Monthly Magzine
Friday 24 Nov 2017

खाली स्लेट

 

 वीरा चतुर्वेदी
102/68 सिल्वर ओक्स
डी एल एफ फेज
गुडग़ॉव-122002
इतनी मगन हो कर क्या देख रही हो अखबार में? गिरीश ने रमा के कंधे को छूकर पूछा तो वो एकबारगी चौंक पड़ी। फिर अपने को जरा संभाल कर बोली देखो, इस नन्हे मासूम बच्चे को देख रहे हो तुम? इसे एक अदद गोद की तलाश है। रमा ने अखबार गिरीश के हाथ में थमा दिया। गिरीश ने एक नजर अखबार में छपे शिशु की तस्वीर पर डाली और दूर कुर्सी पर जा बैठा। इस बच्चे में ऐसी क्या खास बात है जो तुम इतनी दिलचस्पी दिखा रही हो, ऐसी फोटोज तो रोज ही आती रहती हैं, अखबारों में। गिरीश का सवाल सुनकर रमा एकदम विचलित हो गयी- तुम्हें याद है 7-8 महीने पहले वाला वो केस, एक औरत ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने सास ससुर व पति तीनों की निर्मम हत्या कर डाली थी। गिरीश को कुछ याद आ रहा था। ऐसी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। उसने ऊब कर पूछा तो उसका क्या? रमा एकदम गंभीर हो आई। उस औरत को तो आजीवन कारावास की सजा मिली थी अपने प्रेमी के साथ लेकिन एक और प्राणी उस सजा का साझीदार बन चुका था बिना किसी अपराध के। ये औरत, पार्वती नाम था उसका, उस समय गर्भ से थी।
गिरीश को ऑफिस के लिए देर हो रही थी, इन कथा-कहानियों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी, खीज कर बोला- तो अब उस हत्यारिन का बेटा धरती पर आ चुका है और अखबार वाले उसकी फोटो छापकर सबका दिल बहला रहे हैं, यही न? चलो अब नाश्ता लगाओ मुझे देर हो रही है।
रमा ने एहतियात से अखबार को तहा कर एक ओर रखा और गिरीश के लिए नाश्ता लगाने उठ गयी, पर उसका ध्यान जैसे अखबार के उस खास पन्ने पर ही अटका हुआ था।
गिरीश को ऑफिस भेज उसने अपने पांच वर्षीय बेटे राघव को जगाया और तैयार कर के स्कूल बस तक छोड़ आई कमरे में लौटते ही वो फिर से अखबार ले कर उसमे छापी बच्चे की तस्वीर को अजीब निगाहों से देखती बैठी रही। तभी अचानक फोन की घंटी घनघना उठी। लम्बी घंटी, यानी सुदूर अमरीका में बैठी उसकी सहेली रीमा का कॉल होगा। रात सोने के पहले वो अक्सर रमा को फोन केर लेती और बचपन की ये सहेलियां घंटों हर विषय पर चर्चा कर के ही फोन रखती।
आज रमा को जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गयी। हेलो ! रीमा तेरी बड़ी याद आ रही थी, तुझसे एक मशवरा करना है बहुत जरूरी। रमा ने आतुरता से रिसीवर को कस कर पकड़ लिया। रीमा उसकी आवाज के आवेश को पहचान कर थोड़ा घबरा सी गयी। क्या बात है रमा, क्या हुआ एनी थिंग सीरियस? रमा एकदम से चालू हो गयी, देख रीमा मेरी बात ध्यान से सुनना। तुझे मालूम है मैं हमेशा से चाहती थी कि राघव को कोई भाई बहन जरूर मिले। वो पांच साल का हो रहा है और बहुत अकेलापन झेल रहा है. मेडिकली मैं अब और माँ नहीं बन सकती तो सोचती हूँ कि एक बच्चा गोद क्यूँ न ले लूं।् रीमा जरा आश्वस्त हुई। लो, ये बात है तो किसी अनाथ आश्रम को एप्रोच कर न, इतनी परेशान क्यों हो रही है। मेरे ख्याल में गिरीश भी इसके खिलाफ  नहीं हैं। फिर माजरा क्या है? रीमा ने जानना चाहा। अब जैसे रमा के धीरज का बांध टूट गया, जो कहना है झटपट कह डालने में ही भलाई है। बोली देख रीमा तू मुझे बचपन से जानती है। हम एक दूसरे  के इतने करीब हैं कि मुझे भरोसा है कि तू मेरी बात समझेगी।  मैं एक ऐसे बच्चे को गोद लेना चाहती हूँ जिसकी माँ ने अपने प्रेमी से मिलकर पति के साथ सास ससुर की भी हत्या कर दी थी और अब जेल काट रही है। रीमा को लगा एकबारगी उसकी सांस रुक गयी है। रमा को बीच में रोक कर बोल उठी- तू पागल तो नहीं हो गयी है रमा? ऐसी माँ का बच्चा कैसा निकलेगा क्या तू समझ नहीं पा रही? दुनिया में और बच्चे नहीं मिलेंगे क्या? रमा को ऐसी ही प्रतिक्रिया की उम्मीद थी तो पर उसे मालूम था कि वो सखी को अपनी बात समझा लेगी। दोनों ने कई साल मनोविज्ञान की कक्षायें साथ साथ अटेंड की थी और हेरिडिटी तथा एनवायरनमेंट विषय को लेकर न जाने कितनी सेमीनार और डिबेट्स में शिरकत की थी। रमा का हमेशा ही ये मानना था कि हेरेडिटी नहीं बल्कि बच्चे को बनाता या बिगाड़ता है उसका परिवेश, उसकी शिक्षा दीक्षा, और आसपास का माहौल। रीमा उसके तर्कों से कभी सहमत होती थी तो कभी असहमत। फिर दोनों ने राजकपूर की फिल्म आवारा देखी तो जैसे अनेक प्रश्नों के उत्तर और भी स्पष्ट हो गए। उम्र के साथ साथ रमा के ये विचार और भी पुख्ता होते गए और इसी दौरान वह माँ भी बन गई।
पर डिबेट में तर्क करना और उत्तर पुस्तिका में लम्बे लम्बे जवाब लिखकर वाहवाही लूटना अलग बात थी। यहाँ जिंदगी की सच्चाई से रूबरू होना था। रीमा कुछ सहम सी गयी धीरे से बोली रमा, मुझे मालूम है तेरे पास हर तर्क का जवाब है और सटीक भी। पर ऐसे प्रयोग करने की जरुरत ही क्या है? गिरीश हरगिज नहीं मानेंगे और परिवार तथा समाज के सामने तू जैसे हमेशा कटघरे में खड़ी रहेगी। मेरे ख्याल में बच्चा लेना है तो कहीं और से ले ले। हाँ राघव के बारे में तो सोच, अगर ये बच्चा माँ की तरह अपराधी प्रवृत्ति का हुआ तो? लेकिन रमा के लिए ये तर्क कुतर्क थे। वो बच्चे को ऐसे पालेगी, ऐसे संस्कार देगी कि वो कभी अपराधी बन ही नहीं सकेगा और हाँ उसने सोच लिया था कि वह गिरीश से कहेगी कि अपना तबादला ऐसी जगह करा लें जहाँ उन्हें कोई न जानता हो। फिर बच्चे पर ऊंगली उठाने वाला या गड़े मुर्दे उखाडऩे वाला कौन होगा?
किस्सा कोताह ये कि रमा ने पूरी तरह मन बना लिया था कि वह उस निर्मम हत्यारी माँ के बेटे को अपनाएगी और उसे एक आदर्श नागरिक बना कर ही दम लेगी।
पूरे एक माह हर दिन घर में शीत युद्ध चलता रहा। गिरीश रमा की जिद पर पहले हैरान, फिर परेशान और बाद में भावशून्य हो गए। ऐसा नहीं कि वे पुरातनपंथी सोच के थे, वो भी बहुत सुलझे विचारों के समझदार आदमी थे, पर वह जो हम किताबों में पढ़ते हैं और गुनने का दावा करते हैं, अगर जीवन में प्रश्न बन कर खड़ा हो जाय तो सब समझदारी और विवेक धरा रह जाता है। पर त्रियाहठ! गिरीश आखिर पत्नी के हठ के सामने झुक ही गए, होगा जो देखा जायेगा, वाला जुमला उन्होंने भी अपना लिया और संबंधित सरकारी मुलाजिमों से बात करने को राजी हो गए।
रमा की खुशी का ठिकाना न था। राघव भी बेहद उत्साहित था, आखिर उसके साथ खेलने वाला एक साथी जो घर आने वाला था। गिरीश ने अधिकारियों के सामने शर्त रखी कि इस बारे में न मीडिया कोई खबर छापेगा न पुलिस महकमा, बच्चा किस के घर गोद गया है इसकीसूचना किसी के साथ भी साझा करेगा। गिरीश किसी भी लफड़े में फंसने को तैयार नहीं थे।
रमा को बच्चा सौंपती माँ का चेहरा इतना कड़ा और भावहीन था कि रमा ने दुबारा उसकी ओर देखने कि हिम्मत नहीं की। वह उस चेहरे को याद रखना नहीं चाहती थी। बच्चे को उसने सीने से लगाया और बाहर की ओर तेज कदमों से चल पड़ी। दो दिन बाद ही उन्होंने जालन्धर छोड़ दिया और दूर बंगलोर में अपना आशियाना बना डाला। राघव के भाई का नाम माधव रखा रमा ने। गिरीश हँसे, राम और कृष्ण दोनों मिल गए तुम्हें, अब तो खुश हो। रमा वाकई खुश ही नहीं उल्लासित थी, वो एक बच्चे को उसके अतीत से निकाल कर नए किरदार में ढालेगी, मानो वो कच्ची मिट्टी से एक नयी मूर्ति बना कर उसमें प्राण प्रतिष्ठा करेगी। वह बच्चे को केवल प्यार करना सिखाएगी, जीव जंतु सबसे। उसकी जिंदगी में केवल प्यार ही होगा, केवल प्यार, नफरत से बहुत दूर रखेगी अपने बच्चे को। गिरीश अपने काम में व्यस्त थे, राघव, माधव के साथ मगन। दोस्त और भी थे पर नन्हे माधव के साथ खेलना उसे खूब भाता था। उसकी अपनी दुनिया थी सबसे अलग। फिर एक दिन किसी टूर से लौटकर आये गिरीश ने राघव के हाथ में वीडियो गेम रख दिया। गेम में उड़ती चिडिय़ों को एक-एक कर पिस्तौल से शूट करना था। गिरीश राघव को खेल खेलना सिखा रहे थे और नन्हा माधव मुंह में दो उँगलियाँ डाले कौतुक से सब कुछ देख रहा था।
रसोई में उलझी रमा ने पटाख पटाख की आवाज सुनी तो कमरे में दौड़ी आई। वीडियो गेम में एक-एक कर गिरती चिडिय़ों को देख उसका चेहरा पीला पड़ गया। क्या, ये क्या लाएं हैं आप बच्चों के लिए? ये मारधाड़ के खेल बिलकुल नहीं चलेंगे इस घर में ध्यान रखें आप आगे से। अजीब आवेश में भर कर रमा ने झटपट नया लाया गेम लपेट लपाट कर ऊपर अलमारी में डाल दिया। राघव रोये जा रहा था और माधव उसका रोना देख खुद रुआंसा हो रहा था। गिरीश हैरान, परेशान और बौखलाए से, मुंह बाए खड़े थे कुछ समझने की कोशिश कर रहे थे।
बाद में रमा ने समझाते हुए कहा- देखिये इस घर में न मारपीट हिंसा का कोई भी खेल होगा न फिल्म, नाटक ही देखा जाएगा। मैं नहीं चाहती माधव के मन मस्तिष्क पर कोई भी हिंसक प्रभाव पड़े। मैं उसे एक शांतिप्रिय, अहिंसक और विवेकी बच्चा बनाना चाहती हूँ और आप दोनों को मेरा साथ देना होगा।
उस दिन का दिन था कि जैसे अहिंसा का बिगुल बज उठा गिरीश के घर आँगन में। टीवी पर बैटमैन, स्पाइडर मैन या किसी भी मारपीट वाले मैन की फिल्म नहीं देखी जायेगी, ये सख्त हिदायत थी। बच्चे बड़े हो रहे थे और कार्टून देख-देख कर बोर होने लगे थे।  पर रमा उन्हें सिर्फ  खेल जगत, नेशनल ज्योग्राफिक चैनल और कार्टून तक ही सीमित रखना चाहती थी। यहाँ तक कि एक बार जब माधव छोटा था तब रमा ने दूधवाले से भी पूछ लिया था कि जिस गाय का दूध वह माधव को दे रही है वह मरखनी तो नहीं है। दूधवाला चकराया था और फिर हंस कर बोला था, नहीं माँ , एकदम रामजी की गाय है। कई बार इन बातों को लेकर गिरीश रमा की टांग खिंचाई भी करता, पर प्रतिबन्ध उस पर भी थे। वह मारपीट वाली फिल्मों का शौकीन था, पर रात दस बजे के बाद ही यह शौक पूरा करने की इजाजत दी जाती। रमा एक हत्यारे रक्तबीज को किसी भी हालत में अपने माधव के शरीर में पनपने नहीं देना चाहती थी। उसकी निगाह में हॉकी, फुटबॉल भी हिंसक गेम थे, छीन झपट के इन खेलों में कभी भी मारपीट हो सकती थी। इसलिए उनसे दूर रहना ही ठीक था। इतनी इतनी वर्जनाओं के बीच भी बच्चे आज्ञाकारी और सुशील बने हुए थे यह ताज्जुब ही था, वर्ना आजकल के बच्चे तो जरा सी भी रोक टोक सहन नहीं करते। कारण ये कि दोनों भाईयों का किसी भी दोस्त के घर आना जाना नहीं था। वे केवल उनके साथ बाहर मैदान में खेल सकते थे वो भी रमा की आँखों के आगे। क्रिकेट जेंटलमैन गेम कहलाता है इसलिए राघव और माधव को क्रिकेट खेलने कि छूट थी, घर के आँगन में अब सात वर्ष का माधव गेंद फेंकता और राघव उस पर बल्ले से चोट करता।
एक दिन ये खेल मजे में चल रहा था कि कुछ ऊँची आवाजें सुन रमा चौंक पड़ी, उसके कान खड़े हो गए। वो क्या सुन रही थी देखने आँगन में आयी तो पाया कि जब जब माधव गेंद फेंकता, राघव हिट लगा कर चिल्ला उठता वो मारा! रमा जैसे काँप उठी,  राघव के गाल पर एक तमाचा जड़ कर चीखी- किसे मारा, किसे मारेगा तू। राघव बेचारा समझ ही नहीं पा रहा था कि हुआ क्या है? खेल खेलते हुए सभी लोग ऐसे ही तो चिल्लाते हैं, इसमें क्या गलत किया उसने। बारह तेरह साल का राघव उस दिन पहली बार बिना रोये माँ के सामने आ कर खड़ा हो गया? मैंने क्या गलत कहा माँ? आप मुझे क्यों मार रही हैं? वो मारा ही तो कहा था किसी आदमी को या माधव को थोड़े ही मार रहा था। बौल  से चोट लगती है क्या? माधव भी पास आकर खड़ा हुआ और चिल्ला कर बोला वो मारा ! ऐसे ही तो बोला था भैया, उसने किसी को मारा थोड़े ही था? रमा दोनों को अपलक देखती खड़ी थी। शायद वो कुछ ज्यादा ही सशंकित रहती है। उसके मन में एक चोर है जो बार-बार बाहर आ जाता है और वह बच्चों के साथ-साथ उनके पिता पर भी बेकार की कड़ाई बरतती रहती है। पर वह क्या करे, जब-जब वह मरने मारने कि बात सुनती हैं तो एक बेहद कड़ा सा, भावहीन चेहरा उसकी आँखों के आगे झूम जाता है और वह काँप जाती है। पर नहीं उसे निश्चित करना है कि माधव का मन स्वच्छ पानी सा निर्मल रहे उसके रक्त की एक-एक बूँद से मैल का हर कण वह निकाल कर फेंक देना चाहती है। उसने अपने आप को एक इम्तिहान में डाला था तो उसे सर करने का पूरा इंतजाम भी करना होगा ।
रीमा से जब तब उसकी बात हो जाती। कैसा चल रहा है तेरा एक्सपेरिमेंट? वो अक्सर पूछ लेती। रमा झटपट अपनी कारगुजारियां सुनाने लगती। मैंने बहुत दूर रखा है माधव के साथ राघव को भी हिंसा खून खराबे की दुनिया से, वो शान से बताती। रीमा उसे समझाती, तू उस बच्चे को सामान्य जिंदगी जीने दे रमा। इतनी वर्जनाएं उसे विद्रोही न बना दें। हम सभी में विरोध की एक ग्रंथि होती है, बहुत दबाने से वह फूट कर विद्रोह बन सकती है। पर रमा अपने साम्राज्य में खुश थी। माधव की शफ्फाक आँखों में उसे अपनी जीत दिखाई देती थी। जब वो चहक कर गिरीश के सामने माधव की कोई खूबी, उसकी रहमदिली, किसी कुत्ते या जानवर के प्रति प्यार का बखान करती तो लगता वह विजय स्तम्भ पर खड़ी है सबसे दो पायदान ऊपर। वक्त गुजरता रहा। राघव अब कॉलेज का विद्यार्थी और माधव स्कूल में एक अनुशासित और सुसंस्कृत बच्चे के रूप में जाना जाता था। रमा की शंकाएं अब कुछ धुंधली हो चली थीं। उसने एक हिंसक कीट को अपनी योजनाओं के जरिये, पैदा होने के पहले ही खत्म कर दिया था। एनवायरनमेंट ही बच्चे को बनाता या बिगाड़ता है, उसे अब इसमें कोई शक नहीं रहा था। दूर कहीं किसी अँधेरी कोठरी में माधव की माँ अपने खून से रँगे हाथों को मलती अपनी संतान को याद करती होगी क्या? सोचकर रमा घबरा जाती। उस औरत की सोच भी माधव को छू न जाय यही उसकी कोशिश रहती। कई बार उसका मन गर्वित भी हो जाता। कहीं वो औरत मिल जाती तो उसे दिखाती कि देखो तुम्हारे गंदे खून एक कतरा भी माधव के खून में रहने नहीं दिया मैंने। उसे एक नया जन्म देने वाली मैं हूँ मैं।
रविवार का दिन था। सब कुछ मंद गति से चल रहा था। नवम्बर का महीना, हलकी ठण्ड पडऩे लगी थी। नाश्ता करके दोनों भाई क्रिकेट किट लेकर सामने पड़े खुले मैदान की ओर चल पड़े थे। गिरीश लैपटॉप में उलझे बैठे थे और रमा एक स्वेटर की बुनाई ले कर बैठी थी। पुराने गीतों का एक कैसेट हल्के-हल्के मस्ती में बजे जा रहा था। बीच बीच में सामने खेल रहे बच्चों का शोर उन तक पहुँच जाता और फिर शांत हो जाता। अन्दर फोन की घंटी घनघनाई तो रमा दौड़ी। शायद रीमा का फोन हो। एक लम्बी बातचीत के ख्याल से ही वह मुस्कुराई कि तभी बाहर लगा कई आवाजें एक साथ एक दूसरे से होड़ लेती उसे पुकार रहीं हैं। आशंकित हदय लिए वह बाहर की ओर भागी। गिरीश भी लैपटॉप छोड़ बाहर आ खड़े हुए थे। दरवाजे पर दो लडक़े, तार-तार कमीजें और लहूलुहान देह लिए खड़े थे। पीछे लडक़ों की एक टोली थी, हर एक अपनी बात कहने को आतुर। रमा ने देखा आगे-आगे माधव था, हाथ में बल्ला लिए, उसके कपड़ों पर खून के दाग थे। साथ में राघव का हमउम्र एक लडक़ा फटे कपड़े में खून बहाता खड़ा था, राघव कहीं पीछे, अपनी फटी कमीज को छुपाता खड़ा था। रमा की तो जैसे दुनिया ही भरभरा कर ढेर हो गयी, चिल्ला पड़ी, तूने ये किया है माधव, तूने? इतने दिन की मेरी तपस्या का ये फल दिया है मुझे? आखिर क्यूँ मारा तूने इस बेचारे को। यही सिखाया था मैंने तुझे इतने बरस। रमा माधव को तड़ातड़ पीटती जा रही थी, उसकी आँखों से आंसू की धार थमने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं और माधव हक्का-बक्का पिटे जा रहा था। खून में नहाये लडक़े के सिर पर चोट लगी थी। बड़ी मुश्किल से उसने एक हाथ से घाव को दबाया और रमा को रोकने की कोशिश की। रोती आवाज में बोला, आंटी-आंटी, सुनिए तो, माधव ने नहीं मारा मुझे। मेरा झगड़ा तो राघव से हुआ था उसी ने मुझे मारा है। माधव तो अपनी कमीज से मेरा खून पोंछने की कोशिश कर रहा था। वो कुछ आगे कहता कि आगे बढक़र गिरीश ने उसे थाम लिया। रमा को झिडक़ते हुए बोला- जाओ फस्र्टऐड बॉक्स लाओ जल्दी से और इन बच्चों को पानी दो पीने के लिए। रमा संज्ञाशून्य सी खड़ी कभी माधव तो कभी उस लडक़े को देख रही थी। तभी राघव सामने आ कर रो पड़ा। मुझे गुस्सा आ गया था माँ, ये नरेश बेईमानी किये जा रहा था। मुझे बैटिंग नहीं दे रहा था। मैं सह नहीं पाया। मुझे माफ  कर दें। माधव तो मुझे रोक रहा था,  उसने कुछ नहीं किया माँ।
क्या आंसुओं के बीच रमा का चेहरा विजय मुस्कान से जगमगा उठा था। पता नहीं, पर उसने दौड़ कर हक्के-बक्के माधव को गले लगा लिया था। इस जरा से बच्चे ने आज उसकी प्रतिज्ञा की लाज रख ली थी। उसने घाव नहीं दिए थे किसी को, बल्कि घाव पर मरहम रखने की कोशिश की थी और राघव का क्या? अरे वो तो एक नार्मल बच्चा था सभी को कभी न कभी गुस्सा आ ही जाता है। रमा के लिए उसे माफ करना मुश्किल न था। वह फस्र्टऐड बॉक्स लेने अन्दर की ओर मुड़ चली थी। रीमा से कल बात करेगी आराम से। दिल में एक अजीब सुकून महसूस कर रही थी रमा। एक बोझ जो बरसों से दिल पर हावी था, एकबारगी उतर गया लगता था, एक खाली स्लेट पर उसने मनमाफिक इबारत लिखने में कामयाबी पा ली थी। ठ्ठ