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Wednesday 22 Nov 2017

तुम्हारी जात से बढक़र कोई धोखा नहीं देखा;

 

किशोर तिवारी ‘केशू’
घंटाघर, दमोह (म.प्र.)
(एक)
तुम्हारी जात से बढक़र कोई धोखा नहीं देखा;
बहुत से हुक्मरां देखे हैं, पर तुमसा नहीं देखा।

पतंगें उड़ रही हैं आपकी आकाश में लेकिन;
कहीं चरखी नहीं देखी, कहीं धागा नहीं देखा।

शरा$फत नेकियां करके भी थर-थर कांप उठती है;
लुटेरों के दिमागों में कोई खटका नहीं देखा।

वो पहिले से ज्य़ादा और गहरी चोट करते हैं;
उन्हें जब टीस उठती है मुझे रोता नहीं देखा।

है खाली जेब लेकिन चल टहलकर लौट आएंगे,
कहींदिल में न रह जाए, कभी मेला नहींदेखा।

मेरे ईमान की आंखों ने केवल पीठ देखी;
खुशी का आज तक हमने कभी चेहरा नहीं देखा।

खुशी इससे •िायादा जिंदगी में और क्या होगी;
अगर बच्चों की आंखों में कभी शिकवा नहीं देखा।
(दो)

कैसे-कैसे ब्र फानी हो गये।
कल सिकंदर थे, कहानी हो गये।

कुछ दुखों से पार इंसा हो गया है;
फलस फे कुछ आसमानी हो गये।

प्यार के कुछ घूंट हमने भी पिये;
रं की फिर राजधानी हो गये।

रतजगों से नींद ऊसर हो गई;
ताड़ से सपने बुटानी हो गये।

दिल में उठते ही मोहब्बत की लहर;
हाथ के नेजं रुखानी हो गए।

देखकर उस नानीं के पैरहन;
शो$ख बादल, पानी-पानी हो गए।

जान का जंजाल इस जी के लिए;
आपके नैना कमानी हो गए।

(तीन)

जिगर में जिसके ईमां पल रहा है।
माने की नर में खल रहा है।

अगर भाई से भाई मिल रहा है।
कलेजा क्यों किसी का जल रहा है।

उसी का चल रहा सिक्का यहां पर;
जो $िफतरत से सरापा छल रहा है।

जहां मौ$का मिले लूटो-खसोटो;
माना अब इसी का चल रहा है।

जुबां से फूल झरते हैं हमेशा;
मगर दिल बेरहम $कातिल रहा है।

हल$िफया कह रहा हूं हुक्मरानो;
तुम्हारा धर्म ही छल-बल रहा है।

कहां से आई तेरे पास दौलत;
तुम्हारे हाथ में तो हल रहा है।

नहीं उबरा कोई इसमें उलझकर;
शहर के $ख्वाब में दलदल रहा है।

ये दिल, दिल न हुआ वाइकी फितरत;
मुंआ! हर हाल में व्याकुल रहा है।

चहकती-चेतना का एक जलसा,
मेरे सपनों में कब से पल रहा है।