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Saturday 25 Nov 2017

हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य

 

कृष्ण वीर सिंह सिकरवार
आवास क्रमांक एच-3,
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,
एयरपोर्ट, बायपास रोड, गांधीनगर, भोपाल-462033 (मप्र)
मो. 9826583363

कल मेरे पास मेरे बचपन के एक अभिन्न मित्र का फोन आया। औपचारिक हाय हैलो के बाद फोन करने का आशय मित्र से पूछा; तब मेरे मित्र ने बताया कि कल मेरी पचासवीं पुस्तक का लोकार्पण प्रदेश के प्रसिद्ध साहित्यकार के करकमलों द्वारा अमुक सभागृह में किया जा रहा है, इस आयोजन में प्रदेश के लगभग सभी साहित्यकार व पारिवारिकजन उपस्थित होंगे । आप भी परिवार सहित कार्यक्रम में आवश्यक रूप से पधारें, मुझे खुशी होगी। चूँकि फोन करने वाले मेरे अभिन्न मित्र थे, अत: न करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। कार्यक्रम में अवश्य पधारने का आश्वासन देकर फोन रख दिया।
फोन पर तो आने का आश्वासन मंैने दे दिया पर सोच में पड़ गया कि क्या यह मेरे मित्र की लेखनी का कमाल है या कुछ और, जो उनकी पचासवीं पुस्तक का लोकार्पण किया जा रहा है। मैं अपने मित्र को बचपन से जानता हूँ, जो पढऩे लिखने में साधारण ही रहा था। उसकी पुस्तकों की हाफ सेंचुरी होने पर मैं अचरच में अवश्य पड़ गया कि उसकी लिखी पुस्तकों को पढ़ता कौन है। क्यों कि मुझे नहीं लगता कि प्रदेश के बाहर उसे कोई जानता भी हो, फिर इतनी पुस्तकें कैसे प्रकाशित हो गयीं।
खैर, अगले दिन मैं भी सपरिवार सभागृह में उपस्थित हो गया, सभागृह विशिष्ठ अतिथियों से खचाखच भरा हुआ था। कार्यक्रम की अध्यक्षता का भार प्रदेश के एक नामी वयोवृद्ध साहित्यकार संभाल रहे थे। कार्यक्रम में प्रदेश के बाहर से भी कई आगन्तुक पधारे हुए थे। कार्यक्रम शुरू हुआ, समस्त अतिथियों ने लच्छेदार भाषणों के द्वारा यह साबित करने का भरसक प्रयास किया कि यह पुस्तक विश्व की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है। इससे पहले न कभी ऐसी पुस्तक प्रकाशित हुई है न आगे होगी।
ऐसी घटना हो सकता है आपमें से भी किसी के साथ घटित हुई हो सकती है, यह कोई बड़ी बात नहीं है। यह सारा घटनाक्रम आये दिन किसी न किसी पुस्तक लोकार्पण समारोह में देखने को मिल ही जाता है। कार्यक्रम के अंत में मुझसे रूका नहीं गया व अपने मित्र को एकांत में ले जाकर पूछा कि भाई तुमने इतनी पुस्तकें किस प्रकार प्रकाशित करवा दी हैं व इनको पढ़ता कौन है। मुझे तो तुम्हारी कोई पुस्तक देखने को नहीं मिली है। तद्परान्त मित्र ने जो जवाब दिया उससे मैं लगभग अचंभित हो गया। मित्र ने कहा कि मेरी साहित्यिक संस्थाओं में पकड़ होने के साथ-साथ थोड़ी जान पहचान प्रदेश की कई राजनैतिक हस्तियों से है, वह मेरी किताबों को सरकारी प्रकाशनों के द्वारा प्रकाशित करवा देते है व थोक में इन पुस्तकों को शासकीय ग्रंथालयों व शासकीय संस्थाओं में भेजने के साथ-साथ पाठ्य पुस्तकों में भी लगवा देते हंै। इस कारण पुस्तक को छपवाने का खर्च भी नहीं लगता बल्कि ऊपर से अच्छी खासी कमाई भी हो जाती है। अब आप खुद ही बखूबी अंदाजा लगा सकते हंै हमारे साहित्य की दशा क्या हो रही है। इस प्रकार से छपे साहित्य से समाज के किस वर्ग का फायदा होगा। इस तरह की प्रक्रिया से धन तो कमाया जा सकता है परन्तु मान सम्मान नहीं।
मैं यहाँ यह नहीं कह रहा हूँ कि सभी साहित्यकार ऐसे हंै या ऐसा कर रहे होंगे। परन्तु समाज में इस प्रकार घटनायें अक्सर देखने को मिल ही रही हैं। आज सभी प्रसिद्धि पाना चाहते है फिर वह किसी भी तरीके से क्यों न हो। एक दो रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो गयी तो अपने आप को विश्व का सबसे बड़ा साहित्यकार समझने लगते हंै। अपने आस पड़ोस में भी इस प्रकार का वातावरण बनाकर आत्ममुग्ध होते रहते हंै। यह समाज के लिए ठीक नहीं है।
सच्चे व अच्छे साहित्य का सृजन तभी संभव हो सकता है जब अन्य साहित्यकारों की रचनाओं को खूब पढ़ा जाये, जितना पढ़ेंगे उतना ही हम अच्छा लिख पाएंगे व एक ईमानदार रचना को पाठकों तक पहुँचा पाएंगे। मैं कई वर्षों से शासकीय व गैर शासकीय पत्र-पत्रिकाओं को लगातार देख रहा हूँ इनमें कई लेखक ऐसे मिल ही जाते हंै जिनकी रचना हर दूसरी पत्रिका में छपी मिलती है । अब प्रश्न उठता है कि ऐसे लेखकों के पास कौन सी जादू की छड़ी हाथ लग गयी है जिसमें से रचनाएँ निकलकर बाहर आती रहती हंै। ऐसे हालात में साहित्य की दुर्दशा होना लाजिमी है।
वर्तमान परिदृश्य को बारीकी से देखा जाए तो पता चलता है कि साहित्य में लिखा तो खूब जा रहा है, परन्तु पढ़ा कम ही जा रहा है। एक समाचार पत्र में लेखक व पाठक के बीच के रिश्ते को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- हिंदी में जो लेखक है वही पाठक है। यानी, लोग एक दूसरे का लिखा पढ़ लेते हंै और आपस में तारीफें करते रहते हैं। पाठकों की कमी का अधिक रोना वे ही रोते हैं जो खुद को बड़ा लेखक व हिंदी सेवी समझते है और तमाम पद पुरस्कार तथा सम्मान झटक लेना चाहते हैं। वे यह भी मानते हैं कि गलती उन लोगों की है जो उनका लिखा पढ़ते नहीं है। यह सवाल स्वयं को हिंदी लेखक समझने वाले तमाम लोगों से है कि आपने कितने पाठक बनाएं हैं? क्या आप लेखन के नाम पर विचारधारा, अपनी कुंठा और बौद्धिकता ही परोस रहे हैं और सोच रहे हंै कि लोग इसे पढक़र स्वयं को धन्य मानेंगे? या फिर आपने कभी ऐसा लिखने की कोशिश की है जिसे पढक़र मन में गुदगुदी हो, दिल भर आए, भावनाएं उमडऩे लगे, प्रेरणा मिले या उत्सुकता जागे ? रोना-धोना छोडि़ए । ऐसा लिखिए, जो असरदार हो, पढऩे वाले के दिल तक पहुँचे। पाठक आठ-दस कविताओं को पढक़र एक नई कविता स्वयं लिख रहा है। क्या यह साहित्य है?
आज लेखकों द्वारा ऐसी रचना नहीं लिखी जा रही जो कालजयी बन पाए, हिंदी साहित्य द्वारा इतने वर्षो की यात्रा करने के बाद भी दूसरा प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, हरिशंकर परिसाई आदि क्यों नहीं निकल के बाहर आ पा रहे हंै? यहाँ कई अन्य नाम और गिनाए जा सकते हैं। कहीं न कहीं कोई कसर तो लेखन में बाकी है। पाठक आज भी उपरोक्त लेखकों की किताबों को पढ़ता है व पंसद करता है, ऐसा क्यों? ये रचनाकार ऐसा क्या लिख गए जो इनको आज भी याद किया जा रहा है। हम वह सब क्यों नहीं लिख पा रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर हम सबको मिलकर खोजना होगा। आज प्रेमचंद के द्वारा रचे गये महान उपन्यासों, कहानी संकलनों के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हंै व इसकी माँग निरन्तर बनी हुई है, क्यों? इसी प्रकार अन्य रचनाकारों की किताबों की माँग में भी कोई कमी नहीं आई है ।
इस सबके वावजूद भी मैं यह नहीं कहना चाहूँगा कि आज साहित्य का कोना पूर्ण तरह खाली हो गया है व अच्छे लेखकों की कमी हो गयी है । आज भी कई लेखक अच्छी रचनाओं की रचना कर रहे हंै व पाठकों द्वारा इनको भरपूर प्यार व प्रतिसाद मिल रहा है परन्तु यह संख्या उंगलियों पर ही गिनने लायक रह गयी है।
साहित्य की उन्नति के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी व्यवहारिक शैली में साहित्य को लाना। इसके लिए साधना व सतत् प्रयास करने की आवश्यकता है। मेरे पास कम से कम 10-15 हिंदी साहित्य की छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएँ अवश्य आती हंै, इनको देखकर मेरी ही संस्था में काम करने वाले मित्र कहते हंै कि यह रद्दी क्यों मँगाते हो, मैं इस प्रश्न का जबाव क्या दूँ? आप खुद समझ सकते हैं।
साहित्य से जुड़ा पाठक कम से कम पत्रिकाओं को अवश्य ही देखता होगा कितने ऐसे पाठक होंगे जो किसी पत्रिका में रचना पसंद आने पर उसे बधाई प्रेषित करते होगें। अत: साहित्य की उन्नति के लिए कम से कम कोई रचना पसंद आ जाये तो उस रचनाकार को अवष्य बधाई प्रेषित करें, जिससे उसको यह महसूस हो कि मेरे लिखे साहित्य को कोई देख भी रहा है, पसंद भी कर रहा है। मेरे द्वारा कई मित्रों को बधाई संदेश देने पर उधर से प्रतिक्रिया आती है कि हम पिछले चार-पाँच वर्षों से पत्रिकाओं में छप रहे हैं परन्तु आज तक किसी ने भी हमारी रचना पढक़र हमें बधाई प्रेषित नहीं की।
आज भारत की आबादी सवा सौ करोड़ से ज्यादा है इतनी बड़ी आबादी के होते हुये हिंदी साहित्य की दशा खराब क्यों होती जा रही है? देश की इतनी आबादी में कितने ऐसे पाठक होंगे जो सच्चे साहित्य की समझ रखते होंगे व इन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते होंगे। कितने ऐसे पाठक होंगे जो मूल्य देकर पत्रिकाएँ व अपनी पसंद की पुस्तकों को खरीद कर पढ़ते होंगे। हां, कुछ ऐसे पाठक अवश्य देखने को मिल जाते हंै जो अपनी पसंद के रचनाकारों की पुस्तकों को खोज-खोजकर पढ़ते हंै। लेकिन यह गिनती कम ही है।
क्या वर्तमान में पुस्तकों के प्रकाशन का उद्देश्य किसी नामी हस्ती से लोकार्पण कराना व लच्छेदार भाषण देकर अपनी पुस्तक को बेहतर बताना ही रह गया है। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि पुस्तक का प्रकाशन लोकार्पण तक ही सीमित न रहे बल्कि उसको पाठकों तक पहुँचाना भी जरूरी है।  वर्तमान में शासकीय ग्रंथालयों में आज कितने ऐसे पाठक होंगे जो पुस्तकों को पढऩे के लिए जाते होंगे। क्योंकि तकनीकी सुविधाओं के आ जाने से पाठक ग्रंथालयों में बैठकर समय खराब नहीं करना चाहता है। इस प्रकार पाठकों की दूरी इन पुस्तकों से लगातार होती जा रही है, तिस पर इन पुस्तकों की बिक्री बड़ी हुई कीमत के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। आज कोई भी पुस्तक उठाकर देख लो उसके पृष्ठों से ज्यादा उसकी कीमत मिलेगी। अब अगर 50-70 पृष्ठ की पुस्तक की कीमत 200-250 की बीच होगी तो क्योंकर पाठक उसको खरीदेगा। अब पाठक अपनी पसंद की पुस्तक को पढऩा चाहता है, मगर ज्यादा कीमत होने के कारण खरीद नहीं पाता है। इस वजह से पुस्तकों की बिक्री प्रभावित हो रही है। इस समस्या के समाधान के लिये निजी प्रकाशन व शासन को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, तभी पुस्तकों की बिक्री संतोषजनक बनायी जा सकती है।
हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों के प्रकाशकों का कहना कि पुस्तकों की बिक्री संतोषजनक नहींहै व इनके प्रकाशन में जितनी लागत आती है उतना मुनाफा इनकी बिक्री से नहीं हो पाता है व हर बार नुकसान ही उठाना पड़ता है । आज प्रकाशक सपाट रूप से कहते है कि कोई पुस्तकंे खरीदता नहीं, अधिकतर पुस्तकंे तो पांच सौ प्रतियों के प्रिंट ऑर्डर से छपती है । वह भी रखी रहती है, आदि। कुछ हद तक यह बात सही भी हो सकती है परन्तु देश में हर वर्ष आयोजित होने वाले पुस्तक मेले कुछ और ही नजारा बयाँ करते हैं। इनमें देश भर के विभिन्न प्रकाशकों के साथ-साथ विदेशों के प्रकाशक भी अपनी पुस्तकों को बिक्री के लिये भाग लेते हैं व पुस्तक प्रेमी बड़ी संख्या में एकत्रित होते हंै और अपनी पसंद की पुस्तकों को खरीदते व मित्रों को भेंट स्वरूप प्रदान करते हंै। इन मेलों मे लाखों करोड़ों की पुस्तकों की बिक्री इस बात को पुष्ट करती है कि आज भी देश में अच्छी पुस्तकों को खरीदने वाले पाठकों की कमी नहीं है बशर्ते उन्हें सही जगह व पुस्तकों का बेहतर प्रचार प्रसार मिले तो पाठक मिल ही जायेंगे।  अगर पाठकों की साहित्यिक उदासीनता का प्रकाशको द्वारा रोना रोया जाता है तो यह पुस्तक मेले देश भर मे आयोजित नहीं किये जाते। दिल्ली में प्रतिवर्ष फरवरी माह में आयोजित होने वाले पुस्तक मेले का उदाहरण लिया जा सकता है जो आज भी रिकार्ड पुस्तकों की बिक्री के लिये जाना जाता है और पाठकों के द्वारा इसका प्रतिवर्ष इन्तजार किया जाता है। देश भर के रेल्वे स्टेशनों के बुक स्टॉल गवाह हंै कि न केवल सस्ते उपन्यास, बल्कि हिंदी में उपलब्ध सर्वोत्तम, स्तरीय साहित्य भी लोगों द्वारा निरंतर खरीदा जाता रहा है। वह भी बिना विज्ञापन। उसे साधारण पाठक खरीदते हैं। शरतचंद्र, बंकिम चंद्र, रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, बच्चन, दिनकर, अज्ञेय, वृंदावनलाल वर्मा, अमृतलाल नागर, नरेन्द्र कोहली, टॉलस्टाय, चेखव, जेन ऑस्टिन, शेक्सपियर, चाल्र्स डिकेंस आदि अनेक लेखकों के जितने भी संस्करण, जितने तरह के प्रकाशकों द्वारा छापे जाते हैं, सब बिक जाते हंै। हां आज बेहतर प्रचार प्रसार के अभाव में पुस्तकों की जानकारी पाठकों तक पहुंच नहीं पाती है इस कारण अच्छी से अच्छी पुस्तकें पाठकों के इंतजार में दम तोड़ देती हंै। आज यह आवश्यक हो गया है कि पुस्तकों का बेहतर तरीके से प्रचार प्रसार किया जाये तो देश में पुस्तकों को खरीदने वाले पाठकों की कमी नहीं है। सरकार को भी ऐसे तरीके खोजने होंगे जिनके माध्यम से पुस्तकों की जानकारी आम पाठकों तक बेहतर तरीके से पहुँच सके तभी इनकी बिक्री को संतोषजनक बनाया जा सकता है ।
हममें से बहुतों को वह जमाना याद होगा, जब हिंद पॉकेट बुक्स ने पुस्तक व्यवसाय में क्रांति ला दी थी.....जिसके कारण क्लासिक्स और अन्य अच्छी किताबें हर पुस्तक प्रेमी के हाथ में दिखाई देने लगी थी। हिंद पॉकेट बुक्स ने भी लाखों किताबें बेची होंगी, जिनमे से अधिकतर की कीमत एक रूपया थी। इसे हम पुस्तक संस्कृति और व्यावसायिकता का मधुर मिलन कह सकते हंै......वास्तव में, प्रकाशक लेखक और पाठक के बीच एक संवेदनशील पुल है । यह पुल ऐसा होना चाहिए जिस पर दोनों ओर से यात्रियों का तांता लगा रहे।