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Saturday 18 Nov 2017

दबंग भोग्या वसुंधरा

वह अपने गांव का माना हुआ दबंग था। उसकी दबंगई का हर तरफ खौफ था। प्रशासन और पुलिस भी दूरी बनाकर रखती थी। उस दबंग ने कइयों की जमीन और मकान हड़प लिए। जिसने उससे उलझने की कोशिश की, उसने उसके परिवारवालों की इज्जत भी हड़प ली। उसे अपनी ताकत पर बड़ा ही नाज था और वह सुखमय जीवन जी रहा था।
एक बार एक किशोर लडक़ा उससे मिला और उसने उसके उस विशाल सुखमय जीवन की बड़ी प्रशंसा की। उसने कहा, ‘‘हम अच्छे कर्म करके थक जाते हैं। मगर छटाक-भर सुख नहीं मिलता और आपने बिना कर्म के इतने सुख की अपनी झोली में कर लिया?’’
वह दबंग हंसने लगा। उसने कहा, ‘‘हम वीर हैं। तुमने यह सुना नहीं, ‘वीर भोग्या वसुंधरा’? सुख वीरों के घर पर ही शोभा देता है। वैसे तू है कौन?’’
किशोर ने कहा, ‘‘वीर भैया, सच यह है कि मैं भी अपने घर में सुख की तलाश कर रहा हूं. मगर वह कमबख्त कहीं दिख नहीं रहा।’’
दबंग ने पूछा, ‘‘तू क्या वीर है? क्या तेरे बाप-दादा वीर थे?’’
किशोर ने कहा- ‘‘हमारे पिता एक वर्ष पूर्व सीमा पर देश के कई दुश्मनों को खत्म करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हें वीरता के कई पदक भी मिले। वीर होने की प्रसिद्धी मिली। सब उनकी वीरता की मिसाल देते हैं। मगर वसंधुरा को भोगने का अधिकार पाने वाले उस वीर के घर में सुख नाम की कोई चीज नहीं है। क्या वे वीर नहीं थे? या फिर दबंगई वीरता से बड़ी है?’’
इन बातों का जवाब देने के लिए उस ‘वीर’ दबंग की जुबान खुल न सकी।
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