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Tuesday 21 Nov 2017

कवि सम्मेलन : एक कस्बे का


कमलकिशोर श्रमिक

254/1 न्यू लेबर कॉलोनी
बाबूपुरवा, कानपुर-208023
मो. 9389122619
गुजरते दिसम्बर के दस बजे सुबह का समय रहा होगा। टहलकर आया हूं और चाय पीने के बाद बीड़ी के दामों वाली सिगरेट सुलगाकर कुछ लिखने-पढऩे का मूड बना रहा हूं। तभी मोबाइल की घंटी बजी। हैलो! और नाम बता देने के बाद कोई अविनाश जी बोले; ‘‘आपका फलां जगह आना बहुत जरूरी है। लोग आपको सुनना चाहते हैं। भाई स्व. प्रचण्ड जी को तो आप जानते ही होंगे। उन्हीं की स्मृति में कवि सम्मेलन हो रहा है।’’
मन में आया कह दूं, ‘‘अब मैं कवि सम्मेलनों में नहीं जाता।’’ यह बात आंशिक सत्य भी है। पिछले तीन दशकों में तीन-चार बार ही गया हूं, मगर अभाव रोटी और सर्दी की तात्कालिक जरूरतें इंकार नहीं करने देतीं। पूछ बैठता हूं, ‘‘भाई कुछ व्यवस्था है क्या?’’ उधर से व्यंग्यात्मक आवाज आती है, ‘‘आप तो जनता के प्रतिबद्ध कवि हंै। आप सौदा कबसे करने लगे?’’
‘‘क्यों, क्या प्रतिबद्ध कवि का पेट नहीं होता? आप मुझे यदि जानते हैं तो यह भी जानते होंगे कि मैं पूर्णकालिक कवि हूं।’’ मेरी आवाज मेरी नाराजगी की चुगली कर रही है।
‘‘नहीं-नहीं, मैं आपको निराश नहीं करूंगा। पत्र-पुष्प के रूप में आपकी एक हजार की व्यवस्था हो जाएगी। बस 40 किलोमीटर तो आपको आना ही है।’’
‘‘ठीक है’’ कहते हुए मैंने मोबाइल ऑफ कर दिया मगर एक आक्रोशपूर्ण आंतरिक बेचैनी दिमाग पर हावी हो गई। इंकार क्यों नहीं कर सका।
आज से तीन-चार दशक पहले मंच जनता से सीधे अपनी बात कहने का माध्यम था। गंभीर कवियों के साथ मध्यान्तर के रूप में कोई एक आध हास्य व्यंग्य का कवि जायका बदलने के लिए पढ़वा दिया जाता था, किन्तु आज लेखक, लेखन कवि मंच सभी कुछ बाजार के इशारे पर उपभोक्ता संस्कृति की मीनारें गढ़ रहे हैं। मन में तो आया कि पूछूं जोकरों को कितने पत्रपुष्प चढ़ा रहे हैं। हाथ जलने के बाद सिगरेट के आखिरी कश के साथ समय का सारा झूठा सत्य जो पहले से जानकारी में है, दिमाग में उभर आया। मन हल्का हो गया और मैं आल्हा छंद में गुनगुना उठा-
‘‘शौक नौकरी का नाही है
रोटी चहय जहां लई जाय?’’
दूसरे दिन सुबह मैं टहलने भी नहीं गया। तैयारी जो करनी है। मैला पायजामा-कुर्ता धोना, प्रेस कराना, अपने संकलनों की कुछ कविताएं देखना, इस ढलती आयु में बड़े काम लगने लगे हैं। कभी सैकड़ों कविताएं याद थीं। अब भूल गया हूं। मंच पर डायरी या किताब देखकर तारतम्य टूट जाता है और हूटिंग हो जाती है। पर क्या करूं? न तो सुनाने का वह उत्साह है और न ही अधिक जाना होता है। पिछले कई दशकों  से गद्य लेखन भी एक कारक है। शेष याददाश्त तो जन्म से ही धोखेबाज रही है। इस सबके बाद भी यदि कुछ सुकून है तो बस यही है कि कविता के माध्यम से अपने मूल्यों पर आधारित कुछ बातें जनता से कर लेता हूं।
लगभग 2 बजे बस में बैठ गया। बस में तिल भी न समाने का मुहावरा स्पष्ट दिखाई दे रहा है। उस पर सत्तर रुपया किराया! मन ही मन में गाली देता हूं।
शायद मेरी ढलती उमर पर तरस खाकर कन्डक्टर ने अपनी आधी सीट में मुझे बैठा लिया। दस किलोमीटर के बाद से शहर छूट गया। और गड्ढों से भरी संकरी सडक़ पर बस हिचकोले खाने लगी। तब मैंने बस पर भी निगाह डाली। गेट का दरवाजा तार से बंधा हुआ था। कुर्सियों के कवर चीथड़ों की शक्ल में... बस में होने वाली तरह-तरह की आवाजें पश्चिमी संगीत से होड़ कर रही है। मुझे लगा बस में हार्न को छोडक़र सब कुछ बज रहा है। पांच किलोमीटर के बाद निर्माण कार्य का बोर्ड लगा था और बस छह फुट नीचे उतरकर चली। उधर से भी एक बस आ रही थी। निकलते वक्त मेरी बस एक तरफ की कुछ इस तरह झुकी कि लगा अब गई तब गई। मैं बहुत डरपोक नहीं हूं। मगर मरने की कुछ खास वजह का आकांक्षी अवश्य हूं।  इधर यह प्रक्रिया हर पांच या दस मील पर दोहराई जाती रही है। जंगल में भयग्रस्त आदमी गाने लगता है, की मानसिकता में मैं कंडक्टर से पूछा बैठा- ‘‘मैं आज से करीब 20 वर्ष पहले आया था। तब भी यहां निर्माण कार्य चल रहा था अब भी चल रहा है। क्या कारण है?’’ उसने मुझे कुछ इस तरह से देखा जैसे किसी उजबक को देख रहा हो या जैसे बौरे गांव ऊंट आ गया हो। फिर शायद मेरी आयु का ख्याल करते हुए बोला, ‘‘बाबूजी यहां बारहों महीने निर्माण कार्य होता है। क्या आपको पता नहीं है कि ये निर्माण कार्य एक मुनाफे का धंधा है। ठेकेदार को 40 प्रतिशत कमीशन अधिकारी को देना होता है। 60 में मजदूरी, मेटेरियल का खर्च खुद की मेहनत की कीमत, गाड़ी के पेट्रोल का खर्च और इसके बाद भी इतनी बचत कि ठेकेदार सौ करोड़ का आदमी समझा जाता है। इस तरह सडक़ रोज आगे पीछे बनती है, रोज खराब होती है और यह दस्तूर बारहों महीने  चलता है। आप बीस वर्ष पहले इधर आए थे। मैं पच्चीस वर्षों से इधर इसी रोड पर चल रहा हूं?’’ एकाएक मेरे मुंह से निकल गया क्या कोई दुर्घटना नहीं होती। वह बोला क्यों, नहीं होती? क्या आप अखबार नहीं पढ़ते? हर तीसरे चौथे दिन कोई न कोई दुर्घटना में मर जाता है। दो तीन बार तो मेरी ही गाड़ी उलट चुकी है पर इससे क्या? क्या धंधा बंद हो जाएगा या यातायात बंद हो जाएगा? बातें लम्बी होती गई इससे एक फायदा यह हुआ कि समय का पता नहीं चला। जब मैं कस्बे के बस स्टाप पर उतरा छह बज चुके थे अर्थात् चार घण्टे चालीस मील बस चली। 10 मील प्रति घंटे की रफ्तार से। मैं लोगों से पूछने के बाद ‘सुमन डिग्री कॉलेज’ की ओर चल पड़ा। शाम को सिलेटी धुंधलका पूरी तरह उतर आया है। मैं बीस वर्ष बाद इस कस्बे को देख रहा हूं। समय के साथ काफी कुछ बदल चुका है। गड्ढों वाली सडक़ के दोनों ओर बैंक, बीमा कंपनी, मोबाइल शॉप, शूज-शाप, गारमेण्ट्स तथा फास्ट फूड या तरह-तरह की आधुनिक फैशन और श्रृंगार प्रसाधनों की दूकानें इस बदलाव को साबित कर रही है। इन्हीं दूकानों के आगे सडक़े के किनारे अपनी बैलगाड़ी को झुग्गी की शक्ल में सजाए खानाबदोश पहियां लोहार लोहा पीटने का काम भी कर रहे हैं। सडक़ के पीछे सरसों के खेत दूकानों की रोशनी में झलक रहे हैं। मैं सोच रहा हूं कि ये कस्बे भी पुरातन और आधुनिकता के संगम स्थल हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी की फंतासी मेरे दिमाग से निकलकर मेरे होंठो पर खिल जाती है। मैंने लोहारों पर एक प्रशंसात्मक दृष्टि डाली जिन पर अभी भी बाजार का कोई प्रभाव नहीं है। मैं जब कॉलेज के गेट पर पहुंचा अविनाश जी स्वागत करते हुए मिले, ‘‘दादा प्रणाम! आप आ गए बड़ी कृपा की, मैं तो सोच रहा था आप नाराज हो गये।’’ मैं इस बात के जवाब में कुछ कहने ही जा रहा था, तभी एक टैक्सी गेट के भीतर आकर रुकी और एक साहब उतरे। अविनाश मुझे छोडक़र उधर लपक लिये, ‘‘अरे भाई टमाटर जी! आपके लिए तो लोग पगलाये हुए हैं। कई बार डीएम साहब मोबाइल पर पूछ चुके हैं?’’
टमाटर जी ने अविनाश के कंधों पर हाथ रखते हुए, ‘‘यार मैं ग्वालियर का पचास हजार का प्रोग्राम छोडक़र तुम्हारी बात पर बीस हजार में आया हूं।’’
ये सब कुछ मेरे लिये नया नहीं है मगर जाने क्यों क्षण भर को मेरा कवि उदास हो गया? मगर केवल क्षण भर को ही क्योंकि मुझे पता है- बाजार की नजर में मेरी कोई कीमत नहीं है।
तभी कार वाले युवक (टमाटर जी) की निगाह मुझ पर पड़ी। वह लपककर मेरे पास आया और मेरे पांव छूने के लिए नीचे झुका। मैंने बीच में ही हाथ पकड़ते हुए कहा ‘‘अरे भाई क्या करते हो?’’
वह बोला, ‘‘दादा यह तो मेरा अधिकार है। दादा कविताएं तो आप लिख रहे हैं। मैं तो लतीफेबाज हूं। पैसा पैदा करता हूं और कविता का धंधा करता हूं।’’ मैं अभी भी उसे पहचान नहीं पाया था। इस तरह की बेशर्म आत्मस्वीकृति मैं दर्जनों बार सुन चुका हूं। मुझे यह भी लगा कि जैसे वह मुझ पर व्यंग्य कर रहा हैा किन्तु औपचारिकतावश पूछ  बैठा- ‘‘आजकल और क्या कर रहे हो?’’ ‘‘दादा आपकी कृपा से पटेले डिग्री कॉलेज में हिन्दी का विभागाध्यक्ष हूं। इसके लिए कवि सम्मेलनों की एक माह की कमाई भेंट करनी पड़ी। और दादा मेरे लायक कोई सेवा?’’
‘‘बस ठीक है।’’
अब हम दोनों बात आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे। मुझे एक साधारण से कमरे में टिका दिया गया। लगभग आठ बजे कवि सम्मेलन प्रारंभ हुआ। कस्बे में ही रहने वाले एक राजमंत्री के द्वारा कवि सम्मेलन का उद्घाटन हुआ तथा डीएम साहब की अध्यक्षता की माइक से घोषणा की गई।  अब मंत्री जी को माला पहनाने के लिए नेताओं एवं व्यापारी किस्म के लोगों के नाम पुकारे जाने लगे। हर व्यक्ति आता और गुलाबों की एक माला मंत्री जी के गले में डाल देता। यह क्रम लगभग एक घंटा चला और मंत्रीजी फूल मालाओं से लद गये। संचालक ने मंत्री जी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें आश्वस्त किया कि क्षेत्र की जनता और साहित्यकारों की संस्था उनके साथ है। दूसरे शब्दों में अगले चुनावों में वोट आपको ही प्राप्त होंगे और आप जीतेंगे।
इसी तरह डीएम तथा अन्य पदाधिकारियों को भी माल्यार्पित किया गया। मंत्री जी ने अपनी भाषा में शहद घोलते हुए विनयपूर्वक कहा- ‘‘हर युग में कविता और कवि राजनीति को दिशाबोध कराते रहे हैं और आज भी करा रहे हैं। जिन्दगी का सत्य हमारे टमाटरजी की कविता में ताल ठोककर बोलता है।’’
टमाटर जी अपनी जगह पर हाथ जोडक़र बाग-बाग हो गये। इसी क्रम के साथ मंत्री जी अपनी व्यस्त जिंदगी की असमर्थता बताते हुए लगभग पचास लोगों के साथ दस कारों का काफिला लेकर प्रस्थान कर गये। डीएम साहब भी उन्हीं के साथ थे। लगभग दो घंटे इस कार्यक्रम में खर्च हुए तथा डीएम के अध्यक्षीय स्थान की पूर्ति के लिए एक स्थानीय वयोवृद्ध कवि ‘रसवल्लरी’ जी को अध्यक्ष घोषित किया गया। इन्हें आप भारतीय राष्ट्रपति या रबर स्टैम्प भी कह सकते हैं क्योंकि अगले पांच या छह घंटे चलने वाले कवि सम्मेलन में वे बिना कुछ बोले बैठे रहे और समापन पर जब केवल दरी या कुर्सी उठाने वाले रह गये उन्होंने दो छोटी कविताएं सुनाईं और कवियों और जनता का आभार व्यक्त करते हुए औपचारिक रूप से कवि सम्मेलन के समापन की घोषणा की। कवि सम्मेलन में टमाटर जी, चम्मच जी, बैगन बांगड़ू, फुलझड़ी जी आदि ने द्विअर्थक लतीफों से समा बांध दिया। आगे की कुर्सियों के कहकहे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं और इन्हें हंसता देख आमजन भी हंस रहे हैं। जब टमाटर जी ने पत्नी को दांव देकर साली के रोमांस वाली कविता सुनाई तो आगे की पंक्ति हंसी के आगोश में लोट-पोट हो आपस में टकराने लगी। इसी बीच चाय आ गई। संयोजक ने मध्यांतर के अंदाज में मेरे नाम की घोषणा की। इस बीच मैं ठहाकों के दौरान क्षोभ और क्रोध से उबल रहा था। मैं माइक के सामने पहुंचा और बिना किसी भूमिका के कहने लगा- ‘‘यदि आप लोग वास्तव में कविता सुनना चाहते हैं तो पहले यह चाय का वितरण बंद कीजिए। इसका थोड़ा-सा असर पड़ा। मैं बोलता गया पता नहीं आप कैसे हंस लेते हैं। मुझे तो इन कविताओं पर रोना आ रहा है। आज आम जनता महंगाई, बेरोजगारी, शोषण, दोहन व उत्पीडऩ से कराह रही है और आप कविता के नाम पर जोकरों को प्रोत्साहन दे रहे हैं? अगर मंचों का यही हाल रहा तो अगली पीढ़ी इसी जोकरी को ही कविता समझेगी और कविता इतिहास की वस्तु बन जाएगी।’’ तभी अगली कुर्सियों से किसी ने कहा- ‘‘अरे साहब कविता सुनाइये! भाषण न दीजिए।’’ मैं जलकर बोला, ‘‘हां! मैं कविता ही सुनाऊंगा। भाषण इसलिए दे रहा हूं कि कविता के नाम पर जो कचरा आप अपने दिलोदिमाग में इकट्ठा कर चुके हैं वह निकल जाए और आप सही कविता हजम कर सकें।’’ मेरा आक्रोश रंग लाया। हल्की भिनभिनाहट के साथ एक अस्थायी शांति माहौल में पसर गई। मैं करीब पांच मिनट वर्तमान कविता क्या होनी चाहिए? इस पर बोलता रहा। अब एक चुनौतीपूर्ण समय मेरे सामने था। मैंने भूमिका में एक कथा पढ़ी-
‘‘बाजुओं को मिलाकर देखेंगे।
एक पर्वत हिलाकर देखेंगे।
इस अंधेरे की बदतमीजी को
दोस्त हम घर जलाके देखेंगे।’’
पहली ही कतार में हंगामा... पीछे की कतारों के लोग वाह-वाह चिल्ला उठे। क्या बात है? ये है कविता। फिर से पढिय़े! फिर से पढिय़े! की आवाजें पंडाल में गूंज उठी। बस मैं यही तो चाहता था। फिर मैंने पीछे मुडक़र नहीं देखा! अब मेरी याददाश्त भी खुल गई थी। मैंने तकरीबन एक घण्टे तक क्रांतिकारी रचनाएं सुनाई। आगे की कुर्सियां खाली हो गई। मगर आम जनता के लोग दरी से उठ-उठकर उत्तेजित हो दाद दे रहे थे। मैं खुद भी थक चुका था। अंत में एक और सुनाइये के शोर के बीच मैं यह कहते हुए नीचे उतर गया कि कभी पुन: अवसर मिला तो फिर सुनाऊंगा। अब मेरा समय काफी हो गया है। मंच पर और कवि भी सुनाने के लिए बैठे हैं। मैं मंच से उठकर पंडाल से बाहर निकल आया। करीब पचास लोगों की भीड़ ने मुझे घेर लिया। कुछ पढ़े-लिखे युवा मेरे ऑटोग्राफ मांगने लगे। तभी एक युवक भीड़ को हटाते हुए मेरे पास आया और बोला- ‘‘अरे दादा आप यहां कैसे फंस गये?’’ मैंने पहचान लिया, यह मनोज है जो पांच वर्ष पूर्व जब मैं एक अखबार में कॉलम लिख रहा था वह वहां काम कर रहा था। वह एमए, बीएड के साथ पीएचडी कर चुका था और एक प्रगतिशील युवक है। मुझे याद है जब एक दिन मैंने मनोज से कहा था, ‘‘भाई तुम किसी इंटर या डिग्री कॉलेज में क्यों नहीं निकल जाते? यहां सिर्फ छह हजार में पड़े हो।’’ उसने बड़ी मायूसी से कहा था, ‘‘दादा चार बार रिटेन निकाल चुका हूं। सारे सही जवाब देने के बावजूद इंटरव्यू में या तो फेल कर देते हैं या वेटिंग में डाल देते हैं। मेरे मां-बाप की यह हैसियत नहीं है कि वे दो-तीन लाख रुपया घूस दे सके। पता नहीं कितना कुछ सहते हुए उन्होंने मुझे पढ़ाया है और अब मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।’’ मैंने कहा ‘‘मनोज, क्या तुम्हें भी बताना पड़ेगा मैं यहां क्यों फंसा? लेकिन अब मुझे संतोष है कि मैंने अपनी बात जनता से कह ली  है और बताओ क्या हाल है?’’
  ‘‘दादा ठीक ही है। मैं चीफ ब्यूरो बनाकर यहां भेजा गया हूं। पैसा भी कुछ बढ़ गया है। पर महंगाई का क्या हाल है यह तो आप देख ही रहे हैं पर कलम चल रही है?’’ मैं मनोज को लेकर अपने कमरे में आ गया और कुछ पुरानी बातों में मशगूल हो गया। तभी एक महोदय आये। मनोज ने परिचय कराया ‘‘ये यहां के चेयरमैन हैं।’’ उन्होंने पूछा ‘‘आपका खाना भिजवा दें।’’ ‘हां’ कहने पर बोले ‘‘और किसी चीज की जरूरत?’’ ‘नहीं! धन्यवाद।’ वे चले गये। उनके जाने के बाद मनोज ने बताया कि ये दो बार यहां के चेयरमैन रह चुके हैं। तीसरी बार महिला सीट होने के कारण अब उनकी पत्नी चेयरमैन है। वो घरेलू स्त्री हैं। कभी किसी मीटिंग में नहीं आती है। ये महोदय ही सारा काम करते हैं। सभी अधिकारी यह बात जानते हैं। मगर कोई कुछ नहीं कहता। इन्हें सबको खुश रखने की कला जो आती है। तीन मकान है, सैकड़ों बीघा जमीन है। दूसरे के नाम से ठेकेदारी भी करते हैं। दस लाख की गाड़ी है। जो सदैव बड़े अधिकारियों या नेताओं की सेवा में लगी रहती है। मनोज जा चुका है और मैं सोच रहा हूं ‘कथाक्रम’ में प्रकाशित एक कहानी के बारे में जिसमें एक मीटिंग में डी.एम. की उपस्थिति में एक महिला ग्राम प्रधान को उसके पति ने घसीटकर पीटा था और महिला ने बच्चों का हवाला देते हुए डी.एम. से पति के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का अनुरोध किया था। साहित्य में स्त्री विमर्श भले ही केन्द्र में हो परन्तु समाज के हाशिये पर भी स्त्री सुरक्षित नहीं है।
मेरे ही कमरे में ‘रसवल्लरी’ जी भी टिके थे। मुझे मनोज से बातें करते देख खामोश रहे और गले तक कम्बल डाले जाग रहे। बोले ‘‘आपने अपनी कविताओं में वर्तमान समाज की तस्वीर पेश की और विकल्प की ओर इशारा भी किया मगर क्या फर्क पड़ेगा? आम जनता तो रोटी-पानी की जरूरत में जी और मर रही है। बड़ा अन्याय है। कोई सुनने वाला नहीं है। अब मुझे ही देखें। यहीं दस मील दूर एक गांव में रहता हूं। इस अवस्था में भी किसी उम्मीद के साथ आया था। कहने को अध्यक्ष रहा परन्तु जोकरों को बीस-बीस तीस-तीस हजार दिए गए और मुझसे कहा गया पैसा तो बचा ही नहीं है। बस दो सौ रुपए बचे हैं, फिलहाल रख लीजिए। आगे पीछे देखेंगे। आप तो घर के ही हैं। कौन देखता है आगे पीछे?’’ कहते हुए जो करुणा उनके चेहरे पर दिखाई दी, समझ में नहीं आता उसे कौन से शब्द दूं? उन्होंने छायावादी ढंग की कविताएं सुनाई थीं जिसमें आदमी की जिंदगी की छाया तो थी है मगर ये रोज हजारों रुपए कमाने वाले विदूषक...?
सुबह नौ बजे की बस थी। मैं आठ बजे तैयार होकर अखबार देख रहा हूं। एक अखबार को छोडक़र किसी भी अखबार में मेरा कोई जिक्र नहीं है। हां एक अखबार में मेरे चित्र के साथ मेरी क्रांतिकारी कविताओं का प्रभाव एवं वर्णन था। यह मनोज की मेहरबानी थी जो मुझे दूसरा सुकून दे रही है। मैं अखबार को बगल में दबाये बस में बैठा हूं। यह सोचते हुए राहत महसूस कर रहा हूं कि चलो इनसे भी फुरसत मिली क्योंकि अब ये लोग दुबारा मुझे कभी नहीं बुलाएंगे।