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Monday 21 May 2018

आत्मबोध

जानता हूंं
जैसा आज है
होगा कल वैसा ही
और शायद
अंतिम दिन भी ठीक वैसा
अधलिखी चिट्ठी
अधभूली स्मृति
अधमिटे सपने का रेखा गणित
शब्दों को समझने के लिए अनंत विनती

जानता हूं
मैं आसमान से
टूटा तारा नहींबारिश की अविरत
झरती जलधार नहीं।
पहुंचा हूं यहां माटी की पुकार से
पीया भी है छककर
रूप, रस, रंग उसका

जानता हूं, फिर भी बचा है
युग युग के लिए
अक्षय भंडार उसका।

मेरी आत्मा ने मन ही मन कहा है
मां मेरी, मेरे सारे गुनाह
माफ कर
शरारती बच्चा बन तेरे सीने पर
खूब ऊधम मचाया है,
ऐ मेरी जननी
माफ कर, माफ कर