Monthly Magzine
Saturday 25 Nov 2017

सफेद हाथी

विश्वास एक्का
महारानी लक्ष्मीबाई वार्ड क्र.06
न्यू कॉलोनी, पटेलापारा, अम्बिकापुर (छ.ग.)

सफेद हाथी

फिर आया है
गांव में गजदल।
पियराई धान की बालियां
कुछ खाते कुछ रौंदते
एक खेत से दूसरे खेत
मैदान और गलियों का सफर
पहुंच गया गांव के भीतर
तलाशता महुए के मादक गंध वाला घर।
रतजगा है गांव में
हाथों में मशाल
खाली कनस्तर, ढोल-ढमाके, शोर-शराबा
यह कोई उत्सव नहीं
शायद कवायद है
खुद को बचाये रखने की।
पैरों तले कुचल जाने का भय
दम साधे बच्चे और बूढ़े
दुबके हैं घर के भीतर
बी.ए. पास रमलू का बेटा
सोच रहा है कुछ...
वह कौन सा गजदल है
जो रौंदता जाता है
किसानों के मन की लहलहाती फसल।
रात के अंधेरे में, लपलपाती मशालें
दिखाई नहीं देता गजदल।
चला गया है दूर किसी जंगल में
या धोखा दे गांव वालों को
छिप गया  है
आम के घने बगीचे में,
बड़े-बड़े पेड़ों की आड़ में।

ढेंकी
उपेक्षित पड़ी है ढेंकी
घर के ओसारे में।
अब धान कूटा जाता है, हालर से
चावल निकलते हैं झक्क सफेद।
मोटा चावल भी काया बदलकर
जीराफूल बन जाता है।
ढेंकी बताना चाहती है, धान कूटने की अत्याधुनिक मशीनों के बीच
आज भी उसकी एक पहचान है।
भिनसरिया उनींदी सुबह ढेंकी बज उठती है कभी-कभी।
ढुक्क-ढुक्क की आवाज
नींद में और भी मिठास घोल जाती है।
कुनमुनाकर, पल्टीमार
फिर सो जाता है मुनुवा।
बहुरिया पैरों पर जोर देती है बार-बार
उसकी ताकत है, कंडी पर बंधी
झूलती हुई रस्सी।
धान कूटकर पहाड़ भी तो जाना है
जलावन के लिए।
सूखी लकडिय़ों के संग
लाना है सरई के पत्ते।
चोरकी और पेज, लकरा
की चटनी के चटखारे
पूछते हैं सहराती लोग-
बाई, ढेंकी से कुटा
चावल मिलता है गांव में?
वे भी जानना चाहते हैं
ढेंकी कुटे चावल का स्वाद।
मशीन से कुटे चावल में नहीं होता है स्वाद
फीकी पड़ जाती है लाली लकरा की चटनी।
चमरू हाथों में बसुला ले
तराश रहा है ढेंकी
दुरुस्त करना है मूसल को
बहुरिया फिर कूटेगी धान
और खदबद पकेगा
चावल सुनहले बटुआ में।