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Monday 20 Nov 2017

विराट के मुक्तक

चन्द्रसेन विराट
121, बैकुंठधाम कॉलोनी, आनंद बाजार के पीछे,
इंदौर-452018 (म.प्र.) मो. 09329895540


मन अजब हाल से गुजरता है
अश्रुमय हास से सिहरता है
क्या कहूं सुख सृजन की पीड़ा का
गीत जब होंठ पर उतरता है
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वे शिला पर लकीर हो जाते
श्रेष्ठता की नजीर हो जाते
एक संभव था वैसी कविता का
वरना कितना कबीर हो जाते
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मुझ अकिंचन का ठाठ हो जाये
और ऊंचा ललाट हो जाए
शारदा मां का हाथ हो सिर पर
मुझसा वामन विराट हो जाए
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तुम ही कविता हो तुम कहानी भी
आग भी तुम हो और पानी भी
तुम सुबह भी हो, और दुपहर हो
तुम ही तो सांझ हो सुहानी भी
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कोई कारक न कोई कारण है
दूर दुविधा से प्राण का प्रण है
यह सही प्यार है अयाचित सा
जो बिना शर्त का समर्पण है
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मेरे कानों में कहा करता है
दर्द जो मेरा सहा करता है
मैं नहीं जान सका, मुझसे इतर
कौन जो मुझमें रहा करता है
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कथ्य मानस में जब घुमड़ता है
शब्द शैली को चुन संवरता है
फिर उचित छंद को पहनकर ही
गीत खुद होंठ पर उतरता है।
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अश्रु की धार है जिन्दा जादू
आप्त अभिसार है जिन्दा जादू
जिससे संभव है हृदय परिवर्तन
एक बस प्यार है जिन्दा जादू
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सूर्य को क्षितिज पर बुलाता है
धूप का ध्वज वही उठाता है
उसका स्वागत करो, उठो, कैसा
हंसता गाता प्रभात आता है
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(2)
ताप में दहना कठिनतम ही है
कीर्ति को सहना कठिनतम ही है
शीर्ष पर जाना कठिनतम है तो
शीर्ष पर रहना कठिनतम ही है।
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शक्ति समृद्ध करना पड़ता है
लक्ष्य को बिद्ध करना पड़ता है
श्रेष्ठ को दे के नित परीक्षाएं
श्रेष्ठतम सिद्ध करना पड़ता है।
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हर जगह कष्ट का ही कारक है
उसकी पीड़ा हृदय विदारक है
आज ईमानदार होना भी
कितना त्रासद है, कितना मारक है
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एक नक्शे को चाक कर डाला
सैकड़ों को हलाक कर डाला
एक चिनगारी ने जलाकर यों
पूरी बस्ती को खाक कर डाला
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आखरी बार चमक ढह जाता
क्षण में ऐश्वर्य सभी बह जाता
टूटता जब भी सितारा नभ से
मोल मिट्टी भी नहीं रह जाता।
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खुद न लड़ते लड़ाये जाते हैं
धर्म पर बलि चढ़ाए जाते हैं
दंगे होते नहीं खुद, ये तो
प्रायोजित कर, कराए जाते हैं
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मुफ्त पत्ती भी नहीं हिलती है
इक कली भी तो नहीं खिलती है
ये है नगरों का नगर, देख यहां
मुफ्त मिट्टी भी नहीं मिलती है
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अपनी औकात भूल जाते हैं
निज बड़प्पन में झूल जाते हैं
लोग रखते हैं कुछ फूला के हमें
और कुछ हम भी फूल जाते हैं।
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पात्र पर हर दबाव ले आएं
मन मुआफिक पड़ाव ले आएं
•िांदगी है न कोई अ$फसाना
जो भी चाहें घुमाव ले आयें
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वे किसी और के जाए निकले
हाथ दुश्मन से मिलाए निकले
जब पड़ा वक्त तो पहचान हुई
अपना समझे थे, पराया निकले
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इस सियासत में सभी गायक हैं
सब ये कहते हैं, वही लायक हैं
दुख है नायक न बचा है कोई
सब विदूषक हैं या खलनायक हैं।
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भव्य भवितव्य भर की चिंता है
स्वप्न के कांच घर की चिंता है
आज के औसतन युवाओं को
उच्च निज करिय़र की चिंता है

भावनाओं से हीन हो जैसे
सिर्फ धन के अधीन हो जैसे
आज का आदमी कमाने की
एक चालू मशीन हो जैसे
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धूप का दम नहीं देखा करते
मेघ हैं कम, नहीं देखा करता
जिनको जाना है निकल पड़ते हैं
रुकके मौसम नहीं देखा करते
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आखरी के बतौर कर देखो
फिर समस्या पे गौर कर देखो
व्यूह टूटेगा,पूरी ताकत से
एक कोशिश तो और कर देखो।