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Tuesday 21 Nov 2017

बापू के पगचिह्नों के बीच

सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा, तोषगांव-493558
तहसील- सरायपाली, जिला- महासमुंद (छ.ग.)
मो. 9669274393


बापू के पगचिह्नों के बीच ही
मेरी है जगह
तय हुई या तय की गई
इस नाते मैं जायज वारिस होने के
ऐसी सीमा में रहता आया/रहा साधिकार
बाहर निकलने की सोचा नहीं
डग के बीच की हद तोडक़र

देखा है अपनी नन्हीं आंखों से
बापू के कदमों की तेज-तेज चालें
चलते बाकी दौड़ते
मैं तो हांफ हांफ कर
पीछे-पीछे हो लेता
देश की विशाल भूमि में किसी भी राह
चाल इतनी सटीक इतनी सही
इतनी सधी और तेज भी
कि सायकलिया पिछड़ जाए हमेशा
सब चकित उत्तेजित-बुढ़ऊराम से

यों तेरे पद थे ही छोटे-छोटे
जमीन पर मजबूती से पड़ते
जमीन में उगे हुए से लगते
टायर के तल्ले वाली चप्पलों के बावजूद
काफी जगह रहती
दोनों पदों के बीच में
दूरी
इस अंतराल को पिता
ध्यान नहीं दिया तूने
मेरे खातिर भी नहीं...
मगर चुपके से
कैसे कब कहां से
घुस आए हिंसक जहरीले
रक्तजीवियों के पुरखे
आज बेहिसाब बिलबिला गये
कि तेरे पदचिह्न भी धुंधले पड़ गए
कि सांस लेना भी दूभर
कि शब्द खो रहे अर्थ
भाव जगते नहीं किसी के मन में
बापू! तुम रुचते नहीं हो
किसी को किसी भी कोण में
तुम क्या
तेरी काया भर मार दी गई
जला दी गई शुद्ध घी व चंदन काठ से
पूरे के पूरे मंत्रविद्ध कर दिये गये
चबूतरे के नीचे
सोये पड़े रहते हो
अपने ही पदचिह्नों के बीच
बनी समाधि में...

तुम्हें सारी दुनिया व मानव-जाति ने
कुछ दिया न दिया हो
तीन गोली की आवाजें जरूर दी
तुम लेके ही चढ़े उन्हें
चिता पर
फिर तो क्या
हिंसा का विस्फोट हो गया
रक्त नदियां बहीं/संस्कृतियां दरकीं
सहजीवन का ताना-बाना चिथ्थड़ गया
देश तो था ही अभी अभी टूटा फूटा
हवा की लहर टूटी/आकाश का विस्तार खिसका
धरती कटी/सागर उफना
लाठी टूटी/चश्मा टूटा
घड़ी रुकी/चरखा टूटा
कलम बोथरी/नजरें अंधी
दिमाग सुन्न
एक रहस्यमय गलैमर के साथ
ताण्डव शुरू हो गया
कि तेरे ही उच्चरित अंतिम दो शब्दों-
हे और राम के बीच
बहुत कुछ-अप्रत्याशित अयाचित समा गया
बापू
किसम किसम के भजनों का अंतहीन सिलसिला
भरता मैं कैसे खाली स्थान को
फिर भी तुम
उठ सकते हो उठो मानस उठो
आ सकते हो आओ विदेह आओ
मेरे ही कंधों पर
अपने पग रखकर आओ
उतरो धरा पर
पगचिह्नों के बीच की
जमीन की गंदगी साफ करते हुए
अपने हाथों
हे पिता
मैं प्रतीक्षारत हूं
मेरी इच्छा नायायज नहीं है।

प्रेमचंद लौट आया क्या

अरे पगले
तू लमही का चप्पा-चप्पा छान
बनारस भी घूम आया
सुना है इलाहाबाद में रुका था
दिल्ली की खाक छान आया
अब यहां आ गया
वही सवाल लेकर
कि प्रेमचंद लौट आया क्या
(तेरा पहला सवाल भी याद है
कि गांधी लौटा क्या
पर उसका जवाब नहीं पाया
अब दूसरा सवाल
दूसरे किस्म के लोगों के बीच
दोहरा रहा है)
उसका एक ही जवाब
तू ही है
खुद को देख खुद से पूछ
कि प्रेमचंद गया ही कब है
गलत सवालों का जवाब मांगता है
वही वही बार-बार सालों साल
चौराहों पर भीड़ में उछालता है
नीत्शे की तरह
जो कभी दोपहर में
लालटेन हाथों लिये
हमारे जैसे लोगों से
ईश्वर का पता पूछता था
जो मरा ही कब है
देखा नहीं
नया कलेवर लेकर
सजा धजा तरोताजा
उतर आया है
कोटि-कोटि लोगों के सामने
मैदान में
और हजारों हजार होरी
आजकल यहां वहां
फांसी के फंदे में लटक रहे हैं
घर आंगन खेती बाड़ी में
यह भी देखता नहीं
हाईकोर्ट वाले बिलासपुर के
भरे चौक में
कितना झुक गया है गांधी बाबा
कितना कितना हताश
कितना कितना बूढ़ा
आजाद वतन में
अरे पगले
अपने में खोज
कहीं किसी कोने में
दुबके हैं ये...

हफीज मिस्त्री का पाना

एक पैर से नापा जा सकता है
पूरा का पूरा संसार
या एक पैर पर खड़ा होकर
पकड़ा जा सकता है तारामंडल
तो क्यों नहीं कसा जा सकता
एक पाना से यह ब्रम्ह और ब्रम्हाण्ड
यद्यपि पैर अकेला नहीं होता
दूसरे का सहारा
और समूचे शरीर का जुड़ाव चाहिए
तो पाना को चिमटा छेनी हथौड़ी और पेंचकस के साथ
ऐसे दो हाथ चाहिए
जिसकी रगों में दौड़ता है दम
और संग-संग पूरे शरीर का समर्पण
खासकर आंख, कान व दिमाग की नुकीली एकाग्रता
तो सध सकता है सधता है
एक बेजान मोटर सायकल के प्राण
लय गति और सुरक्षा का चाक्षुष समुच्चय
किसी कारीगर को काम में तल्लीन
देककर आपको नहीं होता ऐसा एहसास
बार-बार ऐसे दृश्य व एहसास से
गुजर चुका हूं मैं
भावना व साधना की उद्दात्त ऊंचाई तक
जहां हफीज नहीं रह पाता
पूरा का पूरा एक खांटी आदमी में तब्दील
उन करोड़ों आदमियों की तरह
महज जिसके
दो हाथ दो पैर दो आंख दो कान
एक मुंह एक पेट एक सिर के अतिरिक्त भी
शामिल एक जरूरी दिल भी होता है
सबके लिए समान धडक़ता है
सबसे पहले सबसे अधिक
आदमियत को समझता है
जानता है मानता है
और गठिया के रखता है
एक अनमोल धरोहर सा
उसका पाना
नट-बोल्ट को कसता है संतुलन से
तो निर्दयी इंजिन पर सवारियों की
जिन्दगी में भरता है-
चुस्ती से रवानगी बानगी और सुकून
एक मस्तीभरी चाहत
हवा में बात करने/कल्पनाओं में उडऩे
और सपनों में तैरने की
खिलखिलाहट-हर चेहरे में
तो बढ़ जाता है यकीन
कि एक न एक दिन
सचमुच दुनिया
बनके रहेगी सुन्दर सहज सरल
बंदगी की राह...
हुनरमंद आदमी रचता है
सुरम्य शहनाई की मद्धिम धुन-सी
दोनों ओर खुले हंसते मुंहों से
वह भी एक अदना पाना के
कि अभी भी जीने लायक है दुनिया...
कि आगे भी वैसे साधता रहेगा
जीवन की गति और लय
वह छोटा सा मिस्त्री
मस्जिद की पवित्र दीवार की ओट में
लोहे की चादरों की छाया में
दीवार की खुंटी पर टंगी कमीज ओढ़ते हुए
आदिम ताप से बोल उठेगा-
चलिए सर! पहले चाय पीते हैं
और पान भी...
हम दोनों सडक़ पर उतर जाते थे
हंसते-हंसते ऐसे
मेरी यादों में जो कभी न मिटे।