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Tuesday 21 Nov 2017

ग़ज़ल

ग़ज़ल

जहीर कुरैशी
108, त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने,
गुरुबक्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल-462001 (म.प्र.) मो. 09425790565
(1)
न ‘हां-हूं’ से सजी संक्षिप्त बानी काम आएगी,
सफर लम्बा है तो लंबी कहानी काम आएगी।

कहर में सबसे पहले काम आएगा पड़ोसी ही,
न राजा काम आएगा, न रानी काम आएगी!

सुबह निकलो तो फिर सूरजमुखी से बात कर लेना,
सफर हो रात का तो रातरानी काम आएगी।

सभाओं में कहीं काम आ गए हैं केसरी कुरते,
सियासत में कभी ये शेरवानी काम आएगी!

तुम्हारे घर की छत तो रोक लेती है उजाले को,
खुले आकाश की छप्पर व छानी काम आएगी।

दिलाना है अगर दुष्यंत को विश्वास, शाकुन्तल,
तो, बस, तेरी अंगूठी की निशानी काम आएगी।

महानगरों के लोगों को भी आखिर भूख लगती है,
वहां भी गांव की खेती-किसानी काम आएगी।
(2)
जो स्वाभिमान के रथ पर सवार होते हैं,
निजी तरह के अहम के शिकार होते हैं।

वो लाख मौन रहें, फिर भी, उनके चेहरे पर
तरह-तरह के अबोले विचार होते हैं।

पतन की राह पे जाने से रोक सकते हों,
अब इस तरह के कहां दोस्त-यार होते हैं?

हम उंगलियों पे तो गिन कर बता नहीं सकते,
हमारे डर भी हजारों हजार होते हैं।

वो मान लेते हैं सौभाग्य, बोझ ढोने को,
कुछेक लोग हमेशा कहार होते हैं।

(3)
निकट पहुंचते ही, दुष्कर दिखाई देते हैं,
पहाड़, दूर से सुन्दर दिखाई देते हैं।

बहुत छिपाने की कोशिश के बाद भी अक्सर,
तुम्हारे मन में कई डर दिखाई देते हैं।

गगन के दृश्य या आकाश से धरा की छटा,
हमेशा पंछी को उडक़र दिखाई देते हैं।

जो लोग जान गए हैं महत्व अवसर का,
उन्हें तिमिर में भी अवसर दिखाई देते हैं!

नदी कहीं भी हो, समतल में अथवा पर्वत पर,
नदी को स्वप्न में सागर दिखाई देते हैं।

न•ार नहीं है अगर उसके पास जौहरी की,
अमूल्य हीरे भी कंकर दिखाई देते हैं।

निकट पड़ोसी या कुछ खास दोस्त या परिजन,
कुछेक लोग निरंतर दिखाई देते हैं।

(4)
भ्रम से दामन छुड़ा लिया जाए,
दोस्त को आजमा लिया जाए!

आज जी भर के रो लिया हमने,
आज खिलखिला लिया जाए।

जागती है जो सबके सीने में,
उस अगन को बचा लिया जाए।

नींद आए बिना सपन वाली,
इतना खुद को थका लिया जाए।

रोज... आंगन की अपनी बगिया में,
कुछ पसीना बहा लिया जाए।

धूप अंधेरों से जूझने के लिए,
मन में दीपक जला लिया जाए।

लोग कहते हैं आसमान जिसे,
उसको सिर उठा लिया जाए!

(5)

जलाकर हाथ जो समझे अगन को,
समझ पाए न वो लपटों के मन को!

चले जो लोग मनभावन सफर पर,
न वो महसूस करते हैं थकन को।

सुरंगों में अभी तक कैद है वो,
तरसता है जो सूरज की किरन को।

न सम्मोहन को सीखें भेद पाई,
पतन के बाद ही समझे पतन को!

मिटाई जाए संबंधों की दूरी,
उतारा जाए धरती पर गगन को।