Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

गांव किसका है?

अनिल अग्निहोत्री
कमल वास्यम्, बी-115, समाधिया कॉलोनी
कृष्ण विहार, तारागंज, लश्कर,
ग्वालियर (म.प्र.) 474001
मो. 098262-32559
गांव-1

 गांव किसका है?
गांव मेरा है
नहीं-नहीं गांव मेरा है।

 वर्चस्व की लड़ाई
जनमत संग्रह
एक ने कहा-
गांव किसी का नहीं
गांव सबका है
गांव में गांव जैसी
बात होनी चाहिए।

पता नहीं
गांव में
शहर कब
हौले-हौले
दबे पांव घुस आया है?

 बे-खबर गांव को
अब नहीं होने देंगे
खबऱदार हम।

गांव-2

कहीं-कहीं $खरजा
कच्ची गलियां
गलियों में बहता पानी
कचरा और गोबर
खूंटे और बंधी भैंस
और राजनीति!
संसद से कम नहीं
ये है हमारा गांव

इन दिनों बेहद जरूरी है
बचाए रखना गांव को।
शिक्षा, संस्कृति, स्वास्थ्य
और स्वच्छता अभियान
महज कागजों पर हैं
गांव की गलियों में
उतरें ये सब
तो लौट सके
गांव की रंगत
गेंदे की फूल की
तरह।

गांव-3

अरे!
आ ही गये तुम रामतीर्थ
कोई शहर जाकर
लौटता भी है इस तरह
अपने गांव
अब आ ही गये हो
तो बैठ जाओ
इस चौबारे पर।

एयर कंडीशंड
बहुमंजिला इशरत
के अंदर
चालीस साल तक काम।
रोशनी की चकाचौंध
ये भी नहीं लुभा पाए
और तुम अंतत: आदी गए
बियाबान जंगल में।

नई सडक़ की रंग बिरंगी
चहल-पहल
टॉकीजों की रेलम्-पेल
छात्रों के जुलूस
और शहर की जीवंतता भी

नहीं कर पाई तुम्हें
आकर्षित, सम्मोहित।

और तुम!
यकायक
इन सबको छोडक़र चले आए।

 ये देखो- तुम्हारा स्कूल
जिसे तुम पांचवीं तक का छोड़ गए थे
और- ये शिव मंदिर
उसके पास का पोखर
कितना कुछ बदल गया है?
तुम्हारे गांव में

सडक़ भी
अब पक्की हो गई है
और हां
क्ंवरा नदी
जरूर सूख गई है
पर नियारी का खार
अब भी वैसा ही है
रामतीर्थ

 गांव में अब
नई पौध है
तुम्हारे समय के सब
लोग
गांव छोड़
अब बस गये हैं शहर में

दुर्गा माट साहब
और बच्चू  सेक्रेटरी
अब बूढ़े हो गए हैं
और रामवतार चचा

वो तुम्हें अक्सर करते
रहते हैं याद

लाईट यहां सिर्फ देखने भर को है
या सिर्फ
चुनाव के समय दिखती है
ऐसे में तुम कैसे
बिताओगे दिन-रात
यहां न टी.व्ही है
और न अखबार है
न चाय के ठेले
और न पान की दुकान
और दवा के लिए
तो सोचना भी मत

इतने अभावों के साथ
फिर ऐसा क्या था आकर्षण?
जो तुम्हें खींच लाया
इस मिट्टी की ओर।

 वृद्ध माता-पिता का आकर्षण
अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू
रती चाचा का लगाया हुआ
बरगद का पेड़
थान बाबा का चबूतरा
पुराना कुंआ, घर की दालान
गांव की गलियां
जिनमें मारा करता था
तुम्हारा बचपन हिलोरें
ये ही खींच लाई हैं तुम्हें।

सच कहता हूं-
एक बार शहर जाकर,
कोई लौटता है अपने गांव?
रामतीर्थ।
अब आ ही गये हो
तो तुम्हारा स्वागत है,
स्वागत है।