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Monday 19 Feb 2018

मैं अक्षर पर्व को नियमित देखता हूं। आप प्रस्तावना में जो पुस्तकों पर अपनी प्रतिक्रिया समीक्षात्मक लिखते हैं वह बहुत रुचिकर लगता है।

 

-शशिभूषण बड़ोनी
आदर्श विहार, ग्राम व पोस्ट- शमशेरगढ़
देहरादून (उत्तराखंड)-248001

मैं अक्षर पर्व को नियमित देखता हूं। आप प्रस्तावना में जो पुस्तकों पर अपनी प्रतिक्रिया समीक्षात्मक लिखते हैं वह बहुत रुचिकर लगता है। अगस्त-16 के अंक में आपके द्वारा जो पुस्तकों पर लिखा गया है, वह भी बहुत ध्यातव्य है। इसी प्रकार कालूलाल कलमी की लिखी लाल बहादुर वर्मा की आत्मकथा की समीक्षा पढक़र भी उक्त किताब पढऩे का मन है। जयनंदन की कहानी ‘जबरिया ढोल’ चुनाव ड्यूटी में धांधली का अच्छा पठनीय चित्रण है। जुलाई-16 के अंक को संस्मरण विशेषांक भी कह सकते हैं। कांतिकुमार जैन का प्रो. शिवशंकर राय पर तथा मधुरेश का केदारनाथ सिंह पर बहुत रोचक व पठनीय हैं। और इसी तरह रमेश गोस्वामी का स्मृति शेष अशोक सेकसरिया पर अत्यंत आत्मीय स्मृति लेख भी।
आपने चंद्रकांत देवताले के कविता संग्रह ‘खुद पर निगरानी का वक्त’ पर बहुत प्रभावशाली समीक्षा लिखी है पुस्तक पढऩे की रुचि बढ़ गई। संपादकीय में अब हर बार एक अच्छी पुस्तक समीक्षा... यह प्रयोग मुझे बहुत मजेदार व उपयोगी जान पड़ता है। कहानियों में रजनी शर्मा की ‘पंक लेपन’ ग्रामीण सुदूर अंचल के श्रमिकों के जीवन का यथार्थ, अत्यंत जीवंत ढंग से कहानी में आया है। लेखिका को बधाई। कमल कुमार ने ‘देवदास का स्त्रीवादी पाठ’ में बिलकुल उचित ही उस फिल्म या कहानी में स्त्रीवादी पक्ष को बेहतर बताया है। सुधा अरोड़ा का साक्षात्कार तथा ‘उपसंहार’ में संपादक की सलमान खान के बारे में राय बहुत तर्कसंगत लगी।