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Saturday 18 Nov 2017

सौंदर्य और यथार्थ की सफल अभिव्यक्ति


अनिरुद्ध सिन्हा

गुलजार पोखर, मुंगेर (बिहार) 811201
मो. 09400450098

बनावट और अभिव्यक्ति के दोनों स्तरों पर गल हिन्दी में अपना स्थान बनाने में सफल रही है। आज जो हिन्दी में गलें लिखी जा रही हैं, पाठक की अभिरुचि के अनुसार अलग-अलग विषयों पर ध्यान केन्द्रित कर रही है। सामंती छाया से दूर रोमानी वार्तालाप का निषेध करते हुए सीधे-सीधे पाठकों से संवाद करना इसका लक्ष्य है। इसका प्रमुख कारण है हिन्दी के निर्धारित लक्ष्यों के साथ उचित तालमेल स्थापित करना। हिन्दी की यह विशेषता है कि इसने परिस्थितियों के अनुरूप अपने कथ्य को आगे बढ़ाया है।
ल के कथ्य के संप्रेषण में अधिक लोच है। यही लोच ही इसे पठनीय बनाती है। सादगी और लय के सहारे मानवीय मनोवैज्ञानिक पक्ष को रोचक तरीके से चिन्हित करती है। हालांकि कथ्य में लोच पैदा करना एक कठिन कार्य है लेकिन हिन्दी के कुछ गलकारों ने इसे सच साबित किया है। जिनमें से एक नाम अशोक आलोक का भी उभरकर सामने आता है। अशोक आलोक की गलों में सादगी और लय ज्यादा चुस्त और सुगठित रूप से प्रकट हुई है। व्यवहार पक्ष और कलापक्ष के संयोजन में लेखकीय सतर्कता दिखलाई पड़ती है। यह भी सही है कि बह्र की विवशता और जल्दबाजी में अधिकांश गलकार भरती के शब्द अथवा अनावश्यक बातें कहने के लिए विवश हो जाते हैं जिससे एक प्रकार की कृत्रिमता और कहन की सौंदर्यता का लोप हो जाता है।  गल की भाषागत व्यवस्था तथा बह्र के तुक संयोजन के लिहाज से अशोक आलोक की गलों का महत्व काफी बढ़ जाता है, ‘‘जमीं से आसमां तक’’ में संग्रहित $गजलों के पाठ के बाद ऐसा कहना अनुचित नहीं होगा। इस दृष्टिकोण से संग्रह की गलें पूर्ण, शुद्ध प्रभावयुक्त एवं पठनीय है।
‘‘जमीं से आसमां तक’’ अशोक आलोक का ता संग्रह है जो हाल ही में मीनाक्षी प्रकाशन दिल्ली से छपकर आया है। संग्रह में कुल नब्बे गलें हैं जो अलग-अलग भावभूमि पर केन्द्रित हैं। बावजूद इसके सारी गलों का मूल स्वर जीवन और इसके साथ रो की घटनेवाली घटनाएं हैं। यही संग्रह की गलों की विशेषता है। गल के बारे में जैसा कि कहा गया है कि विचार से ज्यादा इसमें शैली और अंदाज़ेबयां की प्रधानता है लेकिन अशोक आलोक शैली और विचार को एक साथ लेकर चलते हैं-
•िांदगी के सब $गमों से बेखबर होते हैं
जागती आंखों के सपने सच अगर होते।
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हरेक शख्स में एक प्यास का समुंदर है
बहुत करीब से देखा हुआ ये मंजर है
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रा सा शोख मौसम आशियाने से गुजर जाए
नए ख्वाबों का ये मंजर निगाहों में ठहर जाए
वर्णित शेरों में सृजनात्मक और कलात्मक चित्रों का दर्शन किया जा सकता है। एक ओर जहां कथ्य में प्रगतिशीलता और विविधता है वहीं दूसरी ओर छंद विधान में कोई अनावश्यक प्रयोग नहीं है। तीनों मतलों में गलकार की आस्था और आशा नए रूप में प्रकट होती है। $गमों से बेखबर होते हुए जागती आंखों के सपनों को सच होते देखने की कल्पना के कारण मतला और अधिक चुस्त और प्रभावपूर्ण बन गया है जो हमें किसी अद्भुत आकर्षक गहरे और अधिक अनुभव तक ले जाता है। दोनों पंक्तियां रवानी और लयात्मकता से वंचित नहीं हुई है जिस कारण लहजे में कोई खुरदुरापन नहीं है।
ऐसी भी बात नहीं है कि अशोक आलोक कल्पना की बैसाखी के सहारे अपने लेखकीय सफर को पूरा करते हैं। समसामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं के विरुद्ध आक्रोश भी है। भले लहजा गल की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण मुलायम है जो गल को एक अच्छी गल का स्तर प्रदान करता है।
मुस्कुराता है अंधेरा •िांदगी में इस तरह
कातिलों का है बसेरा रोशनी में इस तरह
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इजाफा हो रहा है बेकसों का
हुआ है रंग फीका चाहतों का
अशोक आलोक की गलों में जीवन का संवेग अपने समय से संवाद और जीवन की भाग-दौड़ में भविष्य का निर्माण तथा टूटी हुई संवेदनाओं को जोडऩे का प्रयास मिलता है। यह आश्चर्य की बात तो है ही साथ ही समाज को कई स्तर पर बदलने की छटपटाहट भी। मतलब अपने भीने-भीने रचनात्मक स्वरों से इंसानी सरोकारों को पहचान कर उन्हें बदलने की कोशिश।
फूल खुशबू तितलियां थीं और हम
याद की कुछ बदलियां थीं और हम
अशोक आलोक की गलों का यह जुनून बेहतर दुनिया की वैकल्पिक तलाश के साथ सुखद संसार की खोज करता है। हिन्दी $गल की विकास यात्रा में संग्रह की गलें मील का पत्थर साबित होगी।