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Friday 24 Nov 2017

हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाये

मीनाक्षी जोशी
रामायण नगरी, भंडारा,
मो. 9823315230

एक सुबह- सुबह मित्रों से सलाम-दुआ करने मोबाइल ऑन किया। एक संदेश पढक़र दिमाग घूम गया। यह क्या बकवास है? इन दिनों सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप चर्चाओं को बिना सोचे समझे बिना सच्चाई जाने प्रचारित करने का तो जैसे सबको रोग लग गया है      है फिर मुद्दा चाहे राजनीति हो या सामाजिक, आर्थिक हो या धार्मिक। आँख मूंदकर उसे अपने ज्ञान बघारने का जरिया बनाना फैशन बन गया है शायद। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद तो मानो देशभक्तों की बाढ़ आ गई है। टी वी के समाचार चैनलों में होने वाली घमासान बहस या कहूँ तमाशे की बात तो जाने देंं, मैं बात कर रही हूँ व्हाट्स एप और फेस बुक की। बात आगे बढ़ाऊं  इससे पहले आपको वह संदेश बताना जरूरी है जो इस प्रकार था- एक मिनिट चैटिंग छोडक़र इस पोस्ट को अवश्य पढ़े - भारत में मुसलमान कौन है? मैसेज का आखिरी हिस्सा जरूर पढ़ें तभी पूरा मतलब समझ में आएगा- *धर्म के नाम पर जिसने भारत के टुकड़े किए वो जिन्नाह मुसलमान था। *करोड़ो हिंदुओं का जिसने खून बहाया वो हर सुलतान मुसलमान था। *हिंदुओं से जबरन इस्लाम कबूल करवाया जिसने वो अरब मुसलमान था। *राम मंदिर तोडक़र मस्जिद बनवाई जिसने वो बाबर मुसलमान था। .... आदि आदि।  
संदेश में मुसलमान को परिभाषित करने वाले ऐसे दस बारह उदाहरणों की सूची थी जिसे पढ़ते हुए भेजने वाले पर क्रोध आ रहा था। खून तो तब खौल उठा जब आगे यह पढ़ा-  जो यह मैसेज फॉरवर्ड नहीं करता वो हर शख्स मुसलमान है..... इस मैसेज को पढऩे से पहले ध्यान दें इसमें शनिदेव की कसम दी है- मुझे कसम है भगवान शनि देव की मैं यह मैसेज कम से कम दस लोगों को भेजूँगा। अगर नहीं भेजोगे तो शनिदेव की कसम लगी हुई है। एक अन्य संदेश में नवंबर में भारत पाकिस्तान के बीच महायुद्ध की घोषणा किसी पंडित भारद्वाज ने अखबार के माध्यम से की थी। मैंने तत्काल संदेश भेजने वाली मित्र से अनुरोध किया कि कृपया किसी भी संदेश को आगे भेजने से पहले जरा अपने दिमाग और अनुभवों का उपयोग करे। सोशल मीडिया पर ऐसी निराधार खबरों, अनाप-शनाप भविष्यवाणियों ने ही जनता को भ्रमित किया और गलत दिशा दी है। भविष्य में क्या होगा इसका फैसला पंडित नहीं परिस्थितियाँ करेंगी। आइंदा ऐसे मैसेज का प्रचार न करें ।
      बीते कल में कितना सच है कितना झूठ, यह कौन जानता है। हिन्दू-मुस्लिम के बीच अलगाव को लेकर जब भी अतीत के आइने  में काले दाग नजर आएं हंै वह सियासत के षड्यंत्रों का परिणाम रहा है। याद आती है एक घटना। बाबरी मस्जिद कांड के दौरान पूरा देश हिंसात्मक दंगों की  आग में जल रहा था । मेरी नई नई नौकरी थी, वह भी अस्थाई । कितने दिन छुट्टी लेकर, पगार कटवा कर घर में बैठी रहती। शार्ट-कट कॉलेज पहुँचने के लिए मुस्लिम बस्ती से गुजरना पड़ता था। उस गली में थोड़ा आगे बढ़ी ही थी कि सामने से कुछ गुंडों को चिल्लाते-दौड़ते आते देखा। भय से प्राण सूख गए। तभी एक आवाज कानों में पड़ी- डरो मत दीदी कुछ नहीं होगा, आप चलो मैं आपको कॉलेज तक छोड़ देता हूँ। पीछे मुडक़र देखा दुबला-पतला सा मुस्लिम लडक़ा। लगभग बीस-बाईस साल का। अपनी जान की परवाह किए बिना मेरे साथ हो लिया। कॉलेज के गेट पर पहुंच मैंने चैन की सांस ली। वापस लौटने के पहले उसने बताया कि वह हमारी कॉलोनी में अक्सर आलू बेचने आता है इसलिये मुझे पहचानता है। मेरी मदद करने वाले उस लडक़े को समाज ने भले ही मुसलमान के खांचे में जकड़ रखा हो पर सच तो यह है कि  हिन्दू-मुसलमान के भेद-भाव से परे  वह सिर्फ इंसान था।
दोनों कौमों में एकता स्थापित करने वाले उदाहरणों से इतिहास ही नहीं वर्तमान भी भरा पड़ा है । हाल ही में अयोध्या जाना हुआ था। राम जन्मभूमि के दर्शन सहित वहाँ की परिस्थितियों को जानना चाहा। पुलिस की बड़ी फौज सुरक्षा व्यवस्था में तैनात थी। उनमें कुछ सिपाही मुस्लिम भी थे। पूछा आप लोगों को यहाँ काम करने में कोई परेशानी नहीं होती ? जवाब मिला- हमें अपने काम से मतलब है। परिवार की जरूरतों से बढक़र हमारे लिए कुछ नहीं। हमारे लिए राम-रहीम कृष्ण-करीम सब बराबर है मैडम। सुखद आश्चर्य हुआ। निस्वार्थ जनता सुख-शांति से जीना चाहती है फिर चाहे वह हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई कोई भी हो उनमें आज भी इंसानियत है। आतंकवादियों को मुसलमान का पर्याय मान लेना दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारी जंग लगी बुद्धि केवल निंदा करना जानती है या भद्दे कार्टून और छिछले चुटकुलों का आनंद लेना जानती है। लानत है हमारी सोच पर जो देशभक्त वीर सिपाहियों की शहादत को अपने खेल का मोहरा बना रहे है।  इतिहास में भी सामाजिक एकता के उदाहरण हजारों मिल जाएँगे। राजस्थान के करौली नगर स्थित मदन मोहन के मंदिर में आज भी जब शाम को आरती होती है तब पहले एक दोहा गाया जाता है -
 ताज भक्त मुस्लिम पै
प्रभू तुम दया करी ।
 भोजन लै घर पहुंचाई
दीनदयाल हरी
कहा जाता है ताज खाँ नामक एक मुस्लिम करौली की कचहरी में चपरासी था। एक बार कचहरी के काम से उन्हें पुजारी से मिलने मंदिर जाना पड़ा। मंदिर के बाहर खड़े हो पुजारी को आवाज दी। पुजारी के आने तक ताज की नजर कृष्ण राधा की मूर्ति पर पड़ी। वे उनकी सुंदर छवि से इतने प्रभावित हुए कि प्रतिदिन दर्शन करने आते और बाहर से ही लौट जाते । भीतर जाने की अनुमति न थी। उनकी भक्ति-श्रद्धा देख पुजारी ने उन्हें भीतर बुला लिया और साथ बैठ पूजा की। हाल ही में गणेशोत्सव पर मुंबई के अनेक घरों में हिन्दू मुस्लिम को एक साथ आरती करते देखा है। हमारे शहर में हर वर्ष ईद और मोहर्रम पर राम मंदिर समिति सहित अनेक नागरिक मिलकर सुख-दुख बांटते है। समझ में नहीं आता ये कौन मूर्ख अलगाव की बातें करता है ? कौन जाति और धर्म के नाम पर देश की एकता खंडित करने पर तुला है ? जनता की अंध-श्रद्धा का लाभ उठाकर कौन उन्हें अंधेरी राहों पर मरने के लिए धकेल देता है? ये और कोई नहीं केवल धन के लोभी आतंकवादी है। ये तो इंसान ही नहीं है फिर कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान।
लगता है कि मीडिया में जितना आतंक इस व्हाट्स एप, फेस बुक और ट्विटर ने फैलाया है उतना किसी ने नहीं। हम तकनीकी का दुरुपयोग करना कब बंद करेंगे ? देश की सीमा की रक्षा तो वीर सिपाही कर ही रहें है पर आंतरिक शुचिता और सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? क्या ऐसा कोई उपाय हो सकता है जो इस तरह के संदेशों पर रोक लगा सके ? बकौल नीरज-
अब तो मजहब कोई ऐसा
भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को
इंसान बनाया जाये