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Monday 20 Nov 2017

अपवित्र आख्यान और भाषायी अस्मिता का सवाल

यदुवंश यादव
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय
हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
भारतीय समाज के विकास की प्रक्रिया में धर्म और भाषा दोनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ये दोनों अवयव हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित भी करते रहे हैं। भाषा और धर्म एक-दूसरे के साथ-साथ किसी समाज या समुदाय को प्रभावित तो कर सकते हैं परंतु कभी भी भाषा किसी धर्म से निबद्ध नहीं हो सकती है। भाषा एक ऐसी प्रवृत्ति है जो किसी भी व्यक्ति, समाज व धर्म के लिए हो सकती है जो भी इसे आत्मसात कर सके। इसे किसी धर्म विशेष में बांधना इसे संकीर्णता की ओर ले जाना है। भारतीय समाज में हिंदू-मुस्लिम धर्म की अपनी खूबियां भी रहीं हैं और खामियां भी। जहां एक तरफ  दोनों धर्म सहचर की भूमिका में नजर आते हैं वहीं इन दोनों धर्मों में पर्याप्त मतभिन्नता भी दिखाई पड़ती है। जहां एक तरफ  ये दोनों धर्म भारतीय सांस्कृतिक विरासत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं वहीं आज इन दोनों वर्गों की सामाजिक परिस्थितियां बिल्कुल उससे अलग हैं। अलग-अलग कारणों के आधार पर इन दोनों वर्गों के बीच जो एक नया समाज बना वह निश्चित ही एक विकृत स्वरूप है। आज हिंदू और मुस्लिम दोनों वर्गों में एक अलगाव की स्थिति देखी जा सकती है जिसको सत्ता व पूंजी दोनों अपने फायदे के लिए लगातार बढ़ावा देते जा रहे हैं। सत्ता व पूंजी ने इस अलगाव को व्यापक बनाने के लिए जिन आयामों का प्रयोग किया उनमें भाषा भी एक महत्वपूर्ण इकाई है। समाज की भाषिक संरचना को धर्म विशेष से जोडक़र नए प्रकार के सरोकारों का बना दिया जाना इसका उदाहरण है। अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास अपवित्र आख्यान इस विषय को बड़े ही मार्मिक तरीके से छूता है। साझी संस्कृति से शुरू होकर अलगाव की अवस्था तक के विभिन्न सरोकार इसमें पर्याप्त मात्रा में दिखाई पड़ते हैं। किस तरह से जमील जो कि इस उपन्यास का मुख्य पात्र है सामाजिक संस्था का व्यक्ति न होकर धार्मिक संस्था का व्यक्ति हो जाता है, यह इस उपन्यास की केन्द्रीयता को बताता है।
अब्दुल बिस्मिल्लाह हिंदू-मुस्लिम साझी संस्कृति के बड़े पैरोकार हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में बड़े ही मार्मिक तरीके से इस विषय को देखा है। इस परंपरा को व्यापक फलक पर देखने का कार्य उन्होंने अपने इस उपन्यास के माध्यम से किया है। यह आख्यान कबीर की सामाजिक संवेदना के आधुनिक परिवेश का आख्यान है। जो कबीर की व्यथा थी वह आज और भी व्यापक हो गई है, यह उसको उसी व्यापक स्वरूप में दिखाता है। कबीर भी जिस भाषा बहता नीर है की बात करते हैं उस विषय को एक नए संदर्भ में जिसको लगातार धर्म से जोडक़र देखने का प्रयास किया जा रहा है, इस बात को इस उपन्यास में दिखाया है। जहां एक तरफ  अपवित्र आख्यान सांप्रदायिकता में विभिन्न सामाजिक सरोकारों को सूक्ष्म तरीके से दिखाता है वहीं दूसरी तरफ  यह भाषा को लेकर एक विस्तृत चर्चा करते हुए दिखाई देता है। सांप्रदायिकता के लिए भाषा का जिस तरह से अंग्रेजों ने उपयोग किया और भाषा को धर्म से जोडक़र परिभाषित करने का प्रयास किया जिससे जमील भी जूझता नजर आता है। वह जहां एक तरफ  सामाजिक सरोकारों से संघर्ष करते व्यक्ति का प्रतीक है वहीं दूसरी तरफ  वह भाषा के धार्मिकीकरण कर दिए जाने वाले परिणाम से हताश युवक है। वह भारतीय समाज का एक ऐसा चरित्र है जो कि इसी समाज से उत्पन्न है परंतु यह समाज उसे अपना नहीं सकता। इस न अपनाने के पीछे बाजार की उपयोगिता के सिद्धांत का भी पता चलता है जिसका यह सिद्धांत है कि यदि आप समाजोपयोगी व्यक्ति हैं तो समाज में आपकी जगह है अन्यथा नहीं। ठीक उसी तरह जो समकालीनता का समाज है जिसमें हिंदू मुस्लिम के रूप में समाज का निर्धारण हुआ है उसमें जमील भी उपयोगी नहीं सिद्ध होता है क्योंकि वह मुस्लिम होकर हिंदी का अध्यापक है। यह समाज कदम-कदम पर उसको यह अहसास दिलाता रहता है कि उसकी सबसे बड़ी गलती यही है कि वह मुसलमान होकर हिंदी का अध्यापक है। इस एहसास दिलाने की प्रक्रिया में दोनों वर्ग समान रूप से अपनी भूमिका निभाते हैं। उपन्यास के नायक का संबंध एक ऐसी संस्कृति से है जहां संस्कार व भाषा के बीच धर्म कोई दीवार खड़ा नहीं करता। लेकिन शहर का सभ्य समाज उसे बार-बार यह एहसास दिलाता है कि वह मुसलमान है और इसलिए उसे हिंदी एवं संस्कृत की जगह उर्दू व फारसी की पढ़ाई करनी चाहिए थी।
जमील एक तार्किक व्यक्तित्व वाला इंसान है व कर्तव्यनिष्ठ भी। धर्म आधारित भाषायी अस्मिता की जो व्यापक द्वंदात्मकता इस उपन्यास में दिखाई पड़ती है वह संघर्ष पहले ही अध्याय से प्रारंभ हो जाता है। यासमीन और उसके परिवार के बीच जमील से हुए संवाद इस बात को दर्शाते हैं कि न केवल हिंदू समुदाय बल्कि मुस्लिम समुदाय भी भाषा के स्तर पर काफी कठोर था। एक तरफ जहां यासमीन के घर में आधुनिक नौकरियों जिसमें विज्ञान, वाणिज्य, कला आदि विधाओं के अनुसरण करने वाले लोग हैं परंतु वे भाषा को लेकर केवल मादर जबान अर्थात उर्दू को ही प्रमुखता प्रदान करते हैं। यह कठोरता यथार्थ को दर्शाती है, जिसमें भाषा की स्थिति प्रमुख रूप से देखी जा सकती है। पहले ही अध्याय में यासमीन के इलाके को छोटा पाकिस्तान के नाम से पुकारे जाने का जिक्र आता है, जहां रिक्शे वाले भी जाने में असमर्थता जताते हैं। यह छोटा पाकिस्तान कहा जाना भाषायी स्तर पर एक खिलवाड़ है। उसे छोटा पाकिस्तान क्यों कहा जाता है? क्या इसलिए कि वह पाकिस्तान के सामाजिक, सांस्कृतिक धरातल का एक छोटा प्रतिरूप है या फिर केवल इसलिए कि उसमें सिर्फ  मुसलमान रहते हैं। इस छोटे पाकिस्तान के होने के मूल में मात्र धार्मिक कारण है जो एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के लिए भाषिक स्तर पर प्रयोग किए जा रहे थे। भाषा और धर्म को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदाय में जो संघर्ष शुरू हुआ था इसका व्यावहारिक स्वरूप हमें इस उपन्यास में दिखाई पड़ता है। जिस समाज में मात्र हिंदी जानने से आप हिंदू और उर्दू जानने से आपके मुसलमान हो जाने की सिद्धि होती है, उसका वास्तविक चित्रण हमें इसमें दिखाई पड़ता है। वह नौकरी भी पाता है तो केवल इसलिए कि वह मुस्लिम है, जिस कारण से उसे मुस्लिम ट्रस्ट के विद्यालय में नौकरी मिल पाती है। इससे पहले जब वह एक विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए जाता है तो वहां भी उसके लिए हिंदी पढ़ा होना ही संकट उत्पन्न करता है। विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रामकुमार चतुर्वेदी कहते हैं कि तुम रचनाकर भी हो। तुम्हें भला कौन निरस्त कर सकता है? तुम समाचार पत्र देखते रहो। कभी शिब्ली कॉलेज आजमगढ़, हलीम कॉलेज कानपुर या फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जगह निकले तो अवश्य आवेदन करना। उस समय में जितनी सहायता कर सकूंगा करूंगा।
भाषा को लेकर जो विवाद उत्पन्न हुआ जिसमें धर्म के एकीकरण की महती भूमिका रही वह मात्र एक राजनैतिक व शक्ति स्थापना से संबंधित रहा। नया सामाजिक परिवेश जिसको धर्म व्यापक रूप में प्रभावित कर रहा था और राजनीतिक शक्तियां भी सत्ता को हथियाने के लिए इसका सहारा ले रहीं थी। हिंदी भाषी और अहिंदी भाषी की बात शुरू होने में राजनीतिक कारण को नकारा नहीं जा सकता यह वर्गीकरण भले ही भाषायी क्षेत्रों व भाषायी प्रवृत्ति वाले लोगों के प्रकार बताने के लिए किया गया है परंतु इसके पीछे की चालाकी को भी नकारा नहीं जा सकता। इसमें प्रतिशत के हिसाब से हिंदी भाषियों का प्रत्येक स्तर पर वर्चस्व रहा जिसका परिणाम यह हुआ कि हिंदी के बरक्स उन सारी भाषाओं व साहित्य का विकास नहीं हो सका। इस बात की परिणति को देखते हुए राही मासूम रजा लिखते हैं कि, हिंदी भाषियों को तो इस बारे में बोलने का अधिकार नहीं है, अपने दही को किसने खट्टा कहा, यदि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाना है तो उसे अहिंदी भाषियों का वोट मिलना चाहिए ताकि बाद में भारत विरोधी क्षेत्रीयता हिंदी साम्राज्य का हवाला न खड़ा कर सके।
इस बड़े परिवेश की भाषायी राजनीति हमें उस स्कूल में भी देखने को मिलती है जहां जमील अध्यापक के पद पर नियुक्त होता है। वहां भी हिंदी और उर्दू भाषा के दो गुट हैं जिसमें धर्म प्रधान व्यक्ति ही शामिल हैं। इनकी सारी प्रवृत्तियां धार्मिकता के आधार पर निर्धारित होती हैं। जैसे जमील की नियुक्ति होना, इसके होने में केवल उसका मुसलमान होना ही उत्तरदायी है। उसकी हिंदी के प्रति निष्ठा कहीं भी उसके नियुक्ति में काम में नहीं आती है। मुस्लिम विद्यालय में हिंदी का अध्यापक रखे जाने में हिंदी की विशेषज्ञता नहीं देखी जाती बल्कि धर्म को वरीयता प्रदान की जाती है। जमील जैसा व्यक्तित्व इस व्यवस्था में संघर्ष करता ही नजर आता है क्योंकि यहाँ निर्धारण का तरीका धर्म है। जमील सोच रहा था कि उसका एपाइंटमेंट इसलिए नहीं हुआ है कि वह एक योग्य युवक है बल्कि इसलिए हुआ कि वह मुसलमान है। अगर वह मुसलमान न होता तो? अगर उसका नाम जमील अहमद की जगह राजाराम होता तो? यह भारतीय समाज की बड़ी विडंबना रही है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में भाषा को लेकर धर्म को प्रधानता प्रदान की गई है। भले ही किसी धर्म ने प्रतिक्रिया स्वरूप ही इसको महत्ता प्रदान की परंतु प्रभाव नकारात्मक रूप में ही पड़ा। हिंदू-मुस्लिम धर्म की सारी प्रवृत्तियों को धर्म आधारित कर दिए जाने से व्यक्ति का व्यक्तित्व कुछ रह ही नहीं गया। यदि व्यक्ति धर्म से अलग होकर स्वतंत्र रूप में कुछ करता है तो वह काफिर हो जाता है। जैसे जमील का हिंदी सीखना, पढऩा, शराब पीना, रोजा-नमाज न पढऩा उसे काफिर साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। इस उपन्यास का रचना समय उस दौर का है जब भारतीय समाज 21वीं सदी के विकास व आधुनिक स्वरूप के उफान पर था। उस समय समाज में व्याप्त धर्म की रुढ़ता हमें इस उपन्यास में देखने को मिलती है जिसमें जमील की अपनी स्वतंत्र सत्ता कुछ न होकर यासमीन व विभा जैसे द्विचरित्र वाले पात्रों द्वारा एहसास करने की कोशिश है। जहां यासमीन सारे मुस्लिम धार्मिक प्रवृत्तियों को अपने जीवन में उतारती है परंतु व्यवहार में वह इससे कहीं ज्यादा अलग है। नौकरी पाने के लिए वह किसी भी हद तक गिर सकती है। वहीं दूसरी तरफ  विभा जैसी चरित्र है जो नई-नई मुसलमान बनी है, धर्मांतरण द्वारा। वह भी लगातार जमील को सलाह देती रहती है जो इस समाज की कुरीतियों व कुंद परंपराओं से अवगत है।
इस उपन्यास में हिंदू-मुस्लिम धर्म को लेकर कई रोचक तथ्य देखने को मिलते हैं। इन तथ्यों में भाषा महत्वपूर्ण अवयव के रूप में दिखाई पड़ती है। उपन्यास में दंगे के समय एक पत्रकार की मौत जिसका नाम इकबाल बहादुर राय था और वह हिंदी पत्रिका का पत्रकार थ।ा उसकी मौत मुसलमानों द्वारा चाकू मारकर कर दी जाती है जबकि वह स्वयं एक मुसलमान था। उसे इसलिए मार दिया जाता है कि उसने अपना नाम इकबाल बहादुर राय रखा था और वह हिंदी पत्रिका के लिए काम करता था। यह दिखलाता है कि कैसे भाषा धर्म के अधीन होती जा रही थी और लोगों की कुंद मानसिकता इसको बढ़ाने में सहयोग प्रदान करती है। भारतीय समाज की इस मानसिकता के कारण ही सांप्रदायिक ताकतों ने भाषा के प्रयोग के द्वारा अपनी ताकत को मजबूत किया। जिसको इस अल्पवयस्क समाज ने कभी समझा ही नहीं। इन सांप्रदायिक ताकतों ने समाज के प्रत्येक छोटे-बड़े स्तर को अपने अनुसार प्रभावित किया। जहां एक तरफ  हिंदू सांप्रदायिकतावादी तत्वों ने हिंदी को हिंदू भाषा बनाने का प्रयास किया वहीं दूसरी तरफ मुसलमानों ने उर्दू को मुस्लिम भाषा बनाने का प्रयास किया। इसी बात से जमील जगह-जगह बचता फिरता है और तार्किकता से पेश आता है। एक जगह वह अपने सफाई में कहता है, नहीं नहीं, मैं हिंदुओं की जुबान नहीं, हिंदी जुबान बोल रहा था। और आप तो जानते ही होंगे कि किसी गालिब ने अपनी जुबान को हिंदवी कहा है।
उपन्यास का यह मुख्य पात्र जमील भाषा को लेकर सतर्क रहने वाला प्राणी है। वह भाषा की एकात्मकता के मूल को इतिहास में देखता है। हिंदू-मुस्लिम साझी संस्कृति का प्रतीक जितना जमील है उतनी ही राबिया भी है। राबिया देवी जिसको कि लोग अधिकांशत: हिंदू ही समझ बैठते हैं, उसके हिंदू समझे जाने के पीछे दो प्रमुख कारण हैं एक तो यह कि मांग में सिंदूर लगाती है जो आमतौर पर मुसलमानों में नहीं होता और दूसरे उसके बातचीत की भाषा जो कि हिंदू परिवेश की है। भाषा को लेकर अब्दुल बिस्मिल्लाह यहां एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि भाषा परिवेश द्वारा प्रदत्त व विकसित होती है न कि किसी धर्म द्वारा जिसके लक्षण हमें राबिया में देखने को मिलते हैं।