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Friday 17 Nov 2017

इंटरनेट का जमाना

आनंद तिवारी
पोस्ट- साइंस कॉलेज डाकघर
कटनी (म.प्र.)
मो. 9425464779
1. इंटरनेट का जमाना

कम्प्यूटर
मोबाइल
इंटरनेट जमाना है
भोंड़े इस
विकास का,
कैसा छिड़ा तराना है।

उथली सोचें
सतही बातें,
हल्के-फुल्के लोग।
श्रम से दूर
कृत्रिम सुविधाएं,
चढ़ा भोग का रोग।

मगजमार
बन बैठी पीढ़ी
दर्द पुराना है।

बड़े-बड़े हब
उद्योगों के,
सब्बाग सरकारी।
जनता तरस रही
खाने को,
रोटी न तरकारी।

धन्ना सेठों
धनपतियों का
बढ़ा खजाना है।

2. कचरा बीन रहे

पन्नी पुट्ठा
रद्दी कागज
कचरा बीन रहे।
बोरी धरे
पीठ पर अपनी
तिरकातीन रहे।

खेलें-कूदें
पढऩे जाएं
अवसर नहीं मिला।
कोई धनी न धोरी
इनका,
दिलवर नहीं मिला।

कचरा घर सी
हुई जिन्दगी,
कचरा चीन्ह रहे।

हाड़ माने वाली
सर्दी
कांपें तन, काटे।
भूखा पेट
न माने बैरी,
जूठन ही चाटे।

गड़ी फांस
भीतर तक आंसें,
सुविधाहीन रहे।
रही बस्तियां
गंदी इनकी,
सबसे अलग-थलग।
झांक-झांक
जीवन में इनके,
रोता रहा सरग।

सबकी छलनी से,
छन जाते,
स्वप्न महीन रहे।

3. मिली नहीं मजदूरी

कठिन राह
चलना जीवन भर
दुख से सुख की दूरी।
काटे भूख
पेट की आंतें
मिली नहीं मजदूरी।

आपा-धापी में
दिन गुजरा
रहे अभाव सदा।
बोझ कर्ज का
नहीं उतरता
सिर पर रहा लदा।

समय बड़ा बेढ़ंगा
घर से,
कैसे निकले नूरी।

नये जमाने के
आकर्षण
पेर रहे तन-मन।

मार पड़ी चौतरफा
उनको
जो ठहरे निर्धन।

प्रश्न अनेकों
खोज रहे हल
भीतर चलती छूरी