है क्योंकि अब तुम अम्मा-अम्मा कहकर उनसे हर वक्त नहीं लिपटते।’’
शोभा के जवाब ने मुझे निरुत्तर कर दिया, पर मां की खीझ समय के साथ-साथ बढ़ती जा रही थी। मां को शोभा कभी एक आंख नहीं भायी। मां उसके हर काम में नुक्ताचीनी करती। जब से घर में कनु आई, मां का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कई बार शोभा की गलती न होने पर भी मैं शोभा को डांट देता। मां खुश हो जाती, पर शोभा अंदर ही अंदर टूट रही है मैं समझ न सका।
शोभा अक्सर खामोश रहती। उसकी इसी खामोशी ने मां को शह दी। कभी मां को शोभा का पढ़ा-लिखा होना अखरता, कभी शोभा का श्रृंगार करना। कभी-कभार ही मां शोभा को मेरे साथ बाहर निकलने देती। अंदर ही अंदर शोभा का धैर्य चुक रहा था। अब वह भी कभी-कभी जवाब देने लगी थी। अच्छा भला घर महाभारत बनता जा रहा था। शिकायतें सुन सुनकर मैं तंग आने लगा। मां अक्सर उसके मायके से मिले गहने, कपड़े चुपचाप निकाल लेती और छोटी बेटी अलका को दे देती। शोभा चुप रहती। अलका भी चुपचाप ले जाती।
अलका पहली बार बेटे को लेकर मायके आई थी। मां ने शगुन के तौर पर बहुत कुछ दिया। शोभा ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया, पर जब मायके से मिला हार नहीं मिला तो शोभा ने मां से पूछा। मां एकदम बिफर पड़ी-
‘‘देख वरुण, तेरी बहू की जुबान बहुत चल गई है। मुझे चोर बताती है। दे आई होगी अपने मायके और मुझसे पूछती है।’’
‘‘मैं अपने मायके देकर नहीं आई। आपने अलका दीदी को दिया है। अक्सर मेरी साडिय़ां भी छुपाकर पकड़ा देती हैं।’’
उस दिन शोभा भी उबल पड़ी। दोनों में जमकर वाक्युद्ध हुआ। मेरी सहनशीलता चुकती जा रही थी। कभी मां मुझे अपने साथ घसीटती, कभी शोभा। मां से कुछ भी कहने की स्थिति में मैं नहीं था। शोभा ही मेरे गुस्से का शिकार बनी। मैंने वहीं आंगन में पड़ी बेंत उठा ली और शोभा को बेतहाशा पीटने लगा। वह पिटती रही। उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया।
मुझे नहीं मालूम कि मैंने गुस्से में कहां और कितना मारा। जब मारते-मारते छड़ी टूट गई तब मैं रुका। शोभा की आंखें फटी-फटी थीं और गर्दन एक ओर लुढक़ गई थी। इस सबकी प्रत्यक्षदर्शी मां दौड़ी-दौड़ी आई। देखा शोभा मर चुकी है।
उस वृद्धावस्था में भी मां की फुर्ती और चालाकी देखकर दंग था। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले मां शोभा को घसीटकर रसोई में ले गई। गैस की नॉब खोली और बाहर से जलती तीली रसोई में फेंक दी। टूटी हुई छड़ी भी मां ने जल्दी से स्टोर में फेंक दी।
मेरे सामने शोभा रसोई में जल रही थी। मुझे होश आया- ‘‘हाय मैं ये क्या कर बैठा?’’ मैंने झपटकर गैस बंद की और जलती शोभा से लिपट गया। तब तक मां का प्रलाप आसमान छूने लगा। पास-पड़ोस के लोग दौड़े चले आए। आग बुझाई गई। मेरे हाथ-पांव बुरी तरह झुलस गए थे। सभी ने उसे महज एक हादसा समझा।
कनु स्कूल से लौटी। मां उसे गोद में बिठाकर प्रलाप करने लगी। शोभा के मां-बाप, भाई-बहन सभी आए। सभी की सहानुभूति मुझे मिली। धीरे-धीरे मेरे घाव भर गए। मैं ठीक हो गया। मेरे रिश्ते आने लगे। मां जोर देती। मैं चीख उठता- ‘‘और कितनी चिताएं घर में बनेंगी।’’ मां मेरी आवाज सुनकर सहम जाती। फिर उनकी हिम्मत मुझसे कुछ कहने की न होती।
कनु को केवल इतना बताया गया कि उसकी मां गैस से जलकर मर गई। कनु ने विश्वास भी कर लिया। पर मैं एक बात हमेशा देखता कि मां कनु के सामने कम बोलती। शायद उन्हें भी अपनी गलती का पछतावा था।
मेरे और मां के बीच की दूरियां बढ़ गई थीं। हम दोनों का आमना-सामना अपराध बोध के बीच दीवार बन गया था। एक दिन मां भी चली गई और इस दारुण व्यथा को समेटे मैं अकेला रह गया।
मैं अक्सर सोते-सोते चौंक उठता। शोभा मरकर भी मेरे चारों ओर जिंदा हो गई थी। मुझे उसकी घूरती निगाहें घर के कोने-कोने में नजर आतीं। कनु मेरी बदहवास हालत देखती तो दौडक़र पानी लाती, मेरा सिर सहलाती। मैं फिर वर्तमान में लौट आता।
अब मेरे सामने कनु का विवाह ही एकमात्र ध्येय था। कनु जब दुल्हन के रूप में विदा लेने मेरे सामने आई, मैं अपलक देखता ही रह गया। शोभा और कनु में कितनी साम्यता है। कनु बिल्कुल अपनी मां पर गई है।
मैं बेटी को आशीर्वाद देने की जगह फटी-फटी आंखों से देख रहा था। ‘अपना ध्यान रखना पापा’- कहकर कनु मेरे कंधे से लगकर सिसक उठी और मैं हल्के से उसकी पीठ थपथपाकर रह गया। मेरे मन में उस समय हाहाकार मचा था। स्वयं पर किसी प्रकार काबू पाया।
वह पल टल गया, लेकिन मैं अब अधिक बोझ नहीं उठा सकता। मैंने अपनी सच्चाई कागज पर उतार दी है। क्योंकि मैंने जब भी किसी अखबार में पढ़ा है कि कोई नवविवाहिता जल कर मर गई तो मेरे सामने शोभा आकर खड़ी हो जाती है। मैं सबको बताना चाहता हूं कि न स्टोव फटता है, न गैस सिलेण्डर। हां हमारा झूठा अहम् फटता है जो नवविवाहिताओं की जान ले लेता है और मुझ जैसे चालाक आदमी साफ बच निकलते हैं।