Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

ये भीड़ें नोटों की लाइनों की

मलय
शिवकुटीर टेलीग्राफ गेट नं. 4,
कमला नेहरू नगर
जबलपुर -482002 (म.प्र.)
ये भीड़ें
नोटों की लाइनों की
हकीकत में ये भीड़ें
आइनों की शक्ल हो रही हैं
जिनको देखकर
प्रधान मंत्री जी कंघी कर रहे हैं

जय जय कार

द्वार द्वार क्यों भटकूँ ?
चैनल्स परोसते हैं
राशन के साथ
गेहूँ में
थालियों के लिए
कंकड़ों से भरे भोज्य
जय जय कार पसरी हुई है
चारों तरफ
जिसके अन्दर
कंकड़ चबाते लोग
कहाँ दिख पाते हैं

मजाक उड़ाती है
शरीर की हड्डियाँ
एक पूरी मीनार की तरह हैं
जिसमें से आवाज आती है
खुद के खिलाफ
मैं दब्बू होकर
बुढ़ापे का
लबादा ओढक़र बैठा हूँ
तब हाँ तभी
मौत तालियाँ बजाकर
मेरा मजाक उड़ाती है

कौन  सुनता है
कौन सुनता है
आवाजें निरर्थक हो गईं
भाषा लथर-पथर होकर
समय से पीछे रह गई है
कटी-पिटी रेखाओं में
भविष्य में हमें तो
गाँठें ही गाँठें दिखती हैं
बहरे लोग बाजार में
परस्पर  उपहार बाँट रहे हैं
दुकानों की जगमगाहट में
आँखों पर
गुलामी के पर्दे पड़े हैं
सब देख नहीं पा रहे

दुखद है कि इस अन्धेपन  में भी
नाच रहे हैं सुबह से ही
सारा लोक
बाजीगरों के कब्जे में है

साँझ मृदंग पर
थाप देती नाचती है
और यह रात
कितनी लम्बी होगी
कौन जानता है
यानी सूरज का साथ तो
जरूर होगा
पर सोचा है
सतर्क और सक्रिय रहिए
लम्बा अँधेरा  लाँघना होगा