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Wednesday 22 Nov 2017

छोटे आकार में बड़े मूल्यों की कहानियां


शशिभूषण बड़ोनी
आदर्श विहार, ग्राम
व पोस्ट शमशेरपुर
देहरादून (उत्तराखंड)

देवांशु का सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह ‘बारिश थमने के बाद’ सोलह छोटी-छोटी कहानियों का महत्वपूर्ण व रोचक संग्रह है। ये कहानियां अति सहज, सरल व पठनीय हैं। जहां आजकल सूचना व दर्शन, ज्ञान आदि से लदी लम्बी कहानियां लिखी जा रही हैं, और वह भी ऐसे अपठनीय समय के दौर में, जबकि साहित्य से वैसे ही पाठक दूर भाग रहे हों, देवांशु की ये छोटी-छोटी बिल्कुल आम-बोलचाल की भाषा शैली की सहज, सरल लेकिन बड़े मूल्यों की जीवन का यथार्थपरक चित्रण करती रोचक व पठनीय कहानियां हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठक को कभी-कभी यह भी आभास होता है कि हमारे आसपास इस तरह की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोज ही घटती रहती हैं। लेकिन कहानीकार ने इन आम घटनाओं को इतने सहज, सरल ढंग से अपनी कहानी कला के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है कि कहानी के अंत में पाठकों के सामने सोचने के लिए अनेक मानवीय मूल्यों से संबंधित प्रश्न चिन्ह खड़े हो जाते हैं और दरअसल कहानी के अंत में पाठकों के सामने जितने महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े होते हैं, वह कहानी उतनी ही सार्थक भी कहलाने योग्य होती है।
इन कहानियों की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो इन कहानियों में ज्यादातर पाई गई है, वह यह कि इन के अधिकांश पात्र आर्थिक रूप से निर्बल अधिक हैं। आर्थिक रूप से सबल न होने के बावजूद अधिकांश पात्र संघर्ष, कठोर श्रम व जिजीविषा से भरपूर दिखाई पड़ते हैं।
‘दवा-दारू’ कहानी का पात्र बुखार में तपने के बावजूद रिक्शे में सवारी ढोता रहता है। बारिश में भी वह रिक्शा चलाने को तैयार रहता है... जबकि और कोई रिक्शा चलाने को तैयार नहीं होता। वह रिक्शा से सवारी उतारता है... सवारी को उसका गर्म हाथ देकर तपन का अहसास होता है, लेकिन रिक्शा वाला बेपरवाह उस बुखार की हालत में दवा की जगह अपनी एक दारू की शीशी से दवा के रूप में सेवन करता दिखाई पड़ता है।
कहानी ‘तरक्की’ का पात्र दयाशंकर मिश्रा भी ऐसे ही पात्रों का प्रतिनिधित्व करता दिखाई पड़ता है।  ‘दृश्य से बाहर’ कहानी में किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या का एक कारण उनकी समस्याओं को भ्रष्टाचार के कारण किस प्रकार नजरअंदाज किया जा रहा है, इसका एक घटना के माध्यम से कहानीकार ने दिखाने का प्रयास किया है। ‘खबर’ कहानी में एक भिखारी के मरने पर उसके अंतिम संस्कार के लिए प्रशासन द्वारा किस प्रकार उपेक्षित किया जाता है, इसका यथार्थपरक सूक्ष्म चित्रण किया गया है। ‘नेपथ्य’ इस संग्रह में अन्य कहानियों से कुछ लम्बी कही जा सकती है। इस कहानी में ‘रंगमंच’, नाटकों के मंचन केन्द्रों को किस प्रकार समाप्त कर उसकी जगह पर बाजार बना दिए जा रहे हैं, इसको कथ्य बनाया गया है। लेकिन कहानी में यह विश्वास नहीं बन पाता कि ऐसे केन्द्र शायद ही अब कहीं शेष हों, जहां पर कि नियमित नाटक, रंगमंच होते हों। वह भी नियमित रूप से। हां यह हो सकता है कि कहानीकार प्रतीकात्मक रूप से बताना चाहता हो। ‘शहर’ कहानी में कफ्र्यू होने पर घर में बेटी के यथासमय घर न आ पाने के कारण मां पिता के अन्र्तद्वंद्व का मानसिक तनाव का चित्रण स्वाभाविक हुअआ है। एक अंश दृष्टव्य है- ‘उनके हाथ-पांव में दर्द भरने लगा था। वो अपने पैरों को मोडक़र सोफे पर लेटने की कोशिश करने लगे। उनकी पत्नी बिस्तर पर लेटी हुई थी। दोनों एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे। दोनों थक चुके थे, आसपास के सभी घरों में लोग नींद में डूबे हुए थे। शाम से ही लोगों का आना-जाना बंद था। उस वक्त शहर की हालत ऐसी नहीं थी कि कोई उनके काम आ सके। दंगे के बाद शहर की स्थिति क्या होती है, यह सिर्फ दंगे में पीडि़त लोग ही जान सकते हैं।’’
शीर्षक कहानी ‘बारिश थमने के बाद’ छोटे से कथ्य की एक संवेदनशील कहानी है। एक स्त्री अपनी छोटे से बच्चे को गोदी में लिए हुए कथावाचक के कमरे के बाहर बारिश में खड़ी होती है। बारिश थमने तक कथावाचक के प्रति स्त्री में डर, खौफ का एक मूक संवाद होता है। बाद में नेरेटर को आभास होता है कि स्त्री की गोद में जो बच्चा है, वह तो मर चुका है। स्त्री की व्यथा की कल्पना की एक गहन विवेचना कहानी में होती दिखाई पड़ती है, हालांकि कहानी के अंतिम अंश में एक पागल स्त्री का जो संस्मरण है उसका कहानी में यथोचित सामंजस्य नहीं बन पाता है। ‘उफ:ओना’ बड़़े मूल्यों की खातिर अंजली नाम की पत्रकार की कहानी है जो अपना जीवन दांव पर लगा देती है। कहानी का समापन कुछ जल्दबाजी में हुआ है, अन्यथा यह एक बेहतर कहानी होती। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आम बोलचाल की भाषा में रोजमर्रा की साधारण घटनाओं को जिनमें जीवानानुभव के गहन विमर्श दिये गए हैं, को कहानीकार ने अत्यंत यथार्थपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। ये छोटी कहानियां दरअसल बड़े मूल्यों की महत्वपूर्ण कहानियां हैं, जिनका साहित्य जगत अवश्य ही स्वागत करेगा। देवांशु जी को इस संग्रह हेतु साधुवाद।
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