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Thursday 23 Nov 2017

ईमानदारी का सिक्का

सर्वमित्रा सुरजन
पुरानी कहावत है बादल देखकर, घड़ा नहींलुढक़ाया जाता। लेकिन इस वक्त हिंदुस्तानियों को घड़े लुढक़ाने पर मजबूर कर दिया गया है, और बादलों का अता-पता नहींहै। पाई-पाई जोडक़र जमा किए गए बड़े नोट बदलवाने के लिए लोग बैंकों के आगे कतार बनाकर खड़े हैं और सरकार के पास इतनी व्यवस्था भी नहींहै कि वह आसानी से नोट बदल सके। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पहले दो-तीन दिन की तकलीफ का जिक्र किया, अब दो-तीन हफ्ते की बात कह रहे हैं। जनता सरकार से यह सवाल तो चुनाव के वक्त पूछेगी कि जब आपके पास पूरी व्यवस्था नहींथी तो यह फैसला लागू करने की जल्दबाजी क्यों की, लेकिन अभी तो उसे रोजमर्रा के सवालों से जूझना है, और इसलिए वह बैंक की कतार में है। अपनी गाढ़ी कमाई बदलवाने के लिए लोग याचकों की तरह बैंकों के आगे रात से लेकर देर शाम तक खड़े रहते हैं। हिंदुस्तानियों के स्वाभिमान को ऐसी चोट लगी है, जिसका दर्द न जाने कब जाए।
नोटबंदी से कालेधन पर किस तरह रोक लगेगी, इसे लेकर तरह-तरह के तर्क-सिद्धांत दिए जा रहे हैं, जो आम जनता की समझ से परे हैं, ठीक वैसे ही जैसे उसे अर्थशास्त्र की गूढ़ बातें, आंकड़ों में विकास समझ नहींआता है। आम आदमी यह जानता है कि महीने के आखिर में उसे कितना वेतन मिलेगा और उस वेतन से उसे घर खर्च, पढ़ाई, इलाज, सामाजिक संबंधों का निर्वाह किस तरह करना है। काले धन की बड़ी-बड़ी बातें वह किस्से-कहानियों की तरह सुन लेता है। जैसे एक है विजय माल्या, जो इस देश के बैंकों से करोड़ों रूपए लेकर बड़े आराम से लंदन में रह रहा है। एक है ललित मोदी, जिसने क्रिकेट का तमाशा बना दिया और माल बटोरकर वह भी आराम से विदेश में रह रहा है। एक है दाऊद इब्राहिम, जिसे अंडरवल्र्ड का डान कहा जाता है, जो शायद पाकिस्तान में रहता है, लेकिन उसके गुर्गे भारत में निर्बाध उसका कारोबार कर रहे हैं। देश के बाहर रहकर देश की अर्थïव्यवस्था का अपने हिसाब से उपयोग करने वाले ऐसे भगोड़ों और भ्रष्टाचारियों की सूची और बड़ी है, बस ये गिने-चुने नाम जरा ज्यादा चर्चा में रहते हैं। इन लोगों के कारण कितना काला धन देश में आया और कितने अरब का भ्रष्टाचार हुआ, इस बारे में चर्चा नहींहोती, न ही जनता को इस बारे में समझाया जाता है। यह भी नहींबताया जाता कि केवल ऐसे आठ-दस लोगों से ही सरकार सारा दम लगाकर वसूली कर लेती तो देश में काले धन की समस्या बहुत हद तक कम हो जाती। मोदीजी कह रहे हैं कि काले धन से निपटने के लिए और भी बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। क्या उनसे पूछा जा सकता है कि बैंकों के डिफाल्टर बनने वाले अरबपति डिफाल्टरों के लिए आपने कोई बड़े फैसले ढाई सालों में क्यों नहींलिए? क्यों चुनावों में बड़े उद्योगपतियों के निजी हेलीकाप्टरों और विमानों में नेता यात्राएं करते हैं? क्यों उनके तथाकथित धर्मार्थ अस्पतालों, विद्यालयों के उद्घाटन में पहुंचते हैं? मोदीजी ने लाखों का स्वनामधारी सूट पहना था, जो बाद में करोड़ों में नीलाम हुआ, यह किसकी गाढ़ी कमाई से बना था और खरीदने में किसकी गाढ़ी-सफेद कमाई लगी, क्या इसका खुलासा कभी होगा? शायद नहींक्योंकि जनता से उम्मीद की जाती है कि वह चुपचाप अपना काम करे और सवाल न करे। पर पिछले कुछ समय से देश में ऐसा माहौल बन रहा था कि जनता सवाल करने को उत्सुक हो रही थी। गौरक्षकों का उत्पात, दलितों का उत्पीडऩ, अल्पसंख्यकों पर हमले, हिंदुत्व के नाम पर गुंडागर्दी, शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाने की कोशिश और विपरीत मतों वाले छात्रों पर अकारण कानूनी कार्रवाई, आतंकवाद पर नाकामी, जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व तनाव, संघर्ष की स्थिति, सैनिकों की रोजाना शहादत ऐसे कई मसले देश में लोगों को परेशान कर रहे थे। जिन लोगों का भारत के संविधान पर, लोकतंत्र पर, उदार सामाजिक व्यवस्था पर भरोसा है, वे इन स्थितियों पर निरंतर सवाल उठा रहे थे और जनता उनके साथ जुड़ रही थी। दिल्ली और बिहार में मोदी लहर के न चलने का यह बड़ा कारण था। अब उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि के विधानसभा चुनावों में भाजपा और मोदीजी की प्रतिष्ठा दांव पर है। इससे पहले कि लोगों के सवाल कड़े होते जाएं और जवाब देना मुश्किल हो,  सरकार ने लोगों की प्राथमिकताएं ही बदल दीं। एक झटके में सारे हिंदुस्तान को कतार में सावधान की मुद्रा में खड़ा होने की सजा मिल गई। बड़े कारोबारी, अफसर, उद्योगपति, मंत्री इन कतारों में नजर नहींआते। सब मध्यमवर्गीय, निम्नवर्गीय लोग परेशान हैं। उनके अर्थतंत्र के साथ बड़ा भयंकर मजाक हुआ है। लेकिन अभी इसका अंत नहींहै, यह संकेत मोदीजी ने जापान यात्रा में दे दिया है। बल्कि वे वहां भी हिंदुस्तानियों पर चुटकी लेने से नहींचूके और कहा कि पहले गंगा में कोई चवन्नी नहींडालता था, अब पांच सौ -हजार के नोट बहा रहे हैं। उनकी जानकारी में इजाफा किया जाए कि केवल गंगा में ही नहीं, गटर में भी लोगों ने पैसे बहाए हैं, जो उन्होंने भ्रष्ट तरीके से कमाए होंगे। जहां तक गंगा या अन्य नदियों पर आस्था का सवाल है तो जनता पहले भी अपनी जेब में रखे चंद सिक्कों में से एकाध नदी की ओर उछाल कर प्रणाम कर लेती थी और आगे भी करेगी। नदियों के इन सिक्कों को कुशल तैराक निकाल कर अपनी आजीविका चलाते रहे हैं। हिंदुस्तान के अर्थतंत्र में केवल काला धन नहींहै, ईमानदारी और सच्चाई पर आस्था के खरे, मजबूत सिक्के हमेशा चलन में रहे हैं।