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Monday 20 Nov 2017

ईष्र्या

गोविन्द माथुर
‘क्षितिज’
82/115, नीलगिरि मार्ग
मानसरोवर, जयपुर-302020
मो. 09828885028
ईष्र्या

दबी रहती है
बरसों बरस
मन के किसी कोने में
जैसी छुपी रहती है
राख के ढेर में चिंगारी

जैसे सुप्त रहती है
पहले प्रेम की स्मृति

एक दिन उजागर
हो जाती है कुंठा
प्रकट हो जाती है ईष्र्या

एक दिन आता है
हवा का झोंका
सुलग उठती है चिंगारी

एक दिन उठता है ज्वार
मन के महा समुद्र में
उमड़ता है प्रेम स्मृति में

चिंगारी प्रेम में भी है
ईष्र्या में भी
और राख में भी

प्रतिशोध

सब कुछ बुद्धि और
तर्क से तय नहीं होता

हर समय हम
किसी न्यायाधीश के
सामने नहीं होते

खुद ही न्यायाधीश
खुद ही करें तर्क
खुद ही करें फैसला

अधिकांश निर्णय
हम करते हैं भावुकता में

बहुत उदार होकर भी
नहीं भूलते अपमान के क्षणों को
अवसर मिलते ही
कर बैठते हैं आक्रमण
प्रतिशोध के लिए

हथियारों से लड़ें युद्ध
समाप्त हो जाते हैं एक दिन
अहं के लिए लड़े युद्ध
कभी समाप्त नहीं होते