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Monday 20 Nov 2017

अक्षर पर्व जुलाई-16 की प्रस्तावना में ललित सुरजन ने हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठ, विलक्षण कवि चंद्रकांत देवताले के नवीनतम कविता संग्रह ‘खुद पर निगरानी का वक्त’ पर जमकर लिखा है

-प्रो. भगवान दास जैन, अहमदाबाद-382445 (गुजरात)
अक्षर पर्व जुलाई-16 की प्रस्तावना में ललित सुरजन ने हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठ, विलक्षण कवि चंद्रकांत देवताले के नवीनतम कविता संग्रह ‘खुद पर निगरानी का वक्त’ पर जमकर लिखा है। भले ही आज के पेशेवर समीक्षकों की भांति आपने काव्य शास्त्रीय प्रतिभाओं का आधार न लिया हो, किन्तु जिस प्रकार आपने ‘गहरे पानी पैठ’ श्री देवताले की ग्रंथस्थ कविताओं का अनुशीलन प्रस्तुत किया है वह आपकी वस्तुनिष्ठ अध्ययनशीलता एवं निष्ठा का द्योतक है। निस्संदेह श्री देवताले को आपने ‘अकविता’ के घेरे से बाहर निकालकर आमजन की सुप्त चेतना को जगाने वाले किंवा मानवीय सरोकारों के रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है। इस प्रस्तावना के लिए आप सर्वथा अभिनंदनीय है।
प्रस्तुत अंक के ‘उपसंहार’ में सुश्री सर्वमित्रा ने बम्बइया फिल्मों के वर्तमान तथोक्त नायक सलमान खान की निराधार, अविवेकपूर्ण एवं गैर जिम्मेदार बयानबाजी पर भी पूरी शिद्दत के साथ लिखकर उन्हें संवेदनहीन करार दिया है। ऐसा व्यक्ति बलात्कार पीडि़ता स्त्री की मानसिक पीड़ा का अनुभव कैसे कर सकता है? यकीनन सलमान खान नायकत्व तो क्या, इंसानियत के दायरे से भी खारिज हो चुके हैं।
डॉ. पंकज साहा ने प्रेमचंद की कतिपय कहानियों (ठाकुर का कुआं, सद्गति, दूध का दाम, कफन) की अन्तर्वस्तु के अनुशीलन के आधार पर उनकी कहानियों में रूपायित दलित जीवन का यथातथ्य विश्लेषण किया है। कविवर नूर मुहम्मद ‘नूर’ की ‘भूख’ शीर्षक कविता ने तो मुझे भीतर तक झकझोर दिया। ‘भूख’ का ऐसा बहुआयामी मर्मस्पर्शी चित्रण। ‘भूख मगर होती नहीं कहानी, वह हकीकत होती है। आदमी और उसकी जिंदगी की तरह’। याद आ रहा है एक शेर-
‘जिस खेत से देहकां को मयस्कर न हो  रोटी,
उस खेत के हर खोस-ए-गंदुम को जला दो।’