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Saturday 18 Nov 2017

संस्कृतियों के वैश्विक बदलाव और सहकार का प्रेरक : राहुल का ‘घुमक्कड़ शास्त्र’

 बी.एल. आच्छा
36, क्लेमेंस रोड, सरवना स्टोर्स के पीछे
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राहुल कृत घुमकक्कड़ शास्त्र यायावरीय प्रकृति, प्रेरणा, सांस्कृतिक, सामाजिक अन्वेषण, घुमक्कड़ों की परम्परा और उनके अवदान, राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता एवं वैश्विक धरातल पर घुमक्कड़ों के प्रदेय से लक्षित एक जीवंत कृति है। एक तार्किक के रूप में शास्त्रों की जड़ता को पग पग पर लांछित करने वाले परिवर्तनवादी का जीवंत एवं गत्यात्मक शास्त्र है। धर्म की गुलामी को गुलामी से बदतर मानने वाले नयी किस्म के युगधर्मी का घुमक्कड़ धर्म है। दर्शन को बूढ़ा बुजुर्ग मानने वाले दार्शनिक का सतत परिवर्तनशील जीवन दर्शन है। अभाव भरी नीरस यात्राओं में प्रयोजनधर्मी सरसता का घुमक्कड़ रस है। तथाकथित विधि-निषेधमयी मर्यादाओं के रूढि़भंजक द्वारा रचित घुमक्कड़ों की मर्यादाओं का परिवर्तनशील शास्त्र है। एक महानास्तिक की निरन्तर परिवर्तनशील विश्वमानवता के प्रति गहरी आस्तिकता का संकल्प और प्रतिबद्धता है।
घुमक्कड़ शास्त्र किसी शास्त्रीय किस्म की रचना नहीं है, फिर भी विश्व के महान् घुमक्कड़ों की प्रेरणाओं, अनुभवों, उद्देश्यों, मार्ग-बाधाओं, और विश्व मानवता के लिए उनके प्रदेयों से लक्षित एक नवीन रस-घुमक्कड़ रस का परिपाक भी है, यद्यपि ऐसी स्थापनाएँ उसके केन्द्र में कहीं परिलक्षित नहीं होती। फिर भी इन निबन्धों से यह लगता है कि अमोघ जिज्ञासा या सत्य संधान ही घुमक्कड़ रस का स्थायीभाव है। सत्य-शोध के लिए दिग्विजय ही इसका सनातन, कथानक है। घुमक्कड़ ही इसका नायक है और घुमक्कड़ी ही उसका आलम्बन। महान् अन्वेषी घुमक्कड़ों के यात्रा वृत्तान्त ही इसके उद्दीपक हैं। किसी नायिका का प्रेमिल आलम्बन तो नायक को उसके लक्ष्य से ही स्खलित कर देता है। इसीलिए घुमक्कड़ नायक मेघदूत के यक्ष की तरह रामगिरि में अभिशप्त प्रेमी की तरह अलकापुरी की ओर नहीं निहारता, वह तो सनातन प्रवासी है, सदा सर्वदा का निर्मोही यायावर हैं। एक धीरोदात्त नायक की तरह घुमक्कड़ भी अनेक विधाओं में पारंगत, साहित्य, संगीत-कला-दर्शन का मर्मज्ञ, व्यापार-उद्योग-युद्ध विद्या में कुशल होना चाहिए। जिस क्षेत्र में वह संधान करता है, वही उसका देशकाल है, इसलिए उस क्षेत्र का भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं भाषा-बोली विषयक ज्ञान ही उसका सहायक है। लज्जा और संकोच, आत्मीयता और एकात्म उसके सहज गुण हैं। स्वाभिमान सहित भिक्षाटन या शारीरिक श्रम से आजीविका प्राप्ति उसका कुल-धर्म है। श्रमजनित कलाओं से भिन्न-भिन्न जातियों को समृद्ध कर उससे एकाकार हो जाना उसकी सहज कला है। मुक्त बुद्धि और तार्किकता उसका स्वभाव है। घुमक्कड़ को उसकी घुमक्कड़ी से अलगाने वाली अनेक बाधाएँ हैं- माता के आँसू, पिता का भय और उदासी, पत्नी का रोना-धोना, मातृभूमि का नेह। लेकिन जिज्ञासु और साहसी घुमक्कड़ इन सभी स्नेहिल बाधाओं को एक विशद और सार्थक आयाम देता है। घुमक्कड़ी के दिग्विजयी कथानक के विकास में महान् घुमक्कड़ों की प्रेरणाएँ ही लक्ष्यधर्मी बनाती हैं। तब बुद्ध की साक्षात् प्रतिमा उद्बोधित करती सी लगती है - ‘चरथ भिक्खवे चारिकं।’ चरैवेति का समूचा दर्शन घुमक्कड़ को गतिमान कर देता है। इस घुमक्कड़ी में विश्रुत घुमक्कड़ों की साहसिकता, वीर वृत्ति, कष्ट-सहिष्णुता किसी महाकाव्य में प्रबल संचारि-भाव की तरह यात्रा और लक्ष्य पथ पर धकेलती है। इस घुमक्कड़ रस का प्रयोजन भी ऐसे भावोद्रेक से है, जो मानवता को विशद अर्थ देता है, संकीर्णता और कूपमण्डूकता से बाहर लाकर विश्वक्षितिज पर प्रतिष्ठित करता है, कुछ पाकर संसार को अधिकतम दे जाने के कर्तव्य और तद्परक आत्म तुष्टि से परिपूर्ण होता है। फिर भी घुमक्कड़ रस का शास्त्रीय विवेचन एवं स्थापना का किंचित् मात्र उद्देश्य इस शास्त्र का नहीं है।
घुमक्कड़शास्त्र उस विश्वदृष्टि का उन्नायक और नियामक है, जो विभिन्न जातियों के पारस्परिक टकराव-जुड़ाव, शत्रुता और सहकार, सामाजिक-आर्थिक संरचना में उनके संक्रमण से हुए प्रभावों और भौतिक आदान प्रदान से मानवता को समृद्ध करता है, जहाँ जातियों की शुद्धता का दंश विगलित होकर समूची मानवता के मिश्रण में परिवर्तित हो जाता है। तब यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि ईसा से छह हजार वर्ष पूर्व वोल्गा के तट के आदिम घुमक्कड़ों के टोले कैसे गंगा के किनारों को आबाद करते हैं, कब भारत के डोमिन इटली के रोमिन हो जाते हैं। कब मंगोल घुमक्कड़ों की बारूद, तोप, कागज, छापाखाना, चश्मा जैसी चीजों से पश्चिम में विज्ञान युग की शुरूआत होती है। कब आचार्य शंकर के अनुयायी वोल्गा के तट पर निज्नीनोवोग्राद ईसाइयों में भी अपने अनुयायी बना लेते हैं। कैसे बौद्ध धर्म मकदूनिया से जापान तक ओर-छोर हो जाता है, अमेरिका के रूप में विश्व के नये क्षितिज की खोज होती है, मक्का का इस्लाम दुनिया में सल्तनतें कायम करता है। तब लगता है कि जातियों के बीच टकराव और शत्रुताएँ, मिलन और मिश्रण-विश्वमानवता को ही विशद धरातल देते हैं। इसलिए एक श्रेष्ठ घुमक्कड़ संसार में सारे नाना तत्व के बीच एकता को ढूँढ़ निकालता है। वह सभी जातियों के सभी संस्कारों, कर्मकाण्डों, आचरणों से गुजरते हुए उनसे सहमत न होकर भी उनके भीतर की एकता को स्थापित करता है। एक ऐसी गत्यात्मक अवधारणा जो जड़ता पर, संकीर्णता पर सदैव प्रहार करती है।
एक निर्भीक शास्त्रकार की तरह, एक अनुभव सिद्ध पारदर्शी की तरह, एक मस्तमौला फक्कड़ की तरह बेलाग और बेलौस जबान है राहुल के पास, जिसमें सदूर अतीत की सहयात्रा के साथ वर्तमान की गहरी समझ, जीवन्त भविष्य के उन्नयन की दृष्टि और जड़-पुरातन के खण्डन का साहस है। विश्वमानव की अवधारणा के विरोध में खड़ी समस्त मान्यताओं, जड़ताओं, शास्त्रों, धर्मों, का चोला उतारने में उनकी भाषा व्यंग्यात्मक और मूर्ति भंजक हो जाती है, यद्यपि उसके पीछे अगाध ज्ञान और दृष्टि का सबल तर्क है। इस मायने में वे भी कबीर ही की तरह अपने जमाने को फटकारने वाले नये अवधूत थे।  राहुल जी किसी को नहीं बख्शते, चाहे वे शास्त्र हों, इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति हों, सिद्धियों के चमत्कार हों, त्राटक के नाटक हों, प्राचीन या नवीन वाममार्ग हो, फलित ज्योतिष के मिथ्या विश्वास हों। पर इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि नियतिवाद, सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ता, कर्मकाण्ड, कूप-मण्डूकता, अज्ञान, छुआछूत, जातिवाद, नारी-दमन, वैधव्य-यातनाएँ और सती प्रथा, पुत्र-प्राप्ति से मोक्ष, बच्चे भगवान की देन जैसे अंधविश्वासों पर किये गये प्रहार भारतीय सामाजिक जीवन की स्थावरता को निर्ममता से कचोटते हुए उसे जंगम अवस्था में लाने की ही सनातन ललक है। दरअसल एक जीवंत शास्त्र की शक्तिमत्ता भी इसी बात में है कि वह धार्मिक सामाजिक जड़ताओं को कितना दचका दे सकता है, कितनी ताकत के साथ स्थावर मान्यताओं को खंगाल सकता है। एक नवीन सामाजिक, आर्थिक संरचना, सांस्कृतिक अन्वेषण और विश्वस्तर पर सहकार की गहरी छटपटाहट, अतीत की गहरी समझ के बावजूद वर्तमान की गत्यात्मकता से लक्षित राहुल कहते हैं- ‘प्रथम श्रेणी का घुमक्कड़ वृद्धों के सठियाने का पक्षपाती नहीं हो सकता। वह यही कहेगा कि फोसीलों का स्थान जीवित समाज नहीं, बल्कि म्यूजियम है। यदि फोसीलों का युग होता तो घुमक्कड़ शास्त्र लिखने वाले पर क्या बीतती, यह कहने की आवश्यकता नहीं।’ इसीलिए गत्यात्मकता और विश्वस्तर पर मानवीय सहकार उनकी मूल दृष्टि है। केवल खण्डन और मूर्तिभंजन से वे हर प्रतिमा को आघात नहीं पहुँचाते। बल्कि लिखते हैं - ‘सभी धर्मों ने अपने अपने कार्यक्षेत्र में उच्च साहित्य का सृजन किया। उच्च कला का निर्माण किया, आर्थिक साधनों को भी उन्नत करने में सहायता की। यही सेवाएँ हैं, जिनके कारण देशों में अपने धर्म के प्रति विशेष सद्भाव और प्रेम देखा जाता है। इसलिए धर्मों की सारी निर्दोष भावनाओं और प्रवृत्तियों के प्रति घुमक्कड़ की सहानुभूति होती है।’ वस्तुत:  यही दृष्टि चरैवेति के बीज भाव की उद्घोषिका है।
इस शास्त्र की भाषा भी शास्त्रीय नहीं है। उसमें जनभाषा का सा प्रवाह है, बोली की सी सहजता है। यह शास्त्र जिज्ञासु युवाओं के लिए घुमक्कड़ी की प्रस्थान-प्रेरणा है, इसलिए भाषा में भी वही रवानी है, जो एक महान् घुमक्कड़ की क्रियाशीलता में संचारित होती है। उसमें जड़ता की चिंदी चिंदी उड़ा देने की अजस्र ताकत है, वैयक्तिक मोहों के जंजाल को छिन्न-भिन्न कर देने की निस्संगता है, लोकसत्य को उजागर करने की जीवंत मुहावरेदानी है, सामाजिक-धार्मिक अवरोधों को ध्वस्त कर देने की अद्भुत तर्कशक्ति है, वाक्यों की ऐसी प्रवाही लडिय़ाँ हैं, जो जिज्ञासु के सुषुप्त स्थायीभाव को जगाकर उसे  महाभिनिष्क्रमण के लिए धकेले दे- ‘यह दीक्षा वही ले सकता है, जिसमें बहुत भारी मात्रा में हर तरह का साहस है, तो उसे किसी की भी बात नहीं सुननी चाहिए, न माता के आँसू बहने की परवाह करनी चाहिए, न पिता के भय और उदास होने की, न भूल से विवाह लाई अपनी पत्नी के रोने धोने की फिक्र करनी चाहिए और न किसी तरुणी को अपने पति के कलपने की।’ और इस सब के पीछे कोई निष्करुण भाव नहीं, बल्कि विराट उद्देश्य है, जहाँ घुमक्कड़-जिज्ञासा ही जिजीविषा का पर्याय बन गई है और इस निर्ममत्व के पीछे उतना ही मारक तर्क  भी कि ‘जहाँ करोड़ों की संख्या में वयस्क विधवाएँ मौजूद हैं , यदि घुमक्कड़ों के कारण कुछ हजार और बढ़ जाती हैं जो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा ?’ इन तर्कों में यह मध्यकालीन मानसिकता को आहत कर देने की अचूक वाक्शक्ति है। कहीं-कहीं तो नवीन सामाजिक संरचना और गत्यात्मकता के लिए हजारों वर्षों से चली आ रही कहावतों को इस नये आलोक के संदर्भ में पलट ही देते हैं- पुत्रवती युवती जग सोई, जाकर पुत्र घुमक्कड़ होई। या कि सपुत्रस्य गर्तिनास्ति।
कूपमण्डूक या गतानुगतिक समाज के लिए तो वे तेली के बैल का सदाबहार व्यंग्यात्मक मुहावरा दागने में चूकते ही नहीं। लेकिन कभी कभी तैश में आकर वे ब्रह्मास्त्र दागने में भी कसर नहीं छोड़ते। सतर्क खण्डन के बाद के यही व्यंग्यात्मक तेवर बहुत आक्रामक हैं - ‘यदि माता-पिता घुमक्कड़ी का विरोध करते हैं तो समझना चाहिए कि वह भी प्रह्लाद के माता-पिता के नवीन संस्करण हैं।’ कहना न होगा कि अपूर्व वाक्शक्ति है इन निबन्धों में। भाषण-कला का समावेश इन निबन्धों को अद्भुत सम्प्रेषण शक्ति प्रदान करता है। इनमें तर्क  का जाल नहीं, बल्कि तर्क  का प्रवाह है, समस्या से लड़ते हुए बाहर निकल आने का वाक् चातुर्य है, गम्भीर ज्ञान और अनुभव का वजन है, वाक्यों में पाठक को हाँक लेने की अद्भुत प्रवाह क्षमता है। राहुल जी लिखते हैं कि घुमक्कड़ मानव हित के इसी तरह लहर उठाता है, जो अपने अन्तर्धान होने से पहले यदि दूसरी लहर उठा देती है, तो उसे उसकी सफलता कहनी चाहिए। कोई कोई आरंभिक लहरें इतनी शक्तिशाली होती है और कोई कम शक्तिशाली। आदमी के कृतित्व का मूल उसकी उठाई लहरों की शक्तिशालिता हैं।’ इस प्रयोजन के अनुरूप उतनी ही शक्तिशाली वाक-तरंगों से जनमानस तक विचार सम्प्रेषण का सामथ्र्य परिचय इन निबन्धों की भाषा देती है।
‘विश्व-गाँव’ की आधुनिक अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो पर्यटन, सूचनाक्रांति, तकनीकी विकास, पिछड़े देशों के विकास, शैक्षणिक प्रविधियों, लोकतांत्रिक-व्यवस्थाओं, साहित्यिक आदान-प्रदान, आपद् स्थितियों में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रबंधन इस घुमक्कड़ी के ही परिणाम हैं। इससे पिछड़ी जातियों और विकासशील देशों में प्रगति की रफ्तार भी बढ़ी है और विकसित देशों की तकनीक का लाभ भी मिला है। आज दुनिया ही घुमक्कड़ हो गयी है, तो यह विकास की वैश्विक अवधारणा की ही परिणति है और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय चिन्ताओं का सुपरिणाम भी।