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Saturday 18 Nov 2017

यह विचार सहसा मन में उठा कि नए साल की शुरूआत ऐसी किसी पुस्तक पर चर्चा के साथ क्यों न की जाए जो मुझे कई तरह से अनूठी लगी हो!

ललित सुरजन
यह विचार सहसा मन में उठा कि नए साल की शुरूआत ऐसी किसी पुस्तक पर चर्चा के साथ क्यों न की जाए जो मुझे कई तरह से अनूठी लगी हो!
पुस्तक का परिचय थोड़ी देर में अपने आप आपके सामने आ जाएगा, लेकिन उसमें अनूठा क्या है? इसका खुलासा पहले करना बेहतर होगा। इस स्तंभ के नियमित पाठक जानते हैं कि जीवनी साहित्य से मेरा कुछ अतिरिक्त लगाव है। सो जिस पुस्तक की चर्चा यहां हो रही है उसे शायद तकनीकी दृष्टि से जीवनी साहित्य के अंतर्गत रखा जा सकता है। इस शायद में ही पुस्तक का अनूठापन छुपा हुआ है। सामान्य तौर पर आत्मकथा अथवा किसी अन्य के द्वारा लिखे गए जीवन चरित को इस विधा के अंतर्गत माना जाता है। परिभाषा का विस्तार करें तो स्फुट संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, साक्षात्कार, डायरी व अभिनंदन ग्रंथ की गणना इस कोटि में हो सकती है। इस विधा की कई पुस्तकों ने मुझे लुभाया है; उनमें से कुछ की चर्चा मैंने यथासमय की भी है। सुधा अमृतराय द्वारा अपने माता-पिता सुभद्राकुमारी चौहान व लक्ष्मण सिंह चौहान की जीवनी मिला तेज से तेज ने मुझे इतना प्रभावित किया था कि आज चालीस साल बाद भी वह प्रभाव मन पर बना हुआ है। सीधी-सरल भाषा और सच्ची पारदर्शी छवियां, यह उस पुस्तक की खासियत थी। उसके कुछ पहले ही हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा का पहला भाग क्या भूलंू क्या याद करूं  प्रकाशित हुआ था उसकी खूब चर्चा हुई थी। पुस्तक को आत्मस्वीकृतियों से भरपूर, हिन्दी साहित्य में दुर्लभ, एक साहसिक प्रयोग माना गया था।  पुस्तक रोचक थी, बेहद पठनीय, किन्तु मुझे उसमें आत्मस्वीकृति के बजाय आत्मश्लाघा के दर्शन हुए थे। खैर! एक अन्य आत्मकथा जिसमें विषय का निर्वाह नएपन के साथ था और पढऩे में रोचकता भी उतनी ही, वह कांतिकुमार कुमार की पुस्तक बैकुण्ठपुर में बचपन थी। इस पर मैं अक्षर पर्व में लिख भी चुका हूं। इसके लगभग साथ-साथ विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा नंगातलाई का गांव प्रकाशित हुई थी। लेखक की भाषा, शैली व विषय निर्वाह इन दृष्टियों से मुझे यह पुस्तक अनूठी प्रतीत हुई।
मैं यहां यह भी कहना चाहता हूं कि कांतिकुमार जी के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित छिटपुट संस्मरण व त्रिपाठी जी की हजारी प्रसाद द्विवेदी पर गुरुदक्षिणा में लिखी गई व्योमकेश दरवेश ये दोनों मुझे ज्यादा नहीं बांध सके, यद्यपि साहित्य जगत में इनकी सराहना बहुत हुई। मैं मान लेता हूं कि शायद मेरी अपनी समझ ही कुछ कम है! बहरहाल जिस पुस्तक की चर्चा यहां अभीष्ट है वह न जीवनी है, न आत्मकथा, वह एक सुदीर्घ साक्षात्कार है, लेकिन मैंने जितने साक्षात्कार लेखकों या अन्य विभूतियों के पढ़े हैं यह उनसे बिल्कुल अलग है। सामान्य तौर पर एक साक्षात्कार की अवधि एक या दो घंटे की होती है। बहुत हुआ तो एक अथवा दो दिन में की गई तीन-चार बैठकों में बात पूरी हो जाती है। हमारे बीच ऐसे चर्चित नाम हैं जिनका साक्षात्कार हर कोई लेना चाहता है। इसके पीछे एक भावना देवता को प्रसन्न करने की होती है तो दूसरी ओर किसी पत्रिका में छप जाने की सहूलियत का भी ध्यान होता है। कुछ लोगों के साक्षात्कार तो इतनी बार छपते हैं कि न उनके पास नया कुछ कहने के लिए होता है और न पढऩे वालों के लिए। इन सबमें इस वक्त मुझे सिर्फ एक साक्षात्कार याद आ रहा है जो मेरे मित्र दिवंगत पंकज सिंह के साथ प्रगतिशील वसुधा के लिए किसी ने लिया था। उनका नाम मैं भूल गया हूं। यह एक लंबा साक्षात्कार था और पंकज ने बहुत बेबाकी के साथ अपने जीवन और जीवन मूल्यों की चर्चा इसमें की थी। फिर भी अभी जो पुस्तक सामने है, उसमें एक-दो घंटे नहीं, एक- दो दिन में नहीं, एक-दो सप्ताह नहीं, कई महीनों तक किश्तों में की गई बातचीत है। पुस्तक में चर्चा का कोई सारांश नहीं बल्कि पूरी त$फसील के साथ वर्णन है। इसमें साक्षात्कार देने वाले का कमाल भी है और लेने वाले का भी। अलीगढ़ के प्रोफेसर प्रेमकुमार द्वारा लिखित बातों मुलाकातों में : काजी अब्दुल सत्तार  में पहला अनूठापन यही है कि एक सुदीर्घ चर्चा के माध्यम से लेखक का जीवन उकेरा गया है।
प्रेमकुमार के साथ मेरा परिचय फोन पर कभी-कभार बातचीत तक सीमित है। वे अक्षर पर्व के एक सुधी पाठक हैं और एक अच्छे कहानीकार हैं। मैं उनके बारे में इससे अधिक और कुछ नहीं जानता था। जब उन्होंने मुझे पुस्तक भेजी तो प्रारंभ में मैं उसे पढऩे के लिए बहुत उत्सुक नहीं था। मेरे सामने इतनी किताबें होती हैं कि उनके साथ न्याय करना लगभग असंभव होता है। लेकिन जब पुस्तक हाथ में उठाई तो उसने शुरू से ही मुझे बांध लिया। गो कि मैं उसे धीरे-धीरे कर किश्तों में ही पढ़ पाया। इसके फ्लैप पर लेखक के परिचय से ज्ञात हुआ कि वे इस तरह का प्रयोग पहले भी कर चुके हैं। किन्तु मेरे लिए इस पुस्तक को पढऩा पहला और एक अनूठा अनुभव था। इस किताब में जो दूसरा अनूठापन है उसका अनुमान आपने शायद शीर्षक से ही लगा लिया होगा। यह रेखांकित करने लायक है कि हिन्दी में किसी उर्दू लेखक पर इतनी मुक्कमल किताब आई है। काजी साहब का नाम जाना-पहचाना है, उनकी कुछेक रचनाएं हिन्दी में प्रकाशित हुई हैं, लेकिन वे मुख्यत: उर्दू के ही लेखक हैं। जैसे उनके समकालीनों में कुर्रतुल एन हैदर या बशीर बद्र या निदा फाजली के नाम से हिन्दी पाठक सुपरिचित हैं, वैसा काजी साहब के बारे में नहीं कहा जा सकता। इसका एक कारण शायद यह हो कि हिन्दी में उनकी कृतियों के अनुवाद पर्याप्त प्रमाण में नहीं हुए हैं। कुर्रतुल एन हैदर का उपन्यास आग का दरिया ने जो लोकप्रियता पाई वह एक अपवाद है। मैंने शायरों के नाम लिए हैं किन्तु उनकी ख्याति में मंच का बहुत बड़ा हाथ रहा है। इस पृष्ठभूमि में उर्दू के ही नहीं, भारतीय साहित्य के एक समादृत लेखक पर केन्द्रित पुस्तक लिखकर प्रेमकुमार ने न सिर्फ हिन्दी और उर्दू को पास लाने का महत्वपूर्ण उपक्रम किया है, उन्होंने भारत की गंगा-जमुना तहजीब को आज के कठिन समय में बचाए रखने की दिशा में भी अपनी भूमिका निभाई है।
पुस्तक का तीसरा अनूठापन इसकी भाषा में है। लिखने वाला हिन्दी का, बताने वाला उर्दू का, बात कैसे बने ! काजी अब्दुल सत्तार के कहे हुए को तो उनकी भाषा में ही रखना उचित होता। अगर लेखक यहां तत्सम हिन्दी के प्रयोग पर बल देता तो बातचीत का  रस सूख जाता। मजे की बात यह है कि ढाई सौ पृष्ठों की यह पुस्तक हिन्दी और उर्दू दोनों को साथ लेकर चली है। वह गांधी जी की हिन्दुस्तानी तो नहीं है, लेकिन पढऩे वाले को कहीं पर भी बोझिलता का अनुभव नहीं होता। यह श्रेय प्रेमकुमार को ही जाता है कि उन्होंने भाषा को इतना सुन्दर साधा है। अनूठेपन का चौथा आयाम इसमें है कि पुस्तक में सिर्फ साहित्य चर्चा नहीं है, और न वह सिर्फ जीवनी है। एक लंबे समय तक चली बातचीत में काजी साहब के माध्यम से बहुत सारी तस्वीरें और बहुत सारे रंग उभर कर आए हैं। इस बात को स्वयं लेखक ने पुस्तक की भूमिका में बड़े खूबसूरत अंदाज में बयां किया है। यह जो पुस्तक है  शीर्षक से लिखी गई भूमिका को संपूर्ण रूप से में उद्धृत करना संभव नहीं है, लेकिन निम्नलिखित पंक्तियों से बात स्पष्ट हो जाएगी।
यह कृति ! औपन्यासिक-सी एक ऐसी अभिव्यक्ति-जिसका कथा-नायक खुद सजीव-प्रामाणिक रूप में इसमें आद्यांत व्याप्त-उपस्थित है। वह उर्दू का अग्रगण्य रचनाकार है। ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन की दृष्टि से उसका स्थान, स्तर और महत्व अन्य रचनाकारों से कहीं अधिक बड़ा अलग और अनूठा है। भाषा के लिहाज से वह शब्दों का नामी-गिरामी जादूगर कहा-माना जाता है। ऐसे एक व्यक्ति की $फनकार की... उसकी अपनी, उसके निज की, उसके अनुभव ज्ञान व साहित्य सम्बन्धी मूल्यों-मान्यताओं, संघर्षों की अधिकतम प्रामाणिक व्यथा-कथा और जीवन-गाथा भी कहा जा सकता है। दीर्घ संवाद की प्रस्तुति की इस कोशिश को ! इसके अलावा और इस सबसे अधिक काजी साहब के उम्रभर के लेखन, समग्र विकास और इतिहास की एक रोचक यात्रा भी है यह रचना। एक लेखक की सृजन-प्रक्रिया के कुछ सत्यों-स्वीकारों का, उसकी कल्पना की उड़ानों का मनोरम एक चित्र और जीवंत एक दस्तावेज भी कहा जा सकता है इस रचना को।
अलीगढ़ के काजी अब्दुल सत्तार और अलीगढ़ के ही प्रेमकुमार। यह लंबी बातचीत काजी साहब के घर पर कई-कई बैठकों में हुई है। इसमें वे अपने बचपन की बात करते हैं, परिवार के बारे में बतलाते हैं। लिखने की प्रेरणा कहां- किनसे मिली, उनकी चर्चा होती है। अपनी पुस्तकें उन्होंने कैसे लिखी, इन पर क्या पुरस्कार व सम्मान मिले; किन आला दरजे के लोगों से परिचय हुआ और सम्मान मिले, हिन्दी-उर्दू में लेखक कौन-कौन दोस्त हुए, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अध्यापकों के बीच राजनीति कैसे होती है- ऐसे तमाम ब्यौरे हमारे सामने आते हैं। लेकिन उनका अनुभव फलक बहुत विस्तृत है, वे दुनिया जहान की बातें करते हैं, विचारों से प्रगतिशील हंै, प्रलेस, जलेस से उनका संबंध रहा है, खुद को कम्युनिस्ट मानते हैं और प्रेमचंद ओर जोश मलीहाबादी को आदर्श के रूप में सामने रखते हैं। अंग्रेजों द्वारा लिखे गए साम्प्रदायिकता पैदा करने वाले इतिहास की आलोचना करते हैं। गांधी और नेहरू का अपने जीवन पर प्रभाव का उल्लेख करते हैं। इस सबके अलावा अवध के जागीरदारों के ऐश्वर्य, शान-शौकत, अवध के जनजीवन और परंपराओं के रोचक विवरण तथा इस्लाम को शिया-सुन्नी में न देखकर उसकी उदारवादी व्याख्या भी इस पुस्तक से मिलती है। वे पाकिस्तान का एक प्रसंग बयां करते हुए अपने इलाके के रईस खानदानों की परिपाटियों का जो धाराप्रवाह वर्णन करते हैं- कितने तरह की मिठाईयां, कितने तरह के जेवर और जवाहरात, कितने-कितने वस्त्राभूषण- इसे पढक़र चकित हुए बिना नहीं रह सकते। इसी तरह वे कहीं ईद का वर्णन करते हैं तो कहीं मोहर्रम का, कहीं होली का तो कहीं दीवाली का, कहीं दावतों का तो कहीं शिकारों का और हां, अपने प्रेम संबंधों का वर्णन तो वे करते ही हैं, एक गुजरे वक्त के सामाजिक-पारिवारिक संबंधों का भी परिचय भी उनकी बातों से मिलता है।
तो कहने को तो यह साक्षात्कार को आधार बनाकर लिखी गई जीवनी है लेकिन इसमें रस उपन्यास का है। बहुत कुछ इसमें सच होगा, लेकिन स्वयं प्रेमकुमार जी महसूस करते हैं कि काजी साहब ने कुछ बातें रच-बस कर कहीं। मैं अनुमान लगता हूं कि इस पुस्तक को लिखना आसान काम नहीं रहा होगा। बुजुर्गवार का मन हुआ तो बात की, न हुआ तो न की, कभी थक गए तो बात वहीं रुक गई। प्रेमकुमार ने श्रोता के रूप में अपूर्व धैर्य का परिचय दिया है। ऐसा श्रोता जो पुस्तक के नायक को उसी तरह उकसाता रहता है जैसे कोई दिए की बाती को बार-बार ऊंचा उठाता रहे ताकि लौ मद्धम न पड़े। पुस्तक का अंत काजी अब्दुल सत्तार के ही एक उदाहरण से जिसे पुस्तक के अंतिम पृष्ठ से उठाया है-
यह जिन्दगी क्या है? एक तरह से कर्बला है। हम सब छोटे-छोटे ताजिए हैं। अपने-अपने घरों के चौक पर हर सुबह रखे जाते हैं। सबीलें होती हैं। लंगर होते हैं। नोहे पढ़े जाते हैं। मातम होते हैं। फिर जुलूस उठता है। बड़े-बड़े नारे लगते हैं। रौशनियों के फाँरक लगते हैं। रौशन चौकियां रखी जाती हैं। बाजे बजते हैं- और ऐसा मालूम होता है कि जैसे सारा जहां हमारे साथ है। हम अपने $गम में तन्हा नहीं हैं। पूरी एक दुनिया है जो हमारे साथ आगे-पीछे एक जुलूस की तरह चल रही है- और हम सब चलते-चलते अपने-अपने वक्त पर अपनी-अपनी कब्रों में खुद द$फन हो जाते हैं। यही इंसान की त$कदीर है- यही वक्त की त$कदीर है...।
पुस्तक : बातों-मुलाकातों में
काजी अब्दुल सत्तार
लेखक : प्रेम कुमार
प्रकाशक : अमन प्रकाशन
104-ए/80 सी, रामबाग
कानपुर-208012 (उप्र)
मूल्य : रुपए 495/- मात्र ठ्ठ