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Monday 20 Nov 2017

स्मृति शेष : रवीन्द्र कालिया

मधुरेश
372, छोटी बामनपुरी
बरेली- 243003
मो. 093198-38309
किसी भी रूप में मेरे कालिया को याद करने का मतलब है अपनी उस प्रकृति को समझने की कोशिश जिसके कारण कालिया जैसे यारबाश और खिंलदड़े व्यक्ति के साथ दूर तक मैं चल नहीं सका। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि कई बार दौड़ के लिए उनके साथ कतार में खड़ा होकर कुछ ही कदम बाद हांफकर मैं दौड़ से बाहर हो गया। एक लेखक के रूप में कालिया से मेरी पहचान लगभग मेरे आलोचना में आने के बाद ही बन गई थी। यह वही दौर था जब उनकी कहानियों का पहला संग्रह ‘नौ साल छोटी पत्नी’ आया था और अपने हल्के-फुल्के कथ्य और कहने के बेहद खिलंदड़े अंदाज के रहते नई कहानी की बाद की पीढ़ी के वे एक चर्चित कहानीकार बन गए थे। उनसे पत्राचार कहानी की आलोचना वाले संदर्भ से बाहर ‘वर्ष-75’ नामक अमरकांत से संबंधित उस योजना को लेकर हुआ था जिसके वे मुख्य नियोजक थे। उसके लिए उन्होंने मुझसे अमरकांत की कहानियों पर एक लेख के लिए लिखा था। ममता कालिया और शायद नरेश सक्सेना उसमें उनके सहयोगी थे। जैसा कि ऐसे आयोजनों के साथ होता है ‘वर्ष-75’ भी बहुत विलम्ब से प्रकाशित हुआ। उनके आगे की योजना को ध्वस्त करते हुए उसका पहला अंक ही अंतिम होकर रह गया।
उसका ऐतिहासिक महत्व इसमें निहित था कि नई कहानी के गर्द-गुबार में जो पूरा फोकस राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर पर केन्द्रित था, उसमें कुछ हलचल हुई। हिन्दी कथा-आलोचना में उसी ने पहली बार अमरकांत के महत्व को उजागर किया और जैसे नई कहानी को देखने की दृष्टि बदल दी। वह शायद नई कहानी में दो धाराओं वाले सिद्धांत का भी सत्यापन था। एक कहानीकार के अतिरिक्त संपादक के रूप में रवीन्द्र कालिया को स्थापित करने में उसकी उल्लेखनीय भूमिका थी। इसका परिचय उन्होंने बाद में ‘वागर्थ’ और ‘नया ज्ञानोदय’ के प्रसंग में बखूबी दिया। उनके ‘धर्मयुग’ के दौर के अनुभवों की भी बेशक इसमें एक विशिष्ट भूमिका थी। मेरा कालिया से मिलना भी इसी दौर में हुआ। सन् 77 में जब मेरा इलाहाबाद जाना हुआ एक सुबह राजेन्द्र मेहरोत्रा बैंक जाते हुए मुझे रानी मंडी वाले किसी कदर पुराने और बड़े से मकान में छोड़ गए थे. उसी में नीचे के हिस्से में कालिया का नया खोला प्रेस भी था। वह पूरी दोपहर मैंने कालिया के साथ ही बिताई थी। बनाकर रखा गया दोपहर का खाना हम लोगों ने साथ ही खाया था। खाना खाकर एक सिगरेट पीने के बाद पैजामा और बनियान पहने मैंने फिर उन्हें प्रेस के काम में जुट जाते देखा था। इलाहाबाद में जमने के लिए वह कालिया के कठिन संघर्ष के दिन थे।
शाम को जब राजेन्द्र मुझे लेने आए, अपने कार्यालय से लौटते हुए अमरकान्त भी वहां आ गये थे। ममताजी भी कॉलेज से लौट आई थीं। कपड़े की जिस बड़ी-सी आरामकुर्सी पर मैं दिनभर लेटकर सोता या बीच-बीच में कुछ पढ़ता रहा था, वह मैंने अब अमरकांत के लिए छोड़ दी थी। चाय, गपशप और ठहाकों के बीच वह कहीं स्मृति में ठहर जाने वाली एक यादगार शाम थी, जिसमें कालिया देर तक अमरकांत वाली अपनी उस योजना पर बात करते रहे थे। इसके बाद अमरकांत वाली इसी योजना के सिलसिले में कालिया के एक-दो पत्र आए थे- आलेख की याद दहानी के तौर पर। इसी दौर में शैलेष मटियानी के एक संग्रह ‘महाभोज’ पर मेरी समीक्षा ‘कहानी’ में छपी। उसे लेकर मटियानी की नाराजगी और उग्र प्रतिक्रिया की सूचना सबसे पहले मुझे कालिया ने ही दी। अपनी खिलंदरी और खुशमिजाज शैली में उन्होंने यह भी लिखा- जब मटियानी जी और किसी तरह हमारे काबू में नहीं आते, हम लोग हंसते हुए उन्हें चिढ़ाते हैं- भागो मधुरेश आ रहा है।
स्वीकार करूंगा कि आत्मीयता की यह पकड़ मेरी ओर से ही ढीली पड़ी। कहीं आने-जाने से बचने की अपनी प्रकृति के कारण ही मैं कभी उन अवसरों का लाभ नहीं उठा सका जो अन्य अनेक मित्रों की तरह कालिया की ओर से भी मुझे मिले। ‘कहानी’ में ही मैं ममता कालिया के संग्रह ‘छुटकारा’ और अन्य कहानियां तथा ‘बेघर’ की समीक्षाएं लिख चुका था। बाद में जब रवीन्द्र कालिया ‘वागर्थ’ के संपादक और ममता कालिया भारतीय भाषा परिषद की निदेशक होकर कलकत्ता पहुंचे, परिषद के अनेक आयोजनों में उन्होंने मुझे बुलाया। बार-बार मना करने की शर्म से बचने के लिए एक बार मैंने उन्हें अपनी स्वीकृति भी भिजवा दी। जाहिर तौर पर वे इससे खुश थे। लेकिन जैसा होना था मेरा जाना हुआ नहीं। आयोजन से एक दिन पहले मैंने उन्हें फोन किया। अपने न आ सकने की बात फिर भी मैं सीधे उनसे कह नहीं सका। जब मैं फोन पर इधर-उधर की बातें कर रहा था, उनका सीधा सवाल आया, लेकिन आप हैं कहां? कायदे से मुझे उस समय कोलकाता पहुंचने के लिए ट्रेन में होना चाहिए। फिर मैंने अपने ढंग से अपनी मजबूरी उन्हें बताई असुविधा के लिए क्षमा मांगते हुए। लेकिन आगे भी अपनी ओर से उन लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। उस दौरान परिषद के अनेक प्रकाशन मुझे भिजवाते थे। रवीन्द्र कालिया ने ‘वागर्थ’ में लिखने का दबाव बनाया। जैसे बिना कुछ याद रखे, मुझे मेरे तौर पर उन्होंने स्वीकार कर लिया था।
रवीन्द्र कालिया का जन्म पंजाब के उसी जालंधर में हुआ था जो अश्क और मोहन राकेश का भी अपना शहर था। अश्क से शुरू में उनके बहुत आत्मीय और पारिवारिक संबंध थे। मोहन राकेश तो बाकायदा उनके गुरु थे। ममता कालिया की एक किताब के शीर्षक के अनुसार कितने शहरों में कितनी बार घूम-भटककर लम्बे अरसे तक कालिया-दम्पत्ति शायद इलाहाबाद में ही रहे। एक तरह से वही उनका शहर था। कालिया की पंजाबी कलम उसी इलाहाबाद की धरती पर लगी जिसकी शुरूआत कभी अश्क से हुई थी और बाद में इसमें बलवंत सिंह और सतीश जमाली भी जुड़े-पौड़े। पंजाबी संस्कृति का एक खास खुलापन और व्यवहार बुद्धि कालिया में भी भरपूर थी। पत्रकारिता के गुर उन्होंने ‘धर्मयुग’ के दौर में सीखे-समझे थे। उनका धर्मयुग काल एक तरह से उनकी पत्रकारिता की पाठशाला थी। वही उनकी स्थायी दोस्तियों और दुश्मनियों का दौर भी था। कहीं अगर वे ‘काला रजिस्टर’ वाली सूची के शीर्ष पर थे तो कहीं उन्हें दोस्ती बनाने-निभाने का शऊर भी मिला जो कन्हैयालाल नंदन जैसी स्थायी दोस्ती का आधार बना। कृतज्ञता और दोस्त नवाजी जैसे कालिया के चरित्र के बुनियादी सूत्र थे। इनके बिना उन्हें भी ठीक से नहीं समझा जा सकता। इसके एक छोर पर यदि कन्हैयालाल नंदन थे तो दूसरे छोर पर विभूतिनारायण राय।
वे दोस्तों के लिए क्या कर सकते थे और दोस्त उनके लिए किस सीमा तक जा सकते थे, बाद के दौर में इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण शायद आलोक जैन थे। कालिया के ‘वागर्थ’ और भारतीय भाषा-परिषद वाले दौर में ही एक दिन ‘जनसत्ता’ में यह खबर छपी कि कालिया ने भाषा-परिषद में आलोक जैन का अभिनंदन करके उन्हें शाल और श्रीफल भेंट किए। यह वस्तुत: उनके भारतीय ज्ञानपीठ और दिल्ली आने की भूमिका थी। आलोक जैन को मैं भी जानता था। जब-तब यहां-वहां छपी रचनाओं की प्रतिक्रिया में उनके फोन आते थे और वे देर तक बातें करते थे। ज्ञानपीठ की किताबों को वे बहुत उदारतापूर्वक भिजवाते थे। वे साहित्य रसिक और लेखकों से निजी संबंध बनाने और निभाने वाले व्यक्ति थे। लेकिन उनमें अभिनंदनीय क्या था समझने में दिक्कत हुई। अपने इस अभिनंदन की कीमत उन्होंने कालिया को कैसे चुकाई इसका पता तब चला जब विभूतिनारायण राय के छिनाल-प्रसंग से उपजे विवाद में लेखकों के एक समूह ने न सिर्फ भारतीय ज्ञानपीठ से अपनी  किताबें वापस लेने की मुहिम चलाई, निदेशक और नया ज्ञानोदय से उनके त्यागपत्र की मांग भी उठाई। काफी समय तक संस्थान में बने रहे गतिरोध की खबरें भी छनकर वापस आती थीं। फिर आलोक जैन के वीटो ने ही कालिया की रक्षा की। वे भारतीय ज्ञानपीठ के आजीवन ट्रस्टी थे। उन्होंने अपने त्यागपत्र का इक्का फेंक कर कालिया के त्यागपत्र की मांग को नाकाम किया।
रवीन्द्र कालिया ने वैसे गद्य की अनेक विधाओं-कहानी, उपन्यास और संस्मरण आदि में लिखा है, लेकिन उनकी मुख्य पहचान एक कहानीकार की ही रही है। नई कहानी के बाद वे सातवें दशक की उस कथा पीढ़ी के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर के रूप में सामने आए जो ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह आदि के साथ अस्तित्व में आई। काफी कुछ नई कहानी के विरुद्ध एक विद्रोह के रूप में यह दौर कहानी में काव्योपकरणों के बहिष्कार का दौर था। कविता में यह अकविता का दौर था। राजकमल चौधरी से होते हुए धूमिल तक में ये तत्व पर्याप्त सक्रिय थे। पारिवारिक एवं स्त्री-पुरुष संबंधों के प्रसंग में भी कैसी भी भावाकुलता और आवेग की अपेक्षा यह एक खास तरह के ठंडेपन और काफी कुछ रुखड़ लगाव का दौर था। इसी परिवेश में रवीन्द्र कालिया अपना पहला कहानी संग्रह ‘नौ साल छोटी पत्नी’ लेकर आए। वे मूलत: जीवन की विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के लेखक हैं। जीवन में व्यर्थता और अर्थहीनता के बोध को वे भिन्न संदर्भों में व्यक्त करने वाले लेखक हैं। आपसी संबंधों को लेकर जैसे वे कहीं भी आश्वस्त नहीं है। संबंधों का रक्षा कवच जैसे उनसे छिन चुका है। आदमी एकरसता और ऊब के बीच जीने को अभिशप्त है। मां-पिता, पति-पत्नी, प्रेमिका-मित्र कहीं भी संबंधों की ऊष्मा और उजास जैसे बची नहीं हैं। महेन्द्र भल्ला का ‘एक पति के नोट्स’ जैसे इस शैली और भावभूमि की एक प्रतिनिधि रचना है।
रवीन्द्र कालिया की कहानियों में एक ऐसा युवक बार-बार सामने आता है जो परम्परागत संबंधों के दायरे से छिटककर अपना छोटा-सा शहर कस्बा या गांव छोडक़र महानगर की इन त्रासदी एवं भयावह स्थितियों से जूझने निकल पड़ा है। दफ्तर की कमीनगी और टुच्चेपन के बीच जीना उनकी विवशता है। उनकी ‘मैं’, ‘बड़े शहर का आदमी’, ‘पचास सौ पचपन’, ‘अकहानी’ आदि कहानियां इन परंपरागत मूल्यों के विलोपीकरण की ही कहानियां हैं। इनका व्यंग्य केन्द्रीभूत और एकोन्मुखी न होकर अलग-अलग स्थितियों के संदर्भों को छूता हुआ निकल जाता है। ‘त्रास’ संबंधों के इस बदलाव और उसके निहित संकट को अपेक्षाकृत गंभीरता से व्यक्त करती है ‘नौ साल छोटी पत्नी’, ‘एक प्रमाणिक झूठ’ ‘डरी हुई औरत’ आदि मुख्यत: प्रेम एवं स्त्री-पुरुष संबंध को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानियां हैं। ये कहानियां ही रवीन्द्र कालिया की पहचान का माध्यम बनी थीं। लेकिन संबंधों और स्थितियों के आरंभिक बदलाव को रेखांकित करने की पहल और फिर क्रमश: उनकी जटिलताओं से जूझना दो भिन्न स्थितियां हैं।
अकहानी के लेखकों को जल्दी ही इस बात का अहसास हो गया कि एक साहित्यिक आंदोलन और रचना दृष्टि के रूप में ‘अकहानी’ से उनकी संलग्नता, उनके संभावनाशील रचनाकर्म को बाधित ही करेगी। उसका कोई भविष्य नहीं है। यह अकारण नहीं है कि इस आंदोलन की कालावधि और उससे जुड़े लेखकों की संख्या सीमित ही है। इससे जुड़े लेखकों ने या तो अपने आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया से गुजरकर इससे बाहर आकर अपने लेखन को विस्तार दिया या फिर वे लिखना ही छोड़ बैठे। कालिया के परवर्ती दौर की कहानियां- ‘काला रजिस्टर’, ‘चाल’, ‘चकैया नीम’ आदि अपनी ही सीमाओं के अतिक्रमण का उल्लेखनीय उदाहरण है।
रवीन्द्र कालिया के संस्मरण ‘गालिब छुटी शराब’ उनकी खिलंदरी भाषा और चुहलभरे अंदाज का एक प्रतिनिधि उदाहरण है। चूंकि इन संस्मरणों को पढक़र कभी-कभी तो ऐसा भी लग सकता है कि मयनोशी को लेखक कुछ ज्यादा ही ग्लोरीफाई करने की कोशिश करता है। शराबियों की यहां दो कोटियां निर्धारित की गई हैं- खाते-पीते शराबी और पीते-पीते शराबी। जाहिर है, कालिया अपने को इस दूसरी कोटि में ही रखते हैं। आर्य समाज और जैन धर्म के प्रभाववृत्त वाले अपने परिवार और ननिहाल के अत्यंत शुद्धतावादी संस्कारों के बावजूद अपनी इस लत को कालिया अपनी समूची पीढ़ी की हताशा और उससे उत्पन्न कुंठाओं से जोडक़र देखते हैं।
अपने अनेक समकालीनों पर यहां रवीन्द्र कालिया की जो टिप्पणियां  हैं बेशक उन्हें किसी गंभीर मूल्यांकन की तरह न लिया जा सके लेकिन वे सलीके से की गई ऐसी विश्वसनीय टिप्पणियां जरूर हैं, जिनसे होकर ही ऐसे किसी मूल्यांकन की राह निकलती और बनती है। ‘गालिब छुटी शराब’ का सबसे आकर्षक पक्ष उसकी शैली में निहित है। खिलंदरे अंदाज में हास्य और प्राय: ही अतिरंजना के मेल से वे एक खास तरह की विश्वसनीयता इसलिए पैदा कर सके हैं क्योंकि इनमें कालिया खुद अपने को भी शामिल करके चलते हैं। अपने पर हंस सकने का कौशल ही उन्हें दूसरों पर हंस सकने की छूट देता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘नौ साल छोटी पत्नी’ के प्रसंग में कवि कुमार विकल द्वारा उनके साथ किए गए शारीरिक सुलूक का बयान है। अनेक जगह भाषिक स्खलन या मुहावरों के गलत प्रयोग के बावजूद मुहावरों के अर्थ और संदर्भ बदलने की शैली का आकर्षण बढ़ा है और उसमें एक खास तरह की चमक पैदा हुई है। ‘गालिब छुटी शराब’ की शैली का यह गुण अपने ढंग से उसकी पठनीयता को प्रभावित करता है।
इलाहाबाद से ही ‘कहानी’ के बाद जब सतीश जमाली ने अपनी अनियतकालीन पत्रिका ‘नई कहानी’ निकाली, रवीन्द्र कालिया के दो खंडों में प्रकाशित उपन्यास ‘खुदा सही सलामत है’ को उन्होंने मुझे समीक्षा के लिए भिजवाया था। लेकिन लिखा मैंने उस पर बहुत बाद में जब कई बरस बाद उसी उपन्यास का किंचित सम्पादित और संक्षिप्त संस्करण राजकमल प्रकाशन से आया। वैसे उसके बाद भी कालिया केदो और उपन्यास आए ‘एबीसीडी’ (2004) और ‘17 रानडे रोड’ (2010) अपने कलेवर में बहुत संक्षिप्त ‘एबीसीडी’ जिसका पूरा शीर्षक बनता है अमेरिका बार्न कन्फ्यूज्ड देशी- वस्तुत: उन प्रवासी भारतीयों पर केन्द्रित है जो अमेरिका और कनाडा में रह रहे हैं जबकि 17 रानडे रोड, मुंबई की चमक-दमक भरी जिंदगी को अपने नायक सम्पूरन के माध्यम से अंकित करता है। बाहर से आया एक महत्वाकांक्षी युवक जो मुंबई में बोरीबंदर के प्लेटफार्म से अपनी जिंदगी शुरू करके रानडे रोड के सी-फेस के भव्य फ्लैट तक की यात्रा करता है। संबद्ध जीवन की पकड़ और अपनी पठनीयता के कारण कालिया के ये उपन्यास उल्लेखनीय हैं। लेकिन संरचनात्मक स्तर पर अपने जबरदस्त बिखराव के बावजूद  खुदा सही सलामत है’ अपने पात्रों को जिस आत्मीयता और गहरी करुणा के साथ प्रस्तुत करता है, उसे उपन्यास की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। शहर का नाम न लिए जाने के बावजूद यह पहचानना मुश्किल नहीं होता कि यह इलाहाबाद ही है। कालिया की ही एक चर्चित कहानी ‘चकैया नीम’ वाले परिवेश से शुरू होकर उपन्यास धीरे-धीरे समूचे शहर की धरती पर फैलता जाता है।
अजीजन की बेटी गुलबदन गली की पहली स्नातक लडक़ी है जो अपने विश्वविद्यालय के लिए दिल्ली से ट्रॉफी जीतकर लाई है। परी चेहरा, बेहद लंबे बाल, धोने के बाद जिन्हें सुखाने केलिए जब वह बाल्कनी में खड़ी होती है तो गली में हलचल मच जाती है। गुलबदन और उसके अध्यापक प्रो. जितेन्द्र मोहन शर्मा की प्रेम कहानी को कालिया ने बहुत सधे और संवेदन सक्षम ढंग से लिखा है। अम्मा की सजगता के कारण गुलबदन और शर्मा को मुलाकातों को अधिक अवसर नहीं मिलते। जो भी थोड़ा-बहुत मिलना होता है, गुलबदन के घर पर ही होता है। अजीजन की बहुत इच्छा है कि गली में उसकी बेटी की बारात बहुत धूमधाम से आए जो अरसे से नहीं हुआ है और उसकी बेटी शान रुखसत हो।
कालिया ने इन प्रेम प्रसंगों को गहरी संवेदनशीलता से अंकित किया है। लेकिन इसका सबसे विडम्बापूर्ण पक्ष यह है कि गीतांजलि श्री के ‘हमारा शहर उस बरस’ वाले कीटाणु अजी•ान के अपने ही घर में मौजूद हैं। उसका बेहद विश्वसनीय नौकर ही नहीं चाहता कि यह संबंध परवान चढ़े और गुलबदन का ब्याह एक हिन्दू युवक से हो। रवीन्द्र कालिया गहरे कन्सर्न और लगाव के साथ मुस्लिम परिवेश और समाज को अंकित करते हैं- समूचे सांस्कृतिक और धार्मिक परिप्रेक्ष्य में। कर्बला में लड़ी गई सच्चाई और न्याय की लड़ाई को वे एक प्रतीक-कथा के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उपन्यास के शीर्षक ‘खुदा सही सलामत है’ की व्यंजना दूर तक जाती है विष्णु प्रभाकर की कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ की तरह।
उपन्यास में गुल और हसीना के प्रेम की जो विडम्बनापूर्ण परिणति होती है, आपसी सद्भाव और बड़े लक्ष्यों को समर्पित लतीफ जैसे लोग मौत की खाई में ढकेल दिए जाते हैं। पुलिस और राजनीति की दलाली करने वाले सिद्दीकी जैसे लोग जिस तरह साम्प्रदायिक उन्माद को हवा देते हैं, नहीं लगता कि इस सबसे किसी को कोई $फर्क पड़ता है। चमेली, हुजरा बी और बाकर जैसे लोग नरक भोगकर भी अपनी कला और मानवीय संवेदना को जिलाए रखने की कोशिश करते हैं। इस सबके बावजूद खुदा अगर सही सलामत है तो आखिर वह कैसा और किसका खुदा है। इस कचोट को कालिया अपने पाठकों तक फैला देने में सफल होते हैं और उनकी यह सफलता ही उपन्यास को एक यादगार रचना बनाती है।