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Tuesday 17 Jul 2018

बारिश की सांझ


दिन भर बरसते बरसते
थक चुके हैं बादल
गीली सांझ, बारिश में अर्धविराम लगा गया है।

झोपड़ी के छप्पर से धुआं उठ रहा है
छप्पर पर लिपटी तुरई की लताओं को घुटन हो रही है
धुआं पैर बढ़ाता जा रहा है
झुकते बादलों की ओर
बारिश थम गई है।

गांव की गलियों में पानी की धारा ने
पतली रेत पर बचकाने चित्र आंके हैं
बुझी संझाबाती की महक से
दोस्ती कर ली है मालपुआ की महक ने

क्या कोई कहींसे आ रहा है
किसके इंतजार में हूं मैं
रात आई है
मन-वीणा में मेघ मल्हार का
विलंबित स्वर घुमड़ रहा है
गीले पेड़ के भीतर गुनगुनाता रस
बारिश को ध्यान से सुन रहा है।