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Tuesday 21 Nov 2017

बाबा ब्रांड केवलम

शशिकांत  सिंह शशि
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़
 महाराष्ट्र-431736
मो.-7387311701
देवलोक में चिंतन शिविर का आयोजन किया गया था। मुद्दा प्रस्तावित था कि सर्वाधिक पाप कहां है और सर्वाधिक पुण्य कहां हैं? घनघोर चिंतन के उपरांत यह पाया गया कि सर्वाधिक पाप बाजार में और सर्वाधिक पुण्य मीडिया के क्षेत्र में है। बाजार में विदेशी के नाम पर विदेशी वस्तुएं बेची जा रही हैं यही पाप के मूल में हैं। स्वदेशी का नाम लेकर जो विदेशी वस्तुएं बेची जाती हैं, पुण्य अर्जित करती हैं। उनका पुण्य और मीडिया के सर्वकालीन देशभक्तों और समाज सुधारकों के पुण्य का ही धरती को भरोसा है। एक कोने में बैठी धरती माता भी गर्दन हां में हिला रही थी। आज सुबह ही गाय का रूप धारण करके आई थीं। धरती को पापमुक्त करने के लिए इस बार अवतार कौन लेगा? विमर्श होने लगा। भगवान ने तो साफ  कह दिया कि उनके अवतार लेने से कुछ होता नहीं है। करते तो मानव-लीला हैं लेकिन बाद में आदमी अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से जान ही लेता है कि भगवान थे और वरदान के लिए परेशान करने लगता है। निर्णय हुआ कि इस बार बाबा झूलन अवतार लेंगे। चुनांचे वे खासे झूल लेते हैं अत: खांटी अवतारी लगेंगे। उनको अवतार सिद्ध करने के लिए किसी डाकू को बाल्मिकी बनकर अपना कैरियर चौपट करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने अवतार लिया और बचपन में बच्चा तथा जवानी में जवान रहते हुए, बुढ़ापे से तीन कदम दूर अडक़ कर खड़े हो गये। बूढ़ा होने से उन्होंने साफ  मना कर दिया और अवतार की पहली सीढ़ी पार कर गये। उन्होंने बाजार में घुसने के लिए गेरूआ वस्त्र धारण किया। दाढ़ी बढ़ा ली। देह पर चादर धारण करके विदेह लगने लगे। लोग चौंके-अरे, भारतभू पर एक और महात्मा। बचा-खुचा कल्याण होकर रहेगा। धोती और चादर से बाजार में मज़मा जम नहीं रहा था। भक्तों ने सलाह दी-बाबा ! भारत में प्राचीन विचार और आधुनिक वस्त्र पसंद किये जाते हैं। बाबा झूलन ने पीपल के नीचे समाधि लगानी शुरू की। एक दिन अचानक उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ कि वे भटकी हुई जनता को योग की शिक्षा देंगे। योग से ही भोग तक पहुंचा जा सकता हैै। भोग से ही समस्त पाप दूर होते हैं। नदी में डूबने वालों को बचाना है तो डुबकी मारनी ही होगी। बाजार भोग का सागर है तो योग की नाव बनानी होगी। बाबा ने समस्त योग सीख रखे थे। मसलन, आदमी और औरत का योग, धन और पुण्य का योग, दो और दो का योग, अंत में मूर्खता और ज्ञान का योग। अंतिम योग में लिए उन्हेें कुछ प्रयोग करने पड़ते थे। अपनी आंत को चाक की तरह नचाना, नाक से भौंरे की तरह गुनगुनाना, सिर के बल बात की बात में खड़े हो जाना, भारत माता की जय कहना, सदैव प्राचीन संस्कृति की रट लगाना और यथासंभव संस्कृत के श्लोक पढऩा। बाबा को संस्कृत का ज्ञान नहीं था तो जनता कौन-सी संस्कृत में आचार्य की उपाधि लेकर बैठी थी।
झूलन बाबा मीडिया के प्रिय पात्र हो गये। बाबा मीडिया पर झूलते, भक्त जमीन पर। बाबा अखबारों में झूलते, भक्त अपने गेस्टरूम में। बाबा प्रवचन देते समय झूलते तो भक्त झूम-झूम कर तालियां बजाते।  झूलने और झूमने की इस युगलबंदी ने मीडिया को करोड़ों की कमाई करा दी। बाबा अब ब्रांड बन गये। विष्णु ने अपने दसों अवतारों में जितनी कला नहीं दिखाई उतनी झूलन बाबा ने अपने पहले अवतार में बटोर ली और बना ली। एक दिन बाबा के उदास बैठे थे। प्रधान चेला माधो आया-
- प्रभु के मुखचंद्र पर अवसाद के मेघ। संसार में सब कुशल तो है?
-वत्स! आवश्यकता से अधिक मक्खन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। कविता कम करो और हमारी पीड़ा से पीडि़त होने का प्रयास करो। हमारी चिंता के मूल में है हमारा अभी तक अरबपति नहीं हो पाना। तुम्हें ज्ञात ही है कि हाथ-पांव मरोडक़र, अंतडिय़ां घुमाकर हम करोड़ों तक तो पहुंचे किन्तु..............।
- क्यों न हमलोग दवाई बेचें?
- गटर का मुंह ख्ुाला तो बास आई। जब बोलोगे गंदा ही बोलोगे गंदा के अलावा कुछ नहीं बोलोगे?
- गुरूदेव, बीमारियों का भय दिखाकर आपने योग बेच दिया अब दवाइयां बेच दो। छा जाओगे। टी वी वाले तो तुम्हारे साथ हैं ही। किसी प्राचीनकाल के ऋषि के नाम पर दुकान खोल दो।
      प्रत्युत्तर में बाबा ने चेले को खड़ाऊं दिखाकर भगा दिया। पुन: पीपल के नीचे बैठकर चिंतन करने लगे। उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ कि दवा बेचना मुफीद धंधा है। बीमारी कभी खत्म नहीं होगी। ग्राहक कभी खत्म नहीं होंगे। उनकी अन्र्तात्मा ने हडक़ाया-  मूर्ख ! एक सौ पच्चीस करोड़ की जनता को मूर्ख बनाने के लिए सात समुंदर पार से व्यापारी आ रहे हैं और तू अगर-मगर कर रहा है। कूद जा। बाबा कूद गये। प्राचीन काल के एक ऋषि के नाम पर दुकान खोल ली। समस्या आ गई मॉडलिंग की। चेलों ने सलाह दी कि सलमान खान या शाहरूख खान की मदद ली जाये। देशहित में मॉडलिंग की मांग की जाये। नहीं करें तो पाकिस्तान भेज दिया जाये। बाबा नहीं मानें। अवतारी थे स्वयं मॉडलिंग चालू किया। स्क्रीन पर पधारते, शुद्ध हिन्दी उवाचते, वेदों-पुराणों के उद्धरण प्रस्तुत करते, अन्य कंपनियों को विदेशी बताते, स्वयं को स्वदेशी घोषित करते, अंत में अपने ब्रांड को भारतीय संस्कृति का प्रतीक बताकर ठोक देते। बाबा का तंबू बाजार में गड़ गया और माल चल निकले। दवा बिकी और खूब बिकी। बाबा को गेरूआ वस्त्र में देखकर ही लोग हाथ जोड़ देते। भारत भू पर दो तरह की मानवजाति पाई जाती है श्रद्धालू और शंकालू। श्रद्धालू मनुष्य बाबा ब्रांड केवलम का जयगान कर रहे थे। शंकालू बाबा की जड़ खोदने में लगे थे। दोनों से बाबा ब्रांड को लाभ हो रहा था लेकिन एक दिन फिर बाबा ने मुंह लटका लिया। माधो आया। उसने मर्म पर हाथ रखा।   
-गुरूदेव! कष्ट का कारण ज्ञात हो तो निदान की दिशा में प्रस्थान करूं।
- मूर्ख शिष्य! तुझे ज्ञात नहीं कि औषधियों के व्यापार से हम वांछित ऊंचाइयों को प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। हमारे सामने आडाणी और अम्बानी भागे जा रहे हैं। हम बाम बेच रहे हैं।
माधो चिंतन में लीन हो गया। पांच मिनट तक उसको ताकते रहने के पश्चात बाबा समझ गये कि बालक चिंतन को प्राप्त हो गया तो उन्होंने अपने आवास पर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय चिंतक बुलाये और चिंतन पर पिल पड़े। घनघोर चिंतन के उपरांत निष्कर्ष निकला कि फैशन के बाजार में बाबा को खूंटा गाडऩा चाहिए। बाबा ब्रांड साबुन, शैंपू, तेल, बच्चों के कच्छे से लेकर कंघे तक। बच्चे और महिलायें इन्हें साध कर ही बाजार में झंडा फहराया जा सकता है। बाबा की धोती आसमान में सूखने लगी। बाबा टी वी पर आते और घोषित करते कि उनका ब्रांड देशी जड़ी-बूटियों से बना है। बाजार में जो उत्पाद हैं वे विदेशी केमिकल की बनी हैं। विदेश में जड़ी-बूटियां तो मिलती नहीं हैं। संसार में भारतवर्ष नामक देश एकमात्र देश है जहां जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। वह भी सबको ज्ञात नहीं है। बाबा चूंकि अवातारी हैं अत: अपने ज्ञान चक्षु से नाना प्रकार के घास-पत्ते देखकर उनको घोंटकर सौंदर्य प्रसाधन बना लेते हैं। एक अज्ञानी शिष्य ने एक दिन कहा-
-गुरूदेव ! सौंदर्य प्रसाधनों में हम भी रसायनों का प्रयोग तो कर ही रहे हैं पर जनता से कहते हैं कि यह प्राकृतिक है। यह पाप नहीं है?
-कदापि नहीं। यह प्रतिपाप है। पाप के निवारण हेतू किया गया पाप प्रतिपाप कहलाता है। यह भारतभू से विदेशी कंपनियों को उखाडऩे हेतू एक प्रयास है। अत: पाप की परिधि से मुक्त है।
 वह शिष्य कुटिया में उस दिन के बाद नहीं दिखा। बाबा ब्रांड, चावल से लेकर टावल तक बाजार में आ गये। सौंदर्य वृद्धि से लेकन पौरूष वृद्धि तक के उत्पाद बाजार में उपलब्ध हो गये। चीनी से मधु बनाने की तकनीक केवल बाबा के पास थी। केश से लेकर दंत तक कांतिमान हो चुके थे। ग्राहक यदि एकबार बाबा ब्रांड उत्पाद ले जाएं तो उनके कई उद्देश्यों की पूत्र्ति हो जाती थी। केश हेतू लिया गया तेल बेसिन में हाथ धोने के काम आ रहा था। शौच से आने के उपरांत हाथ धोकर भक्त मन को पवित्र कर रहे थे। दंत चमकाने हेतू लिये गये पेस्ट भी अंत में उसी गति को प्राप्त हो रहे थे। आटा लगे हाथ मैदे का कार्य भी सम्पादित कर दिया करता था। बनी हुई रोटी यदि मुख में जाने में विलंब करे तो अमरत्व को प्राप्त हो जाती थी। मसूड़े बेशक बाहर आ जायें रोटी का बाल भी बांका नहीं होता था। चावल उदर में प्रवेश करके सकुशल अगले दिन शौचालय में उतर आते थे। अंात उस भात का मर्दन नहीं कर पाती थीं। भक्त कुनमुनाते तो बाबा के तर्क थे कि ये प्रतिपाप हैं। ग्राहकों को सावधान करने हेतू यह आवश्यक है। भक्त अब बाबा पर जोर दे रहे थे कि इलैक्ट्रॉनिक बाजार में भी खूंटा गाड़ें। माया की कमी तो रही नहीं। अरबों की माया चरणों को धो रही है। बाबा टी वी और मोबाइल बेचने के चक्कर में थे नहीं क्योंकि इसमें स्वदेशी तकनीक और प्राचीन संस्कृति का लेबल चिपकाना मुश्किल था। उन्हें मालूम था धर्म और संस्कृति की पट्टी आंखों पर बांधे बिना उनका माल बिक नहीं सकता।
बाबा ब्रांड की धूम मचते ही बाबा की राजनीति में खासी पकड़ हो गई। उन्हें यह ज्ञात हो गया कि कश्मीर समस्या का निदान क्या है? देश से गरीबी दूर हो चुकी है। आदिवासियों की भुखमरी के लिए सरकार दोषी नहीं है, पाकिस्तान की ईंट से ईंट कैसे बजाई जाये, विपक्षी दलों को मटियामेट कैसे किया जाये। सरकार भी बाबा के पुण्य से लाभ उठा रही थी। मंत्रीगण बाबा के चरणरज हेतू कतारबद्ध थे। बाबा को जेड ग्रेड की सुरक्षा प्रदान की गई। सत्ताधारी दल के साथ बाबा की दांत काटी रोटी की मित्रता थी। बाबा ब्रांड की निंदा राष्ट्रनिंदा की श्रेणी में आ गये थे। धर्म और संस्कृति की खोल में छिपकर किया गया पाप पुण्य की श्रेणी में आता है। भक्तों को अब उस दिन की प्रतीक्षा है जब बाबा देश की बागडोर अपने हाथों में ले लेंगे ताकि भारत भू पर एक बार पुन: धर्म की सत्ता स्थापित हो सके।