Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

उसकी लड़ाई

वेदप्रकाश अमिताभ
डी-131, रमेश विहार, अलीगढ़-202001
मो. 09837004113
‘वाट्स अप’ पर एक जोक खूब ‘वायरल’ हुआ था कि बड़े से बड़ा ज्योतिषी भी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि आज काम वाली बाई आएगी कि नहीं? आएगी तो कब तक आएगी? हमारी महरी लछमी के बारे में यह भविष्यवाणी सही होती ही थी। अगर उसे आने में अधिक देर हो रही है, मान लीजिए कि अब वह नहीं आएगी। आज की छुट्टी। अगर आपने पूछ लिया, कल क्यों नहीं आई? आज देर से क्यों आई? बस उसके नए-नए बहाने ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की तरह फ्लैश होने लगते हैं-
‘आज सामने वाली पड़ोसिन ते रार है गई इसलिए...’
‘सिदौसी ननदोई आय मरौ या लिए’
‘कल आंटी जी! लल्ली को हाल बेहाल हो गयो तो कैसे आवती?’
‘अरे खबर तो करा सकती थी कि नहीं आ पाऊंगी।’
‘यहां मरबे की फुरसत नाय हती, खबर कहां से करती?’
उसकी भाषा ऐसी कि कभी खड़ी बोली तो कभी ब्रज-भाषा में आवाजाही। रोज ऐसे-ऐसे बहाने कि सुनने वाले पक्के हो गए थे, इसलिए उसकी व्यथा-कथा सिर के ऊपर से ही निकल जाती थी। लेकिन आज ध्यान देना ही पड़ा। एक तो उसके बाएं हाथ पर पट्टी बंधी हुई थी, दूसरे चेहरा भी खासा रूआंसू था। आज कोई ‘ब्रेकिंग न्यूज’ फ्लैश नहीं हुई तो मुझे पहल करनी पड़ी-
‘क्या हुआ लछमी? कैसे चोट लग गई?’
इतना पूछना था कि जबर्दस्ती रोका हुआ दारुण दुख का प्रवाह जैसे बांध को तोड़ के बहने लगा। आंखों से और मुंह से भी-
‘जैसा मेरा संग भया, वैसा किसी दुश्मन को भी न भोगना पड़े आंटी। मेरा गरब-गुमान गुम गया और’... वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई कि फूट-फूट कर रोने लगी। इतनी जोर से रोई कि ये भी अपने कमरे से बाहर निकल आए कि क्या दुर्घटना हो गई?
उसे जैसे-तैसे चुप कराया। पानी पिलाया। चाय के साथ दो-तीन बिस्कुट भी पकड़ा दिए थे। बिस्कुट खाकर धीमी सी आवाज में बोली थी- ‘आंटी भगवान आपको भलौ करै। मरती हुई को जिवाय दिया। कल से अन्न का दाना पेट में नहीं गया था...।’ अब मेरी जिज्ञासा चरम पर थी। मैं घर की सफाई, पौंछा सब भूल गई। ऐसा क्या हुआ कि कल दिन में रोटी भी नहीं खाई। मैं उससे सच्चाई उगलवाने वाली थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी। देखा तो लछमी का छोटा वाला बेटा था- ‘अम्मा यहां आई है क् या? कल सांझ कूं घर ते अनत चली गई। कछू पतो नाय, गई तो कहां गई...’ बोलते-बोलते उसकी नजर लछमी की चप्पलों पर पड़ी तो खुश हो गया... अरे विनकी चप्पल तो जे रही। बेेटे को देख लछमी दरवाजे पर आ गई और उसने उसे यह कहकर विदा कर दिया था कि सांझ तक घर पहुंच जाएगी।
‘यू रात भर कहां रही री?’.... अब मेरी जिज्ञासा का कोई ओर-छोर नहीं था।
‘और कहां जाती, जेठानी के घर उसी की छत पर पड़ी रही...’ फिर एकदम से चमक उठी थी- ‘आंटी, तुम्हारा ऊपर वाला कमरा तो खाली रहे है। आप कहो तो रात में वही टिक जाया करूं। जमीन पर ही सोय लूंगी।’
यह सुनकर मुझे सनाका सा हुआ। मेरी करुणा दुर्बल होने लगी थी। कहीं सचमुच रहने के लिए आ मरी तो सारी कॉलोनी में बेमतलब की कुचर्चा होने लगेगी।
‘क्यों री! ऐसा कौन सा आसमान टूट पड़ा कि तुझे बेघर होना पड़ गया? तू तो घर की मालिकन है। तेरा मरद, तेरे बेटा- सब तेरे ही आसरे हैं।’
‘‘अब कोऊ मेरे आसरे नहीं आंटी जी! सब अपने मन के मालिक ठहरे। मरद कुछ करै न धरै, बस हुकुम चलाता है। कई बरस पहले बीमार पड़ा था, बचने की आशा नहीं थी। तब मैंने रात-दिन सेवा करके वाकी जान बचाई थी। सब भूल गया। छोरों को भी पंख लग गए हैं। रह गई जरा सी नीरा। अभी दसवें साल में लगी होयगी। बाप उसका सौदा कर रहा है। पछांह का कोई मालदार दुहाजू है। बिना लुगाई रह नहीं पा रहा है। कुंआरी कन्या चाहिए। बाप-बेटा कुछ दिना पहले भट्टे पर काम करबे गए तो एक दलाल उनका यार बन गया। दो दिन पहले पूछते-पाछतो घर आय गयौ और नीरा को देखते ही कहने लगा, छोटी के ब्याह की चिंता मत करना। खाते-पीते घर में ब्याह करा दूंगा। दान-दहेज कुछ नहीं। छोरा पैसा वाला है, वही बीस-पच्चीस हजार रुपए दे मरेगा। तुम्हारे लडक़ों को काम-धंधा अलग से। बाप-बेटा यह सुनके मगन है गये। पर मैं समझ गई आंटी जी, बेटी बेचने का सौदा हो रहा है। मैंने उसे सौदेबाज को खूब खरी खोटी सुनाई। पर वह भी पक्का बेशरम। फिर आने की कहकर, चलता बना।’
‘फिर क्या हुआ री?’
‘फिर सबरे के सबरे मोपे टूट पड़े। बना  बनाया काम बिगाड़ दिया। बेटा समझ रहे कि उनके आगेे परसी भई थारी खेंच लई मैंने। मरद को लगा कि नशा-पत्ता का हिसाब गड़बड़ा गया। तब मैंने दो टूक कह दीनी, बेटी का सौदा नहीं होने देऊंगी। फिर... क्या मरद ने लात-घूंसी की बरसात सी कर दी। तीनों छोरा और बहू-तमाशा देखते रहे, कोई  बचाने नहीं आया और मैं...’ वह फिर फूट-फूट कर रोने लगी थी।
जरा संभली तो बताने लगी थी- ‘आप लोगों के यहां झाडू़-पोंछा न करूं तो ये सब भूखों मर जायें। पर वे मेरे आसरो हो के भी मेरे आसरे नहीं हैं। कल मैंने खाना नहीं खाया तो कोई पूछने तक नहीं आया। नीरा जरूर पास आकर रोने लगी थी। सांझ को घर नहीं लौटी तो अब उन्हें चिंता हो रही है, काहे की चून निबट रहा होगा...’ बोलते बोलते वह एकदम कठोर हो गई थी।
‘नीरा को बिकने नहीं दूंगी आंटी। ये लोग नहीं माने तो पुलिस पर जाऊंगी।’ फिर एकदम नरम होकर बोली थी-  ‘बिकी छोरी की पीर जे मर्द कहा जानें? सात फेरा लेने के बाद भी उसे घरवाली की इज्जत नहीं मिलती। सब उसे खरीदी गई नौकरानी समझते हैं...’
‘आप सोचोगी आंटी, लछमी कैसे जाने हैं ये सब। मैं भी इस घर में खरीद के लाई गई थी...।’ जाने कब से जमी हुई बर्फ पिघलने लगी थी और वह आंसुओं-सिसकियों में डूबने-उतरने लगी थी। उसके इस दारूण अतीत का मुझे कोई अनुमान तक नहीं था। अटक-अटक कर टुकड़ों में उसने बताया- ‘मैं बिहार के एक गांव की। बिना मां-बाप की बेटी। चाचा-चाची ने अलीगढ़ के एक दलाल को बेच दिया था। उसने इस घर में बेच दिया, बीस साल बड़े मरद के पल्ले बांध दिया। सास, ननद, ननदोई, देवर, पति सबने खूब सतायो। ऐसो जोर जुलुम नीरा के साथ मेरे जीते जी नाय होगा। खसम कूं मरबे ते बचाय सकूं तो मार भी सकूंगी। घर छोडऩे पड़े तो पड़े, मां-बेटी के लिए कहीं तो ठौर-होगो ही।’
उसने अपने आंसू पोंछ लिए थे। मैं सोचने लगी थी कि अकेले लडऩे-मरने को तत्पर इस बहादुर औरत की लड़ाई में क्या मैं भी शामिल हो सकती हूं?