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Thursday 23 Nov 2017

‘‘लेकिन मैं तुमसे सच कहूं, यह मुझे बहुत अच्छा लगता है‘‘

 

कालूलाल कुलमी
हिंदी विभाग, गुरू घासीदास
विश्वविद्यालय,
बिलासपुर, छ.ग.-495009
मो. 8602575304

‘कहने की शैली हमारी जो भी हो, बहुत गंभीर अर्थ में किसी कृतिकार को ‘समझना‘ उसकी वंदना करने से ज्यादा बड़ा काम है और सचमुच बड़ा लेखक अगर उसमें कुछ भी दम है तो अभिनंदित होने से अधिक ‘समझा जाना ‘ पसंद करेगा। अभिनंदन की प्यास दिमागी दुकड़ेपन की द्योतक है। कहने की जरुरत नहीं कि ‘समझने‘ की एकमात्र नहीं अनिवार्य प्रक्रिया सीमारेखा का निर्धारण है।‘‘
विजय देव नारायण साही
‘‘अच्छे लेखक को कुछ भी बरबाद नहीं कर सकता है। जो एक चीज अच्छे लेखक को बदल सकती है वो है मृत्यु। अच्छे लेखकों के पास सफलता से गदगद होने या रईस होने का वक्त नहीं है। अगर आप सफलता के सामने लोट जाएंगे, तो वह आप पर चढ़ बैठेगी। इसलिए उसे उलटे हाथ की एक लगाएं।  तब हो सकता है कि वो रेंगने लगे।‘‘
    विलियम फॉक्नर,  अमेरिकी उपन्यासकार
  एक लेखक अपने मरने की घोषणा कर सकता है, अगर वह जिंदा है तो। जहां सीमाएं टूटती हैं वहीं से लेखक नये विचार शुरु करता है। वह अपने चिंतन को परिमार्जित करते हुए, नया सोचता है। समय के दबाव और व्यवस्था के दबावों को झेलते हुए वह अपने को बनाता है। वह आत्मप्रचार और बहुप्रचार की कभी चिंता नहीं करता? वह अपने काम की चिंता करता है? उसको यह कहने का समय भी नहीं रहता कि उसको उठाया नहीं गया! वह समाज में समझे जाने की चिंता करता है पूजने की कभी नहीं, यह दुर्भाग्य है कि समाज में पूजने का दौर जोरों पर है और पूजाने के पागलपन पर कहना ही क्या? एक लेखक पर बात करना उसकी रचनाओं पर बात करना है। लेखक के बारे में नहीं हम उसकी रचनात्मकता की रेंज के बारे में बात करते हैं। विचार हमेशा लेखक से बड़ा होता है, और विचार ही उसको बड़ा बनाता है, उसके कद और रेंज के शिखर तय करता है। जहां विचार और संस्थाओं के खेमे इस तरह के मूल्य तय करने में लगे हो वहां की सामाजिक समीक्षा और युगीन नवीनबोध को समझने में समाज झिझकता है। उसका यह सवाल वाजिब भी है। मुक्तिबोध कहते रहे कि आरोपण कभी-भी नहीं टिकता। सहज विकास ही जीवन और सृजन को संभव करता है। चाहे रचना हो या आलोचना यह सहजता आवश्यक है। कुछ चक्के बनाकर उसी में आख्यान रचना और युग की नब्ज को नजरअंदाज करना, यह किसी के लिए भी सही नहीं है। अपने समय और समाज से टकराते हुए रचना ही सृजनधर्म हैं। रचनाकार किसी खोल में कब तक जिंदा रह सकता है? उसको अपने वास्तविक चेहरे के साथ ही रहना होता है वहीं से अपनेे को अभिव्यक्त करना होता है।
हर दौर की तरह यह दौर भी समस्याओं का दौर है, जब समस्याओं का दौर है तो विचार करने का भी दौर है। नया सोचने का दबाव भी है नया गढऩे का दबाव भी है। पुरानी भाषा में नयी बात करने का कोई अर्थ नहीं है। ब्रेख्त कहता है कि अगर आपको नया कहना है तो हर स्तर पर नया सोचना और करना होगा। उसके लिए आत्मसंघर्ष से गुजरना होगा। किसी एक स्तर पर नया करने से नयापन नहीं आएगा। समस्या यह है कि रचना और आलोचना दोनों ही पुरानी शब्दावली में नया तलाश रही है या फिर धाराओं का ऐसा रेलमपेल है कि उसमें कुछ भी समझ नहीं आ रहा है कि नया और पुराना क्या है? बाजार की तरह यहां भी फैशन का दौर है। कभी कोई विचार फैशन में रहता है तो कभी कोई? रचनाकार किसी एक तरह की सीमित दुनिया में रहे तो फिर उसका रचनाकार होना संदेह पैदा करता है। वह न तो जुमलेबाज होता है न जुमलों को रचना और आलोचना का मानक मानता है। वह उस नयेपन को रचता है और जीता है, जिससे युग प्रस्थान बनता है। कृष्णा सोबती लेखक के बारे में क्या कहती हैं- समकालीन लेखक परस्पर भिन्न हो सकते हैं और उन्हें एक-दूसरे की भिन्नता की हिफाजत करनी भी चाहिए। भिन्नता की हिफाजत करते हुए हम एक-दूसरे के काम की सराहना भी कर सकते हैं, एक-दूसरे से कुछ ले भी सकते हैं। अपने काम से भिन्न काम को नकारना कुछ लेखकों को बहुत ही अच्छा लगता होगा, मुझे तो वह बहुत ही बुरा लगता है। ऐसी संकीर्णता लेखक या कलाकार को सीमित और कुंठित कर देती है, उसकी रुचि को एक निहायत तंग दायरे में कैद कर देती है। (सोबती-वेद संवाद से)
कहा भी गया है कि कलाओं और सृजन का मूलस्वरुप संश्लेषणात्मक रहा है, वह सिर्फ बुद्वि या बौद्विकता के अधीन कभी नहीं रहा। ऐसे में जो लोग कुछ खास तरह की सीमाओं के साथ सृजन करते हैं उनका सृजन उस विचार के अप्रासंगिक होने पर स्वत: ही धराशायी हो जाता है और वे अपने ही सृजन को नकारने लगते हैं। इसी कारण कलाकार तमाम सीमाओं से परे होता है। वह इसी कारण कलाकार होता है। फिर विलियम फॉक्नर के शब्दों में कहें - एक कलाकार में अपने काम का मूल्यांकन करने के लिए वस्तुनिष्ठता का गुण हर हाल में होना चाहिए। उसके अलावा किसी किस्म का गुमान न पालने की ईमानदारी और साहस भी चाहिए।
आज यह कितने लेखकों में है? कितने आलोचकों में हैं? कितने चिंतकों में हैं? जहां अपने-अपने कुनबों में हर कोई अपने को प्रतिष्ठित करने में लगा हो, सत्ता और सत्ता के लोगों का बोलबाला हो, वहां सामाजिक जीवन और सामाजिक चिंतन के लिए कितना स्पेस है। उस आभामण्डल को तोडऩे का साहस कितनों में है? आज का स्टेटस सिम्बल ही बदल गया है? उदय प्रकाश उसी को दर्ज करते हैं। पावर का मतलब ज्ञान हो गया है। पावर को नकारना ज्ञान नहीं रहा है। जो जितना पावर में हैं वह उतना ही बड़ा विचारक है। जिसके पास नैतिकता और ईमानदारी है वह उपेक्षित और सबसे किनारे है। यह दौर मूल्यों के चरम उफान का नहीं, नैतिक पतन का चर्मोत्कर्ष का है। पिछली सदी से यह सदी इस बात में सबसे भिन्न कही जा सकती है। वह दौर शोषण को चुनौती देने और सत्ताओं का उखाडऩे का था यह दौर बाजार के स्वागत और सब सब कुछ जल्दी मेंं करने का समय है। भयंकर कोलाहल का समय है। इसलिए अभी कुछ भी साफ नहीं है। ठहरने की जरुरत है। धुंध के खत्म होने के बाद ही आपको साफ  दिखाई देगा। धैर्य रखने की बहुत आवश्यकता है।
उदय प्रकाश का लेखन और चिंतन विस्तृत और सघन है। वे किसी भी तरह से पहचान के संकट से घिरे हों ऐसा कभी नहीं रहा? न उनको ऐसे किसी आत्मप्रचार करने का कोई करतब करना पड़ा। प्रतिभा से लबरेज लेखक सदैव ख्याति अर्जित करता है। उदय के साथ भी यही है। उनकी हर रचना लंबे समय तक चर्चा में रहती है और उनका कहा हुआ परेशान करता है। वे कोई गुमनाम रचनाकार नहीं हैं। उनकी रचनाओं का इंतजार सभी करते हैं। पाठक खुद ही चर्चा करते हैं या रचना स्वयं ही यह करवाती है। ऐसा कम ही लेखकों के साथ होता है। अक्सर लेखक अपने को प्रोजेक्ट करते हैं। जैसे व्यवस्था के पीछे पूरा तंत्र काम करता है उसको जस्टीफाई करने के लिए वैसा ही इन लेखकों के साथ भी होता है। जो इनको सही समय पर बाजार में उतारता है। ये हर बार नयी चमक का दावा कर आते हैं लेकिन हर बार जैसे वहीं के वहीं रह जाते हैं। चुनाव की तरह इनकी भी चर्चा तब तक ही होती है। वैसे बहस व्यक्ति पर नहीं उसके सृजन पर होनी चाहिए। लेकिन व्यक्तिवाद विचार से आगे और प्रभावी होने से व्यवस्था को सदैव उसका साथ मिलता है। मध्यवर्ग अपने में मग्न होता जा रहा है पी.सी. जोशी उसको इस तरह देखते हैं- भारत में आज अधकचरा आधुनिक परजीवी समाज है। इसीलिए आज यहां उत्पादक और उपभोक्ता से अधिक अहमियत बिचौलिए की हो चुकी है। पैसा इस हाथ से उस हाथ में घूम रहा है, लेकिन देशी उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। इस तरह से अमीरों को पूंजीपति या उद्योगपति की संज्ञा देना ठीक नहीं है। अभावों की अर्थव्यवस्था में ये लोग दलाली, सट््टा और सरकारी संरक्षण में पैसा बना रहे हैं। इस तरह से बनाया जाने वाला पैसा अक्सर काला धन होता है। क्योंकि उसके पीछे श्रम की भूमिका नहीं होती। इसका उत्पादक कार्योंं में उपयोग संभव नहीं। यह घूसखोरी, अय्याशी और अन्य अनुत्पादक कार्यों पर खर्च होता है। ऐसी व्यवस्था के तहत औद्योगिक सूझबूझ रखनेवाले व्यक्तियों, आविष्कारों तथा टेक्नोलॉजी की प्रतिभा रखनेवाले व्यक्तियों की भूमिका नगण्य होती जाती है। जब हेराफेरी ही सबसे बड़ी चीज हो तो वास्तविक प्रतिभा बेकार चली जाती है।- नयी सदी का पंचतंत्र, उदय प्रकाश, पृ.167
सामाजिक जीवन की आलोचनात्मक सक्रियता प्रतिभाओं को जगह देती हैं और उनका समाज में देश-काल के अनुसार स्थान निर्धारण करती हैं। प्रतिभा जगह घेरते हुए समाज की परम्परागत सोच में द्वंद्व पैदा करती है। सभ्यताओं के संघर्ष के इस दौर में विचार नहीं वस्तु विचार में तब्दील हो चुकी है। ऐसे में उस वस्तु का सौदागर ही नियामक हो गया हो वहां तो बहुत से सवाल पैदा होते हैं। उस समाज में भ्रामक आंकड़े और हकीकत में बहुत फासला है। इतिहास के अंत का कोलाहल, और अराजकतावादी ताकतों का विचार की जगह दुष्प्रचार का यह समय धैर्य और आत्मचिंतन की मांग करता है। मानव इतिहास में कभी-भी सब कुछ समाप्त नहीं होता है। दो-दो विश्वयुद्धों के बाद भी मनुष्य जिंदगी की लय को फिर से पकड़ता है और संभावना की राह तलाशता है। यह जो इतिहास के अंत का शोर हो या फिर बाजार का चरम समय! ढलान तो इसकी भी आएगी और तब तक धैर्य रखते हुए अपना काम करने की आवश्यकता है। अन्यथा इसका कोई भी परिणाम सुखद होगा यह कहना सबसे गलत और सबसे भ्रामक तथ्य होगा।
...जब तक वे थे, उनका होना कोई खबर नहीं थी। और इसी साल जुलाई 2004 को जब वे नहीं रहे, तब भी उनका न होना कोई बड़ी खबर नहीं थी। वे बहुत संकोची और शर्मीले थे। नए लोगों के सामने या भीड़ में उन्हें बोलते लगभग नहीं देखा गया था। किसी कोने में खिसककर वे चुप बैठे रहते थे। किसी के सामने वे तब तक नहीं खुलते थे जब तक उनको भीतर से भरोसा नहीं हो जाता था कि उसके सामने खुलते हुए वे बाद में सुरक्षित रह पाएंगे। लेकिन जो उनके निकट थे, वे यह अच्छी तरह से जानते थे कि साफ-सुथरे जल जैसे पारदर्शी अंतर्मन का यह अत्यंत संवेदनशील रचनाकार दरअसल एक जिंदा चलता-फिरता हाड़-मांस का पवित्र दरवेश या फकीर है। जमाने से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी। सत्ताओं से कोई दरकार नहीं था। उनकी हथेलियां कुछ पाने के लिए फैली हुई कभी नहीं दिखी। वे दाता थे। सिर्फ देना जानते थे। और कुछ नहीं तो फकत दुआ ही सही। -  नयी सदी का पंचतंत्र, उदय प्रकाश, पृ.11
यह रघुनंदन हैं। ऐसे लेखक थे और बहुत कम समय में चल दिये। यह पढक़र आश्चर्य ही होगा कि जहां मैनेजमेंट का जमाना हो और सब अपने को स्थापित करने में लगे हों उस समय में एक लेखक अपनी ही दुनिया में अपना काम कर रहा है। दरवेश का जीवन जी रहा है। लेकिन दूसरी ओर वे समाज की बात करनेवाले हैं जिनके पास अपने से फुर्सत नहीं है? जिनको वो सब चाहिए जिसके वे हकदार नहीं है, लेकिन उसको पाने की कला उनके पास है। वे सेलेब्रिटी है, सुर्खियों में बना रहना ही उनका होना है। ऐसे में दरवेशों की क्या मजाल! वे तो स्वत: ही विस्थापित है। आज जिस तरह से प्रतिरोध के स्वर को उस कोलाहल में कहीं डुबाया जा रहा है वहां एक ही भाषा और एक ही स्वर को मुखर करने का समाज का मिजाज बनाया जा रहा है। जिसके पीछे जनतंत्र की ताकतें भी लगी हैं। दरअसल हर कोई अपनी नैतिक शक्ति खो चुका है और जिनके पास वह शक्ति है उनका कहीं कोई नाम नहीं। यह तंत्र और विचारों का अनोखा कोलाज है जिसमें जौहरी एक ही है और वही अपनी चमक का कारोबार कर रहा है। ऐसे में जो कारोबार से बाहर है या फिर जिसका वास्ता समाज से है या फिर वे जीवन की सरलता और श्रमधर्मिता में अपने को रखना चाहते हैं उनके लिए इस हेराफेरी की दौर में जगह कहां हैं?
नयी सदी का पंचतंत्र जिस तरह से रचा जा रहा है वहां सब कुछ उतर बनाया जा रहा है। जिससे कि मनुष्य की लडऩे की ताकत को कुंद किया जाए उसके उदात्त संघर्ष को धूमिल किया जा सके और उसकी भविष्योन्मुखी सोच को कुचला जा सके। रचना और जीवन की प्रत्येक लय को खत्म करना और जीवन को इस कदर मूल्यविहीन करना ही , सभ्यता का मानदण्ड ही मूल्यहीनता बन जाए।
अपने समय के बारे में बुद्ध क्या कहते हैं- मैं ऐसे लोगों के बीच जन्मा हूं, जिनकी बौद्धिक मुक्ति की कोई संभावना नहीं है। मेरे चारों ओर सत्य के उद्घाटकों का समूह है और उनकी अनंत महत्वाकांक्षाएं हैं। मेरा जन्म ऐसे समय में हुआ है जब उनकी बौद्धिक सामथ्र्य उनकी शारीरिक जरूरतों के पंजों में कराह रही है। इनमें से कई अपने मंत्रों के अर्थ तक नहीं समझते, कुछ हाथ चाटते हैं, कुछ अत्यंत गंदे रहते हैं, कुछ लोगों के पास कोई मंत्र ही नहीं है। गाय, हिरण, घोड़े, बंदर, सूअर,और हाथी की पूजा करनेवाले लोग भी हैं। कुछ पैर मोडक़र, एक स्थान पर चुपचाप बैठ जाते हैं और महान बनना चाहते हैं। कई धुआं या आग पीकर, सूर्य की ओर लगातार आंख फाडक़र, पंचाग्नि जलाकर एक पैर पर खड़े रहकर या घुटनों के बल चल कर अपनी तपस्या की संपूर्ति करना चाहते हैं।
मैं यौगिक चमत्कारों में एक तरह का खतरा देखता हूं, इसीलिए मुझे इससे घृणा है। मैं इन्हें निंदनीय मानता हूं और इसके लिए लज्जित हूं।
राधाकमल मुखर्जी, दि कल्चर एंड आर्ट इन इंडिया  पृ -181
तर्कहीनता की अराजकता बौद्धिक जड़ता की पराकाष्ठा है। इस जड़ता को बहुत से विचारों से पुष्ट करते हुए इसको ग्लोरिफाई करनेवाले यथास्थिति को ही नयापन करते रहे हैं। प्रतिवाद को विरोधी विचार बनाना और उसके बारे इस तरह की स्थापना देना कि यह समाज विरोधी, बहुत पहले से चलता रहा है। बु़द्ध ने जब चुनौती दी तो उनको परम्परा से ही बाहर कर दिया गया और उसकी जगह चमत्कारों को ज्ञान में रुपांतरित किया गया। आधुनिक काल में जिस विचार ने समाज को आजादी का सपना दिखाया वह सपना कहीं हवा होता गया और पूरी शताब्दी ऐसे ही निकल गई। गांधी को नकारते हुए एक ऐसी व्यवस्था को बनाया गया जहां नकार ही सच था। उदय प्रकाश आलोचना और समालोचना के साथ विकास और राज्य की सभी शक्तियों के केन्द्र में मनुष्य को रखते हैं। सृजन का धर्म भी यही है।
...दरअसल, कलाओं और सृजन का मूलस्वरूप संश्लेषणात्मक रहा है, वह सिर्फ  बुद्धि या बौद्धिकता के अधीन कभी नहीं रहा। मुक्तिबोध इसी को ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान कहते थे। कलाएं लोक-आस्थाओं, धर्म-ग्रंथों, महाकाव्यों, किंवदंतियों और जिन्हें राजनीतिक-बौद्धिक स्फियर में अंधविश्वास या मिथ्या चेतना कहा जाता है, उन्हें भी अपनी संरचनाओं में संश्लेषित करते हुए अनंत अनेकार्थी कलात्मक संरचनाओं का निर्माण करती हैं। मोहनजोदड़ो या हड़प्पा में पशुओं से घिरा हुआ जो देवता बैठा है या कांसे की काली स्त्री में जो लास्य है, उसने भाषिक और नृत्य कला को भविष्य में कितनी निर्णायक प्रेरणा दी। कल्याण सुंदरम के विनायक की प्रतिमा या सांची में आम की टहनी पकडक़र खड़ी हुई यक्षिणी की व्याख्या आप किस तरह करेंगे? जहां तक साहित्य की बात है तो बोली गई भाषा का जो विलक्षण रूप चरवाहा संस्कृति के काल में रहा है, उस स्तर तक लिखित, आधुनिक और मौद्रिक भाषा भी नहीं पहुंच सकी है। जिस अरब जाति को संपूर्ण रूप से कवि जाति माना जाता था, यानी जहां समूचा समुदाय परस्पर संप्रेषण और विमर्श के लिए कबीलाई काल का सहारा लेता था, वे अरब शासक अपने बच्चों को भाषा की शिक्षा देने के लिए गड़रियों और चरवाहों के पास ही भेजते थे।  पृ-184,185 नयी सदी का पंचतंत्र
जीवन को किसी एक ही निगाह से देखना उसको मुकम्मल देखते हुए भी अधूरा ही देखना है। असल में मनुष्य को संवेदना से बाहर एक ऐसे यंत्र की तरह देखना किसी भी समाज की सबसे बड़ी भूल है। सिद्धांत जीवन से आता है और जीवन को समृद्ध करता है। उसका एकतरफा वक्र मनुष्य को सदैव संकट में डालता है। कलाकार किसी भी महान से महान राज्य शक्ति का अनुगामी नहीं हो सकता। वह कला धर्म का अनुगामी होता है। उसका यह संघर्ष और सृजन लोक और जन के सहभाग से ही अपने को समृद्ध करता है। मनुष्य संघर्ष की किसी भी चमक को अचानक खारिज करना मनुष्य को कम आंकना ही है। लौह आवरण का मंतव्य महान रहा लेकिन उसको भारतीय संदर्भ में न समझना यहां के महान लोगों की महान भूल थी। जिसका भुगतान मानव सभ्यता को करना ही है। इतिहास मौके देता है और चूक की सजा भी देता है। इतिहास हमेशा जमीन तैयार करने का समय देता है और उस समय अगर आप अपने में डूबे रहे तब फिर आप उस लक्ष्य से पीछे रह जाते हैं। असल में नया विचार बहुत कुछ लेकर आता है। उसको जिस तरह से समाज की अनुकूलता में लाया जाता है वैसा ही उसका परिणाम आता है। इस काम को गांधी अम्बेडकर समझते हुए करते रहे और भविष्य पर अपनी आंख लगाये हुए करते रहे। एक कलाकार भी यही करता है।
...मेरा विनम्र मानना है कि कोई भी सैद्धांतिकी या शास्त्र, जिसका सार-रूप अन्य कलाओं की व्यावहारिक मीमांसा और समीक्षा में बिल्कुल लागू न होता हो, उसमें कहीं न कहीं बुनियादी गड़बड़ी अवश्य मौजूद है। थियॉडोर अर्डोर्नो और सिडनी फेंक्ल्स्टीन और वाल्टर बेंजामिन या रोलां बार्थ जैसे विचारकों-आलोचकों ने कला समीक्षा और सौंदर्यशास्त्र के विकास के लिए यही प्रयत्न किया था। पृ-184 नई सदी का पंचतंत्र
एक खास तरह के फ्रेम में सोचने की परम्परा सी रही है। जिसको तोड़ते हुए रचना स्वाभाविक प्रवाह में बहती है और आलोचना रचना करती है। कलाकार और समाज के बीच संवाद और विवाद चलता रहता है। यह तराशने की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। ऐसे में इसको खारिज करना यानी आपका उस सामाजिक जीवन से बाहर होना है। श्रीकांत वर्मा कहते हैं
न यह शहादत थी
न यह उत्सर्ग था
न यह आत्मपीडऩ था
न यह सजा थी
तब
क्या था यह
किसी के मत्थे मढ़ सकता था
मगर कैसे मढ़ सकता था
जो मढ़ेगा कैसे गढ़ेगा।

या मुक्तिबोध कहते हैं
समस्त अग्नियां अकेले में जलती हुई
करती हंै अपनी ही
ऐसी की तैसी।
यह समाज निरपेक्षता और सत्य निरपेक्षता ही कलाकार को युग निरपेक्ष बना देती हैं। वह कहीं न कहीं अपने को बचाता चलता है और सुरक्षित रहते हुए अपने कर्म के निर्वाह में लगा रहता है। तो क्या टकराना कलाकार का धर्म नहीं है? क्या वह सदैव निरपेक्ष ही सृजनरत रहता है? उसकी अपने समय की विडंबनाओं पर टिप्पणी करना उसके सर्जन का हिस्सा नहीं है? या फिर वह इनसे बहुत आगे का कलाकार है? क्या कलाकार अपने समय से बाहर होता है? या फिर उसका कलाधर्म उसे बाहर कर देता है? क्या इन सवालों को ऐसे ही किया जाता रहता है? या इनके पीछे कोई बात है कि ये बार-बार सामने खड़े हो जाते हैं।
अप्रासंगिक, दृष्टिकोण और समीक्षा खंड में उदय अपने समय के उन सवालों पर बेबाक कहते हैं। वे समाज की हलचल, व्यक्ति का कर्म और विचार की समीक्षा सभी पर अपनी निगाह दौड़ाते हैं। उनकी कमी कही जाए या उनका व्यापक बोध वे गांधी के पास भी उसी तरह जाते हैं जिस तरह से माक्र्स के पास। वे साम्राज्यवादी दृष्टि की आलोचना उस तरह करते हैं जिस तरह से भारतीय सामंतवाद की करते हैं। जिस साम्राज्यवाद ने लाखों करोड़ों लोगों का खून बहाया, उनके जीवन को तबाह किया, उनको कहीं का भी नहीं छोड़ा, उस साम्राज्यवाद को उपनिवेशिक आख्यान ग्लोरिफाई करता रहा? क्यों? साम्राज्य शक्ति के सहारे नहीं चला करते, उनके पीछे संस्कृति और विचारों का सबसे बड़ा योग हुआ करता है। वर्ना वे तो रेत के टापू की तरह भरभराकर गिर जाते हैं। असल में यह विडंबना ही रही कि यूरोप की शोषण और लूट की दृष्टि को खंडित करने का साहस अन्य आख्यान नहीं कर पाए, इसी कारण वह आज भी पूरी दुनिया में तरह-तरह के विचार फैलाने का काम कर ही है। जिसका कोई विकल्प अन्य दृष्टियां पैदा ही नहीं कर पा रही है। वजह पश्चिम ने भारतीय दृष्टि को इस तरह से खंडित किया कि वह आपस में ही विरोधी होती गई जबकि उसको पश्चिम के विरोध में खड़ा होना था। पर ऐसा इतिहास की नियति के कारण नहीं हुआ। जिसका परिणाम यह हुआ कि पिछली शताब्दी में ब्रिटेन का साम्राज्य तो खत्म हो गया लेकिन उसने अमेरिका के साथ मिलकर अपने को आधुनिक साम्राज्य का दाता बना दिया। जिसमें जनकल्याण का पूरा समावेश किया और यूरोपीय मनीषा ने इसमें पूरा योगदान दिया। यही कारण रहा कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों से हमेशा ससम्मान ही लौटता रहा, और वह इसको बहुत ही सलीके से अपनी पक्षधरता में सद्उपयोग करता रहा। और उनके नायकों के सामने हमारे यहां के नायकों को बौना सिद्ध किया गया।
...अभी तक अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास पर जितनी भी फिल्में बनाई हैं उसके बारे में एडवर्ड सईद ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ‘ओरिएंटलिज्म‘ में लिखा है कि - भारतीय व्यक्तित्वों का ऐसा चित्रण, साम्राज्यवाद को नैतिक, सांस्कृतिक और कलात्मक समर्थन देने के लिए हुआ है। लगातार यह कोशिश की जाती रही है कि ब्रिटिश सभ्यता को एशियाई या पूर्वी सभ्यता से हर हालत में श्रेष्ठ साबित किया जाए। अगर कोई अंग्रेज-लेखक ऐसा नहीं करता और गुलाम देशों में अंग्रेज हुक्मरानों के चेहरे को पेश करता है तो उसे अंग्रेजविरोधी घोषित करने मेंं देर नहीं लगाई जाती।
मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर देवास में अपना बचपन गुजारने वाले प्रख्यात उपन्यासकार ई.एम. फास्र्टर ने ए पैसेज टु इंडिया में जरा सहानुभूति से लिखा तो उनके बारे में नए फिल्म निर्देशक डेविड लीन का कहना है, फास्र्टर राज विरोधी और अंग्रेज विरोधी थे।  पृ-399 नयी सदी का पंचतंत्र
साम्राज्यवाद सबसे पहले आपके आख्यानों को खंडित करता है। उसने इतिहास के विभाजन को भी इसी तरह विभाजित किया। जिसमें बार-बार एक खास जाति को ‘विलेन‘ बनाया गया और एक जाति को उसका शोषक बताया। मध्यकाल के इतिहास को इस तरह प्रस्तुत किया गया कि उसमें स्वत: ही दो जातियां विरोधी बनती गई। इसको इतिहास की सहज प्रक्रिया के रुप में प्रस्तुत किया गया और अपने को इतिहास निर्माता घोषित किया गया। यह ज्ञान के माध्यम से सत्ता का अनंत खेल है जिसको चाहते हुए भी समाप्त नहीं किया जा सकता। आज वही काम सभ्यताओं का संघर्ष और इतिहास का अंत जैसे जुमलों से किया जा रहा हैं। शोषणकारी शक्तियां अपने युग में इस तरह के प्रयोग करती रही हैं और आज तो उसके  पास बहुत से विकल्प हैं इसी कारण वह निर्विकल्प हो रही हैं। हुड़दंग भी खूब मचा रही हैं।
एक लेखक रचनाकार का जीवन किस तरह का होता है? वह अपने समय की जड़ताओं को कैसे चुनौती देता है? जर्मन नाटककार ब्रेख्त जैसे उम्र के हर दौर में विस्थापितों का जीवन जीते रहे, जूतों से ज्यादा शहर और देश बदले। उनकी लोकप्रियता का आलम यहा था कि वे हमेशा सत्ता के सामने चुनौती बन खड़ें हो गए। उदय प्रकाश उनके उस घर को देखने गए जहां वे ब्रेख्त जीवन के अंतिम दिनों में रहे थे।
-मैं अब चाउसीस्ट्रास में रहने लगा हूं, फ्रंासीसी कब्रगाह के ठीक बगल में! मेरी सारी खिड़कियां इसी कब्रगाह की ओर खुलती हैं। लेकिन यह दृश्य प्रसन्न और उमंग भरा भी है। इमारत की पछीत में पहली मंजिल पर मैंने तीन कमरे ले रखे हैं, जो कि सामने वाली इमारत की ही तरह, कहते हैं डेढ़ सौ साल पुरानी हैं। कमरे खूब ऊंचे हैं, और ऐसी ही खिड़कियां भी, कितना खुशनुमा इनका अनुताप है। मेरा सबसे बड़ा कमरा नौ वर्ग मीटर जितना है, यानी मैं इसमें अलग-अलग कामों के लिए कई सारी मेजें लगा सकता हूं। वास्तव में यह सारी जगह ही निहायत आनुपातिक ढंग से बनी है। इसमें उन फर्नीचरों के साथ रहना कितना मजेदार है, जो फर्नीचर खुद ही एक सौ बीस-तीस साल पुराने हैं। चलो यह कहें कि अतीत के पूंजीवादी परिवेश में, वर्तमान का समाजवादी परिवेश यहां पर मौजूद है। अब मैं थियेटर बर्लिनेर एंसेंबल थियेटर, जिसकी स्थापना ब्रेख्त ने ही 1949 में की थी, के इतना नजदीक हूं  कि सारे नौजवान हमेशा मेरे आसपास ही मौजूद रहते हैं। वे झुंड बनाकर जब चाहे यहां चले आते है, लेकिन मैं तुमसे सच कहूं, यह मुझे बहुत अच्छा लगता है।‘ पृ-330, 331 नयी सदी का पंचतंत्र
उदय प्रकाश इसी घर में गए थे उनको भी वहां बहुत अच्छा लगा ही होगा। अपनी जमीन से उखड़ा हुआ फासीवाद से बचने के लिए कहां कहां नहीं गया और एक अदद घर या ठिकाने के लिए भटकता रहा ब्रेख्त। सच्चे लोगों की यही नियति होती हैं। तसलीमा हो या सलमान रुश्दी ऐसे लेखक राज्य से विस्थापित ही किये जाते हैं।
बुनुएल के अनुसार हर व्यक्ति को दिन-भर के चौबीस घंटों में कम से कम बाईस घंटे स्वप्न देखने, कल्पनाएं करने, सोचने और अपने भीतर संचित मानवीय ताप और ऊर्जा को महसूस करने के लिए मिलने चाहिए।  ईश्वर की आंख पृ. 22    
जब कोई व्यक्ति निरपेक्ष होकर चुनौती देता है इतिहास को तो सारे नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है।
रूसो का कहना है कि - कोई भी समाज या कोई भी युग दो ही अवस्थाओं में होता है। परिवर्तन से पहले और परिवर्तन के बाद।  ईश्वर की आंख पृ. 34
उदयप्रकाश अपने लेखक और कर्म में वे सवाल उठाते हैं जिनको उठाने में अक्सर परेशानी होती है। पश्चिम के तमाम विद्वानों को पढ़ते हुए वे जिस तरह से समाज और संस्कृति की महीन व्याख्या करते हैं उसमें सरल हो सकती है लेकिन कहीं भी जड़ नहीं है। वे लेखक के लिए किसी भी तरह के पूर्वग्रह और विचार की सीमा को खारिज करते हैं। वे लोक जीवन के स्त्रोत को रचनात्मक जीवन और लेखन के लिए बहुत महत्व देते हैं। उनके पढऩे का दायरा बहुत विस्तृत है। लेकिन वे जिस तरह से इस देश की मन:स्थिति को पकड़ते हैं वह भी अद्भुत है। उनके यहां भारतीय समाज और उसका सबसे कमजोर वर्ग जिस तराश के साथ आता है वह उनका सर्जन है। इसी कारण वे किसी भी तरह से न तो आक्रांत है न ही निरपेक्ष। एक लेखक की तरह उनमें बेचैनी हमेशा रहती है। वे माक्र्सवाद की सीमाओं को जिस तरह से सामने लाते हैं वह जीवन के सत् का आभास है। इसी कारण वे कोरे आदर्शवाद को नकारते हुए तमाम तरह की लौह दीवारों को भेदते हुए मनुष्य के पक्ष में खड़े रहते हैं। साहित्य जगत उनकी उपेक्षा करता रहा लेकिन पाठकों ने उनको वह स्थान दिया, जिसके वे हकदार है। एक लेखक लेखकों और आलोचकों से स्वीकृति प्राप्त करता है या फिर अपने पाठकों से? यह सवाल बना हुआ है। वे कहते हैं - लेकिन आप लोग कृपया विज्ञान के ऐसे सटीक नियम-सूत्रों को मनुष्यों के निजी जीवन पर लागू करके उसके रहस्य और उसकी रोमांचक अनिश्चयता को नष्ट मत करिए। यह बहुत भयावह और असहनीय होगा। ऐसे में हम अपने जीवन के प्रति सारे लगाव और सारी रागात्मकता से हाथ धो बैठेंगे।
असल में यह विज्ञान शब्द इतना उपयोग में लाया गया कि इसने अपना अर्थ ही खो दिया। यह किसी लादे हुए शब्द की तरह बन गया। साथ ही संगठन और पार्टी लाईन की वह हार्ड लाईन भी मनुष्य के जीवन सौंदर्य को नकारती गई। शक्ति के सामने मनुष्य और उसकी संवेदना निस्पंद होती गई उसी का परिणाम हुआ कि सब कुछ नष्ट होता गया। नामवर जी इसी कारण कहते हैं कि मैं कृतियों का मूल्यांकन सौंदर्य की दृष्टि से करता हूं। मैं उस पुरानी और अनुपयोगी शब्दावली को भी छोडऩे की बात करता हूं। समय के साथ हमें नयी भाषा और नया बोध भी पैदा करना होगा।
..हर अच्छी कला इसीलिए अपने सर्वोत्तम रूप में प्रकृति के उस आभासित प्रकट सौंदर्य के अनुरुप है, जो हर पल पुनर्नवा है। वह हर पल पिछले पल से भिन्न है। हम किसी पहाड़ को बिना ऊबे क्यों वर्षों निहारते रहते हैं? कोई पेड़ या कोई नदी हमें अपने उसी रूप के जादू में क्यों जीवन-भर बांधे रहती हैं?
शायद इसीलिए कि वे इतने निष्कवच होते हैं, इतने निदाघ....... कि समय, हवा, ऋतुएं, धूप के चढ़ते-उतरते रंग, ऊष्मा और शीतलता, हमारी अपनी संवेदनाएं और हमारा जीवन.......सब उन्हें बार-बार नयी तरह से रचते हैं। उनकी कोई अपरिवर्तनीय, ठोस, पूर्वरचना नहीं होती। सिर्फ एक आकार होता है, कोई एक आकृति जो हमेशा अपनी पुनर्रचना के लिए आमंत्रित करती रहती है। आमंत्रित ही नहीं करती,  हर साहचर्य में वह फिर-फिर से रची जाती है। जिस तरह धूप किसी पहाड़ या पेड़ या नदी का कई तरीके से पाठ करती है और हर पाठ में वह उन्हें नये तरीके से रचती है। हम भी किसी उत्कृष्ट रचना के साथ अपने हर पाठ के द्वारा उसे नये तरीके से रचने के लिए स्वतंत्र होते हैं। हर पाठ द्वारा उसका पुन:सृजन होता है। वह पुनर्नवा होती है। लेकिन यही बात खराब रचनाओं के बारे में नहीं कही जा सकती।
...जीवन में नवीनबोध वहीं से होता है जहां निरंतर यह स्प्रिट बनी रहे। रचना का जीवन में बना रहना जीवन को नया बनाये रखना ही है। वर्ना वह कूड़ा है। जीवन की विडंबनाओं के बावजूद मनुष्य नवीनता को सृजित करता है। वह सीमाओं को तोड़ते हुए प्रकृति के साहचर्य और मौसमों के साथ अपने को जीवनआंनद की तरंग में बहा ले जाता है। लेकिन आधुनिकता के बहाव और मनुष्य की जीवनचर्या में जिस तरह से परिवर्तन हुआ उसने मनुष्य को कहीं विस्थापित, कहीं प्रकृति से दूर और एकांकी बना दिया। वह मौसमों को भूल गया। उसके पास समय का अभाव हो गया। वह भौतिकता में डूब गया और उसको ही जीवन का सत्य समझ बैठा। उसने त्याग और जीवन संघर्ष को अपने जीवन से विस्थापित कर दिया। उसके बाद उसका समाज के उस विशाल सामूहिक जीवन से वास्ता ही नहीं बचा। यही वजह है कि वह अपने में अकेला और निस्पंद होता गया। इसी कारण जीवन और जीवन की लय को भूल गया। वह कला और कला के संघर्ष को महसूस नहीं कर पा रहा है। इसी कारण उसके जीवन में निराशा और अंधेरा छा गया। इसके लिए जीवनचर्या को उस तरह से करना होगा ताकि उसके जीवन की रागात्मता उसके हृदय को विस्तार देती रहे। वह एकाकीपन से बाहर व्यापक जीवन का हिस्सा बन पाए।
...नामवर सिंह के आलोचना जगत को जानने और समझते हुए उनके साक्षात्कारों को पढऩा नया अहसास कराता है। वे जिस तरह से कलाकार की कला का सम्मान करते हैं वह उनकी दृष्टि की व्यापकता और श्रेष्ठता है। निर्मल वर्मा को वे महत्वपूर्ण कहानीकार मानते हैं तो उनकी कहानी कला के कारण। अमरकांत को वे नहीं मान पाए, उसकी वजह उनकी कहानी कला थी। नामवर के अस्सी के दशक के ये साक्षात्कार उस दौर की साहित्य और राजनीति की वास्तविकता बयां करते हैं। वे भारत भवन के बनने और बर्बाद होने के साक्षी रहे और परिमल के खत्म होने के भी। वे हर उस बहस और विमर्श के केन्द्र में रहे जो उस दौर में होता रहा। हस्तक्षेप करते रहे और नया कहते रहे और सोचते भी रहे। वह कहानी आलोचना हो या फिर आलोचना का संपादन और प्रतिपक्ष से निंरतर बहस करना। नामवर की खासियत रही कि वे हर दौर में अपने को बनाये हुए कुछ न कुछ करते रहे। लाईन लंबी ही खींचते रहे। वे आलोचना को एक खास तरह की शब्दावली में ढालने के विरोधी रहे और कविता पर लगातार लिखते रहे। इसी कारण वे नया सोचने को मजबूर करते रहे। उनका कहना है कि कलाकार को अपने को साधक की तरह साधना होता है। कलाकार को उसकी कला साधना ही बचाती है। निर्मल वर्मा को उनकी भाषा ने बचाया। लेकिन बाद में वे वहां से भी नीचे आ गए। किसी खास तरह के फ्रेम में रह कर लिखना कला को नीचे ले जाना ही है। नवीनता जीवन से ही आती है। उसको बार-बार रचना होता है। अशोक वाजपेयी, बने रहे और नया देते रहे। लेकिन रमेशचंद्र शाह कुछ नहीं कर पाए। वे आस्वाद ही लेते रह गए। कुंवर नारायण का योगदान कौन नकार सकता है। आलोचक को अच्छी और बुरी कृतियों की पहचान नहीं है तो वह कैसा आलोचक है? आज जिस तरह से थोक के भाव लिखा जा रहा है और आलोचना केवल संबंधों तक रह गई है उससे क्या कहा जाएगा। उसका व्यापकबोध एक खास तरह की सीमाओं में सिमटकर रह गया है।
..आज के संपादक के पास कोई काम नहीं रह गया। उसको सब कुछ मिल जाता है बस वह प्रेस में लगाकर सोचता है मैंने कितने लेखक पैदा कर दिए। यही कारण है कि आलोचना केवल समीक्षा रह गई। वह भी संपादकों की कृपा पर। उसकी धार और धारा का कहीं कोई प्रवाह नहीं बचा। नामवर कहते हैं -मुझे खेद है कि वह संपादकीय विवेक मुझे कहीं नहीं दिखाई देता, वरना कहानी और कथा आलोचना की हालत आज यह न होती। अकेला आलोचक सब कुछ नहीं कर सकता। कहानियों के क्लियरिंग हाउस का काम पत्रिकाएं करती हैं, और वह नहीं हो पा रहा है। पृ.150ईश्वर की आंख
 इसी तरह लेखक के बारे में नामवर कहते हैं एक लेखक जीवनभर अपनी भाषा को गढ़ता है, बनाता है और फिर वह उससे लंबे समय तक काम भी ले सकता है। लेकिन तब होना यह चाहिए कि अपनी अंतर्वस्तु के अनुरूप वह अपनी भाषा में विविधता, संवेदनशीलता और नवीनता लाने की कोशिश करे। पृ.151 ईश्वर की आंख
साहित्य की यह प्रक्रिया जीवन की विविधता से ही अनुप्राणित होती है। इसमें सभी को अपना योगदान देना होता है। जिस तरह से सर्जक अपने को निर्मित करता है आलोचक उससे अलग कैसे हो सकता है? आलोचना की एकाकी और एकरसता का कारण ही है कि वह कहीं न कहीं जल्दबाजी में है। उसका सोता जीवन के व्यापक संपर्क से टूट गया है। वह अपनी ही दुनिया में डूबी-सी है। इसी कारण वह टुकड़ों में बंट गयी है। इतने सारे मठ और इतनी सारी धाराएं बन गई। जबकि बाहर से एक सा है। लेकिन जिस तरह से भीतर जो धमाचौकड़ी मची है उसने साहित्य और आलोचना का कितना भला किया? वह विराटता और व्यापकता जो आलोचना को युग समीक्षक बनाता है उसके अभाव में आलोचना अपने इस धर्म का निर्वाह कैसे कर पाएगी?
रंगमंच और साहित्य की अन्य विधाएं सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहरा प्रभाव पैदा करने का काम करती है। ब.व. कारंत और बंसी कौल से बात करते हुए रंगमंच की दुनिया का रंगमंच सामने ले आते हैं। ब.व. कारंत का कहना है कि हिंदी क्षेत्र में रंगमंच का न तो सम्मान है न दर्शक ही है। वहीं बंसी कौल जमीन से उठकर वहां तक आते हैं कि आज वे रंगमंच का पर्याय है। हबीब तनवीर सब कुछ छोडक़र छत्तीसगढ़ में अपना काम शुरु करते हैं। बंसी कौल नट और अन्य वे जातियां जो इस तरह के करतब दिखाती है उनके साथ काम शुरु करते हैं वहां से अध्ययन कर रंगमंच को समृद्ध करना चाहते हैं। ..जबकि मसखरे और विदूषक में बहुत फर्क है। विदूषक सिर्फ हास्यास्पद शारीरिक मुद्राएं ही नहीं अपनाता, वह एक सोचने-समझनेवाला व्यक्ति भी होता है। वह दर्शक की ओर से रंगमंच और रंगमंच की ओर से दर्शक का आलोचक होता है। वह एक साथ दोनों का प्रतिनिधि होता है। दर्शक और रंगमंच के बीच पुल का काम करने वाला असली माध्यम विदूषक ही है।  पृ 196, ईश्वर की आंख
रंगमंच की जनपक्षधरता और कलात्मकता के साथ उसकी सरकारी परिणति ने भी उसको कम प्रभावित किया हो ऐसा नहीं है। जहां रंगकर्मी जी जान से मेहनत करते हैं वहीं सरकारी तंत्र उसको ध्वस्त करने में भी कोई कमी नहीं करता? वैसे भी इस देश को वही लोग चला रहे हैं जिनको न कला, साहित्य संस्कृति और इतिहास का ज्ञान है! लेकिन तंत्र और तंत्र सम्पन्न लोकतंत्र उन्हीं के पास है। इसी कारण हर फाइल में लोग अपने होने का हिसाब चाहते हैं पर उनको वह नहीं मिलता! प्रतिभाएं ऐसे ही बर्बाद नहीं होती! उनकी तबाही में बहुत लोगों का हाथ होता है। यह कलाओं और कलाकारों के हश्र का कारण है। वर्ना सुखनवरों के हाल ऐसे न होते। जिस अकादमी जगत के बारे में इतना गुमान किया जाता है वह किस कदर सड़ चुका है उसकी अंदर की गति में कितनी जड़ता पैदा हो चुकी है इसका अंदाजा लगाना भी कठिन है।  रोलां बार्थ का कहना है कि - एक प्राध्यापक और एक बौद्धिक की भाषा के बीच दरअसल कोई प्रतिस्पद्र्धा या अंतर्विरोध नहीं होता। कभी-कभी और अक्सर तो ये दोनों एक ही व्यक्ति में इक_ा मौजूद दिखाई देते हैं। लेकिन लेखक तो दूर खड़ा होता है। बिल्कुल अलग। दरअसल लेखन शुरु ही उस बिंदु से होता है जहां से भाषा असंभव हो जाती है।  पृ. 223 ईश्वर की आंख
यह दबाव रचना आलोचना और रंगमंच के अकादमी जगत में इतना ज्यादा है कि सर्जन का कहीं कोई सरोकार बचा ही नहीं है। आलोचक देवीशंकर अवस्थी क्या कहते हैं- यह दुर्भाग्य है कि लेखक समाज से आज प्रोत्साहन नहीं पाता और जहां कुछ प्रोत्साहन है भी वह सृजन शक्ति को गलत दिशा में ले जाने वाला है। अपने देश में ही साहित्य अकादमी या ललित कला अथवा संगीत नाटक अकादमियां बनायी गयी हैं। ऊपर से देखने पर यह सब कला-साहित्य आदि को प्रोत्साहन देने के समान हैं पर वास्तव में इनमें पिष्ट-पेषण का कार्य होता है। जिन लोगों को अपने-अपने क्षेत्रों में प्रतिष्ठा और स्वीकृति मिल चुकी है, उन्हें ही इन अकादमियों द्वारा पुरस्कृत सम्मानित या प्रकाशित किया जाता है। संघर्ष में डूबे हुए जिनके मार्केट वैल्यू की ओर बहक जाने का डर है, ऐसे तरुण प्रतिभाशाली लेखकों-कलाकारों की वहां कोई भी पूछ या पहुंच संभव नहीं है।
....हमारे विश्वविद्यालयों में निराला, महादेवी या सुमित्रानंदन पंत पर पीएच.डी प्राप्त की जा सकती है पर वे स्वयं इस उपाधि के योग्य न माने जायेंगे। वैसे इससे इन लेखकों का गौरव हमसे न बढ़ेगा। मैंने केवल इस और इंगित किया है।
...वास्तव में आवश्यकता इस बात की है कि एकेडमिक अध्ययन और जीवंत लेखक एवं विचारधाराओं के संयोजन और सम्मिलन पर ध्यान दिया जाये। पृ. 228  ईश्वर की आंख
रोलां बार्थ और देवीशंकर अवस्थी के कथनों पर विचार करते हुए साहित्य और समाज और लेखक की स्थिति को समझा जा सकता है। कहां सिद्धांत और कहां जीवन का वास्तविक यथार्थ। दोनों में इतना फासला और कहा ऐसे जा रहा है जैसे सब कुछ बहुत सटीक हो रहा है। समाज जिस तरह से शक्ति को मूल्य स्वीकार कर चुका है वही स्थिति समाज के अन्य अनुभागों में भी आ रही है। मोहनदास को मोहनदास किसने बनाया। जहां अज्ञान और जड़ता का वर्चस्व हो, वहां नये विचार और नया करने की बात करना किसी बेमानी की तरह है। ऐसे में महादेवी या निराला अपने जमाने में जहां थे और जिस तरह से थे उसको आज जिस तरह से भुनाया जाता है वह कितना सुखद है। मुक्तिबोध ने जोखिम उठाया तो उनको किस तरह से उपेक्षित किया गया उनको असफल करने की कोई भी कोशिश नाकाम नहीं रही। लेकिन मुक्तिबोध अपनी राह पर चलते रहे। उदयप्रकाश का लेखन और जीवन भी ऐसा ही है। उनको भी जितना उपेक्षित करना किया गया लेकिन उदयप्रकाश को जहां जगह बनानी थी, उन्होंने बना ली और उनका लेखन जितना महत्वपूर्ण है उतना अकादमी में छाये लोगों का नहीं ही है। उदयप्रकाश के बारे में इस तरह कहा जा सकता है- शब्द हमारे शरीर में रोयों की तरह उगते हैं। और हमारे शब्द भी हमारे रोयों की तरह या तो सफेद होते हैं या काले। हो सकता है बड़े गोपनीय तरीके से उनका असली, छुपा हुआ रंग भूरा होता हो, लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ वे सफेद होते जाते हैं। जैसे हमारी उम्र के लोग..........! हम सब अब सफेद हो गए हैं। आप इन शब्दों से जो चाहे बना सकते हैं- लेकिन शब्द भी आपको जो चाहे बना सकते हैं।  युगोस्लाविया के विख्यात कवि और उपन्यासकार मिलोराद पाविच पृ. 93