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Tuesday 21 Nov 2017

मां (एक)

बनाफर चन्द्र
 एल.आई.जी. 29/3
सी साकेत नगर
भोपाल-462024 (म.प्र.),
मो. 9200739387
मां (एक)

सुबह से शाम तक
काम में लगी रहती है मां

काम रसोई का हो
हो झाड़ू पोंछे का
घर गृहस्थी या फिर
खेत खलिहान का
कभी उ$फ! नहीं करती मां

घर में आ जाए
कितने भी मेहमान
वह दुखी नहीं होती कभी
हर किसी से
पूछती है कुशल क्षेम
बांटती है सबका दुख-सुख

मां को आता है
खूब रिश्ता निभाना
उसके हाथों में हैं
रिश्ते की मजबूत डोर
जिस दिन टूटेगी यह डोर
बिखर जाएगा पूरा घर
बिखर जाएंगे रिश्ते-नाते

इतना कुछ करने
और खटने के बावजूद
मां के हिस्से में आती है
थोड़ी सी नींद थोड़ी सी जगह

आता है थोड़ा सा सुख
मां के हिस्से में

मां (दो)
सावन-भादो की तरह
स्नेह और प्यार से
भरी होती है मां
मौसमी नदी की तरह
सूखती नहीं कभी

घुप्प अंधेरा हो
या उबड़-खाबड़ कोई रास्ता
हर जगह उजाला बनकर
खड़ी रहती है मां

ठंड हो पतझड़ हो
बरसात हो या फिर

तपती धूप का महीना
वह तनी रहती छतरी और
शामियाने की तरह
हर किसी के लिए

इसके बावजूद
घर समाज के लिए
सबसे बड़ा मुजरिम होती है मां
कभी फूहड़ तो कभी
अमर्यादित होने के हर दिन
लगते रहते हैं आरोप

पैदा होने से
मरने के दिन तक
वह खड़ी रहती है
कटघरे में

मां (तीन)

मां के हाथ में है
$कलम किताब और खडिय़ा
सामने बैठे बच्चे
सीख रहे हैं मां से
गणित हल करने का हुनर
और सवालों के उत्तर
मां के
चेहरे पर चमक
आंखों में रोशनी
और हाथ पैरों में गति है

मां कभी बूढ़ी नहीं होती
पूरे कुनबे को करके जवान
खड़ा कर देती है
खेत खलिहान दफ़्तर
और युद्ध के मैदान में

मां कभी हारती नहीं
थकती नहीं कभी
दिन रात करके काम
रहती है तरोता•ाा

आस पड़ोस
या मोहल्ले में होता है
जब कोई हादसा
सभी के लिए ढाल बनकर
खड़ी हो जाती है मां

गोली

बन्दूक की गोली
दक्षिणपंथी हो
वामपंथी या सेक्युलर

वह भोपाल में चले
गुजरात में चले
दिल्ली में चले
या सिंगूर में

वह जहां
और जब भी चलेगी
लेगी, किसी न किसी की
जान

खेत खलिहान में चले
सडक़ या मैदान में
वह बहायेगी
किसान मजदूर और
आम आदमी का
खून

गोली किसी पर
रहम नहीं करती