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Sunday 19 Nov 2017

मुश्किल में

 

शंकरानंद
क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगडिय़ा-851204
मो. 8986933049
मुश्किल में

जो बचा है शेष वह मुश्किल में है
इन दिनों खतरे में
खेत कोई हड़प लेता है
लूट लेता है बाजार लगाकर कोई आग
कोई घर गिरा देता है बुलडोजर से
कोई नींद के पास लोहा पीटता है
कोई उलट देता है गिलास का पानी
जब प्यास से सूखता है कंठ

न कोई नगाड़ा बजा है कहीं
न कोई मुनादी सुनाई पड़ी है

फिर भी युद्ध चल रहा है रोज
मैं लड़ रहा हूं निहत्था।

गिरवी
जब सारे रास्ते बंद हुए
याद आया कि
अब भी कुछ बाकी है
जिसे गिरवी रख कर कुछ दिन जीना संभव है

पहले गहना रखा
फिर बर्तन
फिर घर गिरवी

और जब खेत में फसल कटने का समय आया
दो दिन पहले आंधी आयी
फिर पानी बरसा
इतना बरसा कि
घर के एक एक आदमी की सांस डूब गई

सबकी सांस भी गिरवी थी!

बच्चे की हंसी
पहली बार की हंसी है ये
बिल्कुल नई

इसमें कोंपल का रंग है
या फूलों की कोमलता
नदी के पानी की है धीमी तरंग
ये हंसी पहली ऋतु है
या पहला बादल

इसे सिखाया नहीं जा सकता
इसे बताया नहीं जा सकता

ये हंसी रोने का विकल्प है
खोने के बाद की उम्मीद है ये
ये है क्रूरता का जवाब

मैं इसे देखना चाहता हूं हमेशा।

बुनने के दिन

वे स्त्रियां आंगन में बैठ कर
धागों से दिन बुन रही हैं
बुन रही हैं तारों से भरी रात

उसी धागे से स्वाद बुनती हैं
उसी से प्रेम
उसी धागे से स्वप्न बुनती हैं
उसी से उम्मीद
सब कुछ इसी पर टिका है अब इस पृथ्वी पर

जब लगता है कि बुनने में कोई दु:ख नहीं
ठीक तभी पड़ जाती है गांठ

वे स्त्रियां पहले गांठ खोल रही हैं
फिर बुनने का काम हो जाएगा शुरू।

पता के बिना
इस लिफाफे में पता नहीं क्या होगा लिखा हुआ

भारी है यह
कई पन्ने हैं शायद जिसमें कुछ भी लिखा हो सकता है
कोई अर्जी कोई शपथ पत्र कोई समाचार

हो सकता है किसी ने लिखा हो पिता के लिए पत्र
या मां के पास भेजा हो अपना समाचार
या भाई के नाम लिखी हो कोई बात
इसमें उसका दु:ख दर्ज होगा शायद या खुशी


जिसे कहना जरूरी हो गया होगा
कोई पीड़ा जो बेचैन करती होगी
या कोई उत्साह

वही दर्ज होगा पन्नों में

पर इतनी बड़ी चूक!
कि लिफाफे पर पता ही नहीं

इसके बिना हर चि_ी बेकार है
वह कितनी भी जरूरी हो इससे फर्क नहीं पड़ता।