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Saturday 18 Nov 2017

ओ मेरे दाता ! दी है फकीरी तो देना संकल्प भी

 

  यश मालवीय
ए -111 मेंहदौरी कॉलोनी इलाहबाद 211004
मो. 09839792402
चौंको नहीं प्रिया !
यह मेरा हाथ नहीं
बल्कि मेरी भाषा जैसी हवा थी
जो तुम्हारे रेशमी फैले केशों की
आरण्यक अलभ्यता से खेलने का
लोभ संवरण नहीं कर  पायी
और काकुलों को आकुल बना दिया ,
जैसे कि मेरी भाषा ने
मेरी कविता को आकुल कर दिया है
वाकई यह कविता - पंक्तियाँ नहीं, भाषा जैसी हवा ही है ,जो छू जाती है तो मन गंगा नहाया सा हो जाता है। श्री नरेश मेहता को याद करना वह भी साहित्य के शहर इलाहबाद में, एक वैष्णव ऋतुजा को याद करने जैसा है। जनसंकुल समाज में वह किनारे पर खड़े एक पेड़ जैसे थे, जो छाया तो भरपूर देता है पर बदले में कुछ भी नहीं लेता। अपने छात्र जीवन में किशोरावस्था के दौरान उनके लूकरगंज वाले आवास में उनसे अनेक बार मिला हूँ। कवि पिता उमाकांत मालवीय के पास किराये के महाबीरन गली वाले घर में भी वो प्राय: आते रहे। मेंहदौरी कॉलोनी वाले मकान के नींव पूजन वाले दिन भी आये थे। पिता के साथ चटाई पर बैठे थे और जमीन को छूते हुए बोले थे, पृथ्वी को कहीं से भी छुओं, एक ऋचा की प्रतीति होती है। गृहप्रवेश के अवसर पर भी उनके ठहाके गूँजे थे।
एक बार की बात है। भयंकर सर्दी वाले दिन मैं और अग्रज कवि मित्र हरीश चंद्र पांडे दफ्तर से लंच के समय उनके घर पहुँच गए। उन्हें अपने कार्यालय में हिंदी दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना था। महिमा जी अपने विद्यालय पढ़ाने गई थीं और बेटी वान्या अपने विद्यालय पढऩे गयी थी। बेटे ईशान का काम बाहर कहीं लग गया था, वह इलाहबाद छोड़ चुका था। घर पर वह अकेले थे। उन दिनों वह पिछले दिनों नंगे पैरों की कविताओं से गुजऱ रहे थे। हम दोनों तरुण कवियों को देखकर वह खिल गए थे और गले लगाते हुए बोले थे,
आओ! बड़े मौके से आये हो तुम लोग। आज तुम लोगों को मैं अपनी कुछ अलग तरह की कविताएँ सुनाता हूँ।  उस दिन हम लोग लगभग अभिभूत से देर तक उनकी कविताएँ सुनते रहे। उन्होंने जैसे अपना ही शिल्प तोड़ दिया था। कविताओं में एक पूरा कालखण्ड बोल रहा था आश्चर्य हो रहा था कि हम एक परम् वैष्णव कवि से आज बागी तेवर की कविताएँ सुन रहे थे। संस्कृतनिष्ठ हिन्दी नहीं, फारसीनिष्ठ उर्दू की शीरी जुबाँ के रूबरू थे हम। भूल गए थे कि हम उनके पास किसलिए आए हैं। कविता पाठ खत्म हुआ तो हम अपना निवेदन कर, उठने उठने को हुए कि वह मीठी सी हँसी हँसे और बोले, तुम लोग तो ए जी; ऑफिस में हो। एक दिन कवि शिवकुटी लाल वर्मा कह रहे थे कि जो वहाँ कविता सुनाता है, वह सबको चाय भी पिलाता है।
यह कहते हुए वह किचन की ओर बढ़ गए। चाय स्टोव पर चढ़ा दी और बतियाते रहे। चाय का उबलना देखते रहे, बोले देखो इसी तरह क्रान्ति होती है, पहले किसी एक कोने से कोई बुलबुला उठता है और फिर धीरे -धीरे समूचा परिवेश ही खौलने लगता है। आज जब भी जाड़ों में कोई कुहरे वाली दोपहर जीने को मिलती है, तो उनके हाथ की बनी चाय बेतरह याद आती है। बड़े प्यार से कहते थे, हमें चाय बनाने की ललित कला भी बखूबी आती है। पिता से कहते थे, तुम काहे के मालवी, मालवी तो हम हैं। मालव प्रदेश में तो हमारा जन्म हुआ है। अपने नाम के आगे श्री तो हमने पहले से लगा रखा है, क्या पता दूसरा लगाए न लगाए। उनका सेंस आफ ह्यूमर गज़़ब का था। अपने ऊपर भी मजाक कर लेते थे। बड़ी मौज में कहते थे, भाई! हम तो वानस्पतिक प्रतिभा के कवि हैं। पिता और उनके बीच एक ध्रुवतारे वाला कोड चला करता था, जो बहुत दिनों बाद उजागर हुआ। एक बार दोनों मुंशी लक्ष्मीकांत वर्मा के पीछे पड़ गए। कहने लगे हम दोनों आपका अभिनंदन करना चाहते हैं, आप हिन्दी कविता जगत के ध्रुवतारा हैं। बाद में पता चला कि ध्रुवतारे से आशय यह था कि जहाँ से चले थे, वहीं पर हो। अडिग हो, टस से मस नहीं हुए। कोई यात्रा ही नहीं की आगे, कहीं बढ़े ही नहीं। इस बात पर लक्ष्मीकांत जी ने मुँह फुला लिया था, तो दोनों उन्हें मनाने मधवापुर, उनके आवास पर भी गए थे। बालसुलभ लक्ष्मीकांत जी आसानी से मान भी गए थे।
उनका मोहल्ला लूकरगंज बंग-भाषियों का गढ़ सा रहा है। वह स्वयं भी कुर्ता धोती पर बाबू मोशाय लगते थे। बांग्ला संस्कृति से बहुत गहरे तक प्रभावित थे। उनकी एक कहानी है आबारऐशो। इसका मतलब होता है, फिर आना! विदा लेते वक्त वह आबारऐशो, कहना नहीं भूलते थे। कहते थे जब नवरात्रि के बाद दुर्गापूजा पंडालों से माँ को विदा करते हैं तब भी माँ से भी हम लोग आबारऐशो ही बोलते हैं और फिर माँ फिर-फिर आती है। वह घनघोर नास्तिक से आस्तिक हुए थे। पचपन -छप्पन तक वह कम्युनिस्ट थे और फिर धीरे से परम्परावादी हो गए थे। कहते थे पारम्परिक होना कोई अप्रगतिशील होना नहीं है। दद्दा माखन लाल चतुर्वेदी का एक संस्मरण सुनते थे। दद्दा के सिरहाने एक घड़ी टँगी हुई थी, जो रोज आधे -आधे घंटे आगे भागती थी। एक प्रगतिशील लेखक ने शिकायत की तो मुस्कुराकर बोले थे भाई हमारी तो घड़ी भी प्रगतिशील हो गयी है, आगे-आगे भागती रहती है।
यह संस्मरण सुनाते समय उनका चेहरा शरारत से दीप्त हो उठता था। जब उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला तो इलाहाबाद में बहुत सारे साहित्यकारों के पेट में घुटना सा उतर गया था। उपेंद्रनाथ अश्क तो इस खबर के सदमे से बीमार ही पड़ गए थे। नरेश जी इन सब बातों में भी खूब रस लेते थे। जिंदगी से लबरेज होती थी उनकी दिनचर्या। शाम को चौराहे पर चाय पीने वह जरूर जाते थे। वहाँ साहित्य चर्चा नहीं होती थी, केवल गप्प गोष्ठी होती थी। सूर्यास्त के समय कन्हैया भइया, बैजनाथ भइया उनकी राह देखते थे। चाय के बाद सुगंधित तम्बाकू चलती थी। देर तक चलता था इलाहाबादी बतरस।
दिल की तरह धडक़ता उनका जालीदार कमरा बहुत याद आता है, जो वसंत-मालती की गंध में भीगा होता था। एक आत्मीय ऊष्मा और अपनेपन के आभिजात्य में नहाया, आतिथेय की गरिमा से ओतप्रोत वह परिवेश एक अव्यय अतीत सा लगता है। एक बात और याद आती है। सम्भवत: साप्ताहिक हिन्दुस्तान के लिए एक परिचर्चा आयोजित की थी, विषय था प्राय: शामें उदास लगती हैं। पहले तो उन्होंने डपटा था कि क्यों शार्टकट साहित्यकार बनने के चक्कर में पड़ा हूँ , पर शाम की उदासी के सवाल सुनकर वह संजीदा हो गए थे। परिचर्चा के चक्कर में महादेवी जी, अमृतराय, रामस्वरूप चतुर्वेदी, रघुवंश, केशव चंद्र वर्मा, विजयदेव नारायण साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, शांति मेहरोत्रा, जगदीशगुप्त यानी सभी साहित्यकारों के घर के चक्कर लगाए थे। अंत में नरेश जी के घर पहुँचे थे। सवाल कुछ इस तरह से थे। हर शाम कुछ विदा हो रहा है, कुछ छूट रहा है, ऐसा महसूस होता है। ऋतु परिवर्तन के साथ शाम की उदासियों के साये भी बदलते हैं। मनोरंजन के साधनों का अभाव क्या इन उदासियों का कारण है। उदासी का हमारे मानसिक मौसम से भी कोई रिश्ता बनता है क्या? इन प्रश्नों के सबसे अलग उत्तर नरेश जी से ही मिले थे। उन्होंने कहा था कि यूँ तो प्रकृति का सारा व्यापर ही उत्सवमय है पर शामों का उदास लगना, यह तो कलाकार मन का द्योतक है।
सच कहें तो उनसे मिलना एक संत कवि से मिलने जैसा ही  होता था। वह तो एक फकीर ही थे, तभी तो अपनी एक अलिखी कविता में वह बराबर कहा करते थे -
ओ मेरे दाता !
दी है फकीरी तो देना संकल्प भी !
नरेश जी अपनी बैठक में ही बैठे सतत और अनवरत रचनाशील रहा करते थे। आने वालों का ताँता भी लगा रहता था। किसी के आने के बाद जहाँ पर वह अपना लेखन स्थगित करते थे, उसके जाने के बाद वहीं से न लिखकर, वह फिर से शुरू से रचना को एक बार फिर से लिखना शुरू करते थे। कविता में तो फिर भी यह बात समझ आती थी पर गद्यलेखन में फिर से रचना प्रारम्भ करना बहुत श्रमसाध्य हो जाता था, लेकिन वह इस सृजन संघर्ष से दुबारा -तिबारा भी बहुत मन से गुजरते थे। कहा करते थे, मुझे इस तरह के व्यवधान भी बहुत प्यारे लगते हैं। शायद प्रकारान्तर से रचना की बेहतरी में इनका एक खामोश सा योगदान शामिल हो जाता है। रचना की जड़ता और एकरसता टूटती है। मैं दुगने -तिगुने उत्साह से फिर से नये पेज पर रचना को शक्ल देने लगता हूँ। यह अपनी सी लगने वाली यातना मुझे सदा ही प्रिय रही है। मेरी माँ का नाम ईशा था। कहा करते थे, इस अर्थ में देखें तो तुम भी तो ईशान हुए। इस तरह मेरे पास दो ईशान हो गए, दो आँखों की तरह। ईशान के दुर्घटनाग्रस्त होकर न रहने पर वह बेतरह टूट गए थे। इस भारी दु:ख से वह अपनी रचनात्मकता के बल पर ही बमुश्किल उबर सके। मेरे अनुज वसु मालवीय भी एक सडक़ दुर्घटना में ही मुम्बई में नहीं रहे थे, उस वक्त वह कथाकार कमलेश्वर के साथ टी वी के धारावाहिक लेखन से जुड़े थे। मुझे अच्छी तरह से याद है उन्होंने कहा था, वसु सर्जक था, उसकी याद को जितना सृजनात्मक बना सकोगे, उतना ही तुम इस तकलीफ से लोहा ले पाओगे। उनकी इस सीख की रोशनी में ही आज तक उस त्रासदी से लड़ पा रहा हूँ।
महिमा जी की पुस्तक उत्सवपुरुष : श्री नरेश मेहता वास्तव में उनके व्यक्तित्व का उत्कृष्ट रेखांकन है। दोनों के अद्भुत रिश्ते थे। श्रीनरेश मेहता के पास प्रेम की चाशनी में पगे रोजबरोज तमाम पत्र आया करते थे। महिमा जी बड़े भाव में भरकर कहतीं थीं कि ये तो सभी कलमुँहियों के पत्र चिढ़ाते हुए हमें पढक़र सुना भी देते हैं। सारिका में छपा उनका साक्षात्कार आज भी उनकी रागात्मकता के सन्दर्भ में बार -बार याद आता है। बच्चन जी और उनकी पहली पत्नी श्यामा का एक प्रसंग वह बार -बार सुनाते थे। बच्चन जी श्यामा से कहते थे, देखो जी! जब मैं लिख रहा होऊँ तो तुम मेरे पास न आया करो। जवाब में श्यामा कहतीं थीं, देखो जी! जब मैं तुम्हारे पास आया करूँ तो तुम लिखा न करो। इसके उलट नरेश जी कहते थे, कि जब मैं लिख रहा होता हूँ तो महिमा मेरे बगल में आकर खड़ी हो जाती हैं। इससे मुझे और मेरी रचना, दोनों को ही ताकत मिलती है। तुम मेरा मौन हो के समर्पण पृष्ठ पर यह पंक्तियाँ वास्तव में इसी दाम्पत्य के चटख रंग को उजागर करती सी प्रतीत होती है -
पिउ का नाम बड़ा मनरंजन
पिउ का बोल बड़ा अनमोल
प्राण -पपीहे! पिउ -पिउ बोल !
उनके प्राण सचमुच में जीवन राग की साँसों में बसते थे। राग और आग दोनों से ही ओतप्रोत रहा उनका सृजन कर्म। रूमान उनके लिए ऑक्सीजन ही था, तभी तो वह रच सके -
न होती हो
तो मेरे पाश्र्व में होती हो
लेकिन
जब होती हो
तो न जाने कहाँ होती हो
आज ऐसी आकुलता, ऐसी छटपटाहट, बेकली बेचैनी कहाँ मिलती है,जो जीवनपर्यन्त श्रीनरेश मेहता के कवि को रचती रही और वह भी उसी राग के साथ इस कठिन समय को सरल अंदाज में रचते रहे।