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Thursday 23 Nov 2017

संध्या-शूल

चन्द्रकिशोर जायसवाल
  गुरुद्वारा रोड, महबूब खाँ टोला, पूर्णिया - 854301,
मो. 9931018938
पत्नी सावित्री देवी के निधन के पश्चात् मणिशंकर बाबू अब अपनी उस पुरानी जिद पर अड़े रहने लायक नहीं रहे कि उनके लिए पूरी दुनिया में बहादुरगंज से बेहतर कोई जगह है ही नहीं और इसे छोडक़र वे कभी कहीं जायेंगे ही नहीं। हालाँकि अभी भी बहादुरगंज में उनको पहचानने और चाहने वालों में कोई खास कमी नहीं आयी थी, मगर एक पत्नी के मरते ही उन्हें पूरा बहादुरगंज खाली-खाली नजर आने लगा था, और जिस मकान को उन्होंने बड़े शौक से इस तरह बनवाया था कि बुढ़ापे में भी वह एक लाठी का सहारा जैसा बना रहे, वही मकान अब उन्हें काटने लगा था। बेटे और बहू की इस पुरानी जिद पर कि वे अपनी बची-खुची जिन्दगी दिल्ली में उनके पास रहकर गुजारें, वे राजी हो गये। मकान छोडक़र तो गये वे, मगर मकान बेचकर जाना उनसे नहीं हो पाया। उन्होंने बेटे को सुना दिया था, ‘‘बेटा प्रशान्त, इस मकान को बेचने का खयाल कभी तुम्हारी माँ के सपने में भी नहीं आया होगा। यह उसी का मकान है। मैं छोड़ रहा हूँ यह घर, पर मैं कहीं भी रहूँ, वह इस घर को नहीं छोड़ेगी। मेरे जिन्दा रहते तुम कभी इस मकान को बेचने का खयाल मन में नहीं लाना।’’
माँ के निधन की खबर पाकर मणिशंकर बाबू की दोनों बेटियाँ, कमला और विमला, भी आ गयी थीं। उन्हें भी अच्छा लगा था कि पिताजी बहादुरगंज छोडक़र प्रशान्त के साथ दिल्ली में रहेंगे।
दिल्ली जाने की तैयारी में जब मणिशंकर बाबू ने पत्नी का बक्सा खोला, तो उनकी नजर एक हार पर पड़ी। यह वही हार था...
करीब साल भर पहले पत्नी गले का यह हार लेकर उनके पास आयी थी और उनसे कहा था, ‘‘देखिये न, यह हार भी टूट गया है। तीन महीने से टूटा पड़ा है। छूँछा गला अच्छा नहीं लगता। कई लोगों ने टोक दिया है। आप किसी सुनार से इसकी मरम्मत कराकर ला दीजिये।’’
‘‘ठीक है,’’ उन्होंने एक उड़ती निगाह हार पर डाली थी और जवाब दिया था, ‘‘अभी तुम अपने पास ही रखो। मैं किसी दिन बाजार की ओर निकलूँगा, तो हार तुमसे माँग लूँगा।’’
कितनी ही बार बाजार की ओर निकले थे वे, मगर हार माँग लेने की याद एक बार भी नहीं आयी थी।
सावित्री देवी ने अपना मुँह फिर कभी नहीं खोला; अब जब याद आये पति परमेश्वर को...
फिर तो वह बीमार ही पड़ गयी। इस बार बिस्तर पकड़ लिया, ऐसा पकड़ा कि फिर कभी उठी नहीं बिस्तर से; ईश्वर ने उठाया उसे।
हार पर नजर पड़ी, तो उन्होंने अचानक एक झटका महसूस किया। वे इस सोच में पड़ गये कि अब इस हार का क्या करें।
पास से आते-जाते कमला ने गौर किया कि पिताजी बहुत देर से हाथ में कुछ लिये चुपचाप बैठे हुए हैं। वह पूछ बैठी, ‘‘हाथ में क्या है, पापा?’’
पापा चौंके और फिर जवाब दिया, ‘‘तुम्हारी माँ का हार है। टूटा हुआ है। तुम्हारी माँ ने मुझसे कहा था इसकी मरम्मत करा लाने के लिए, मगर मुझे कभी...।’’
‘‘दीजिये मुझे,’’ कमला बोली, ‘‘मैं किसी समय निकलूँगी बाजार; मरम्मत करा लाऊँगी।’’
दोपहर में कमला निकली थी और हार जुड़वा लायी थी। पिता को हार देते हुए उसने कहा था, ‘‘हार की मरम्मत तो मैंने करवा दी, पिताजी, मगर यह हार तो पीतल का है।’’
‘‘क्या!’’ बुरी तरह चौंके थे मणिशंकर बाबू।
हाँ, पापा, पीतल का ही है,’’ कमला ने सुनाया, ‘‘मैंने तीन सुनारों से जँचवा लिया है इसे।’’
एक भूचाल-सा हुआ मणिशंकर बाबू के अन्दर। देर तक कंपन होता रहा।
कमला फिर आयी थी उनके पास और बोली थी, ‘‘पीतल का हार रखकर क्या होगा, पापा! यह हार भी किसी को दे ही देती हूँ।’’
मणिशंकर बाबू किसी तरह कह पाये थे, ‘‘अभी रहने दो मेरे पास ही।’’
बेटी ने अबूझ निगाहों से पिता को देखा और चली गयी।
पत्नी के ढेर सारे सामान, कपड़े-लत्ते, बरतन-बासन तक, मणिशंकर बाबू ने बेटी के सुपुर्द किये थे गरीब-गुरबों में बाँट देने के लिए। तुच्छ हार दिया नहीं गया।
शायद वे इस हार को अब किसी को दे भी नहीं सकते थे। हार अब उनके वश में नहीं रहा; वे हार के वश में हो गये थे।
उस हार ने नागफाँस की तरह जकड़ लिया था उन्हें।
वे हार लिये अपने कमरे में आ गये। कमरे को अन्दर से बन्द कर लिया।
हार अभी भी उनके हाथ में था। हार पर नजरें गड़ी रहीं और उनके दाम्पत्य जीवन के अड़तालीस साल के पन्ने उनकी आँखों के आगे खुलते चले गये...
एक दिन पत्नी ने सूचित किया था उन्हें, ‘‘अब घर में सोने का एक तार भी नहीं बचा है। मैं मायके से जितना लेकर आयी थी, सब बहू और बेटियों में बाँट दिया। आपने तो अपनी कमाई से कभी कुछ खरीदा ही नहीं। अब तो मुझे छूँछा गला ही रहना पड़ेगा।’’
सोना की खरीद पर कभी नरम नहीं पड़े थे मणिशंकर बाबू। इस बार भभक उठे और पत्नी को सुना दिया, ‘‘तुम जान-बूझकर सोना पर क्यों चली आती हो? मुझे चिढ़ाने के लिए? तुम जानती हो, मैं सोना नहीं खरीद सकता। तुम्हारी नजर तीस साल और चालीस साल की कमाई पर है, पर इस पर नजर नहीं जाती कि सोना का एक भी तार खरीदने के लिए मेरे पास पैसे कभी हुए ही नहीं? पैसे बचते ही नहीं सोना खरीदने के लिए। सारे काम तो हो ही रहे हैं; एक सोना नहीं खरीद पा रहा हूँ। तुम्हें पता भी है कि तुम्हारी दवा पर कितने पैसे खर्च हो रहे हैं! तुम्हारी जान देखूँ या सोना? सोना देखूँ या बच्चों का भविष्य? आज के युग में बच्चों की पढ़ाई का खर्च मालूम है तुम्हें? कुछ पैसे भविष्य निधि में जमा हो रहे हैं, कुछ जीवन बीमा में; इन्हें भी खाली कर दूँ? सब अभी ही चाट-पोंछकर खा जाओगी? बाल-बच्चों के लिए कुछ बचाओगी नहीं? बिना सोना के घर अशुभ है, तो रहने दो। मैं कंगला हूँ, तो कंगला ही सही। जब समय आयेगा और मैं सोना खरीदने लायक हो जाऊँगा, तो खरीद दूँगा सोना। अभी मैं सोना खरीदने लायक नहीं हूँ।’’
उसके बाद पत्नी ने कभी नहीं पूछा, ‘‘अब समय आया है या नहीं? अभी भी सोना, एक तार सोना, एक टुकड़ा सोना, खरीदने लायक आप हुए हैं या नहीं?’’
बहुत दिनों तक उसका गला छूँछा ही रहा, मगर एक दिन एक हार लटक ही गया उसके गले से। मणिशंकर बाबू ने चोर निगाहों से देखा था पत्नी के गले में लटकते इस नये हार को, मगर उससे कुछ कहा नहीं। वे मन ही मन बुदबुदाकर रह गये थे, ‘‘औरत जात!’’
तब उन्होंने नहीं जाना था, यह सोना का नहीं पीतल का हार था।
 एक तार सोना...!
अब वे बेचैन हो रहे थे...कोई आसमान का चाँद नहीं माँग रही थी वह; एक तार सोना ही तो माँग रही थी!
बैंक के खाते में चार लाख से ऊपर जमा थे। ये पैसे अब उन्हें काट रहे थे। सोने के कितने ही तार थे इस राशि में। एक तार भी नसीब होने नहीं दिया पत्नी को उन्होंने। अब क्या होगा?
 पत्नी ने कभी नहीं जाना कि बैंक में उनके कितने पैसे हैं। मणिशंकर बाबू ने कभी नहीं बताया कि उन्हें कितना वेतन या कितनी पेंशन मिलती है। जो पति ने कहा, उसे सच मान लिया सावित्री देवी ने। मगर क्या उसने कभी यह विश्वास किया होगा कि पिछले चालीस-पैंतालीस सालों में उसके पति के पास कभी एक तार सोना खरीदने के पैसे नहीं हुए होंगे?
पत्नी ने अवश्य उन्हें एक क्रूर पति मान लिया होगा। जब कभी सोना की बात उठायी उसने, उसे दुत्कारा ही गया।
एक दिन केसरी जी की पत्नी उनके घर आयी थी। सोने से लदी थी वह। उसके जाने के बाद मणिशंकर बाबू से उनकी पत्नी बोली, ‘‘बीस भर से कम सोना नहीं होगा उसकी देह पर।’’
‘‘वह सब दिखावा है; वह अपना सोना हमें दिखाने आयी थी। किसी दिन खाली देह यह कहने आयेगी कि डाकू सारा सोना लूटकर ले गये। मैं तो चाहता हूँ कि ऐसा जल्दी ही हो।’’
‘‘जो दौलत कमाता है, वह उसकी रक्षा का भी इन्तजाम कर लेता है। इतने लोग सोना खरीद रहे हैं या नहीं? आप तो चाहते हैं कि जैसे अपना घर खाली है, वैसे सबके घर खाली रहें। दुनिया आपकी सोच से नहीं चलती है।’’
‘‘मेरा घर तो मेरी ही सोच से चलेगा?’’
उनका घर उनकी ही सोच से चलेगा, तो फिर आज क्यों किसी और सोच में पड़े हुए हैं वे?
धनतेरस के दिन उनके घर भी सोना-चाँदी की तो नहीं, मगर बरतन-बासन की खरीद होती थी। वे खुद बाजार जाते और किसी साल दो चम्मच, कभी एक छिपली और कभी चिमटा-चिमटी खरीद लाते। रोज अखबार पढऩे वाले मणिशंकर बाबू अखबार में छपी ‘अद्भुत खबरें’ जैसे एक औरत ने तीन बच्चे जने या पीपल गाछ की जड़ से पानी का सोता फूटा और उस पवित्र जल को लेने के लिए पूरा शहर टूट पड़ा या एक बुढिय़ा एक सौ सात साल की उम्र में मरी, अपनी पत्नी को पढक़र सुनाया करते थे, मगर कभी भी उन्होंने यह अद्भुत खबर नहीं सुनायी कि इस दिवाली में सोने-चाँदी की खरीद पिछली दिवाली से भी दुगनी हुई या गहनों की दुकानों में खरीदारों की भीड़ देखते नहीं बनती थी। वे पत्नी के मुख से सोना-वंदना सुनना नहीं चाहते थे।
एक बार पत्नी ही मोहल्ले की खबर लेकर आ गयी। जिन तीन-चार परिचित औरतों ने सोना खरीदा था, उनके बारे में सुनाने के बाद वह बोली, ‘‘गगन मिश्रा के घर तो पचास हजार के गहने की खरीद हुई है।’’
‘‘घर में रखने के लिए जो इतने गहने खरीदता है, मैं उसे कमअक्ल मानता हूँ।’’
‘‘पूरी दुनिया कमअक्ल है! एक आप अक्लमंद हैं।’’
मणिशंकर बाबू को अच्छा नहीं लगा कि पत्नी उनकी अक्ल पर खराब टिप्पणी करे। उन्होंने सुनाया, ‘‘अक्ल की बात यह होती कि वे उस पैसे को बैंक में रख देते। वही पैसा आठ-दस साल में दुगना हो जाता। इस सोने का क्या होगा? यह जान लो कि पचास हजार के गहने उनके घर आते ही पचीस हजार के हो गये। कभी कोई गहना सुनार के पास बेचने जाओ, तब पता चल जायेगा असली हाल। मैं बहुत किस्से सुन चुका हूँ। सोचकर बेचने जाओगी कि दस हजार से कम नहीं मिलेंगे और दुकानदार सुनायेगा कि वह दो हजार से अधिक नहीं दे सकता। मैं एक बड़े सुनार के मुँह से सुन चुका हूँ कि छह बार गहने बदलो तो फिर उनकी कोई कीमत नहीं रह जाती।’’
‘‘मैं आपसे मुँहचुथौवल नहीं करती,’’ पत्नी बोली, ‘‘मगर मैं जानती हूँ कि गहने की कीमत आधी-चौथाई हो जाये, लोग तब भी खरीदते हैं सोना; डाकू लूटकर ले जायें, तब भी खरीदते हैं सोना। लोग इज्जत पाने के लिए भी सोना खरीदते हैैं।’’
‘‘मैं एक प्रोफेसर हूँ और इज्जत के लिए मुझे सोना खरीदने की जरूरत नहीं है। मिश्राइन के ढोल पीटने से कि उसके घर दिवाली में पचास हजार के गहने आये हैं, गगन मिश्रा को इज्जत नहीं मिल जायेगी मोहल्ले में। सबको पता है कि उसके घर पैसे कहाँ से आते हैं। उसके दोनों बेटे जेल काटकर आये हैं। बड़े बेटे को पुलिस ने घर से उठाया था और मोहल्ले वालों की नजर के सामने उसे डंडा मारते हुए ले गये थे। मेरे सामने गगन मिश्रा की क्या इज्जत? वह चोर-डाकू, गाँजा-अफीम बेचने वाला; मैं एक प्रोफेसर।’’
‘‘अपने मन से तो आप इज्जतदार, मगर किसी और के मन से?’’ सुनाया पत्नी ने, ‘‘मैं मोहल्ले में किसी के घर शादी-ब्याह में जाती हूँ, तब मुझे एहसास हो जाता है कि आपकी मोहल्ले में कितनी इज्जत है। वहाँ औरतों की देह पर गहने लदे होते हैं। मैं उनके बीच सबसे अलग दिख जाती हूँ। मौसी की छोटी बेटी वसुधा की शादी में गयी थी, तो रोना आ गया था मुझे। मौसी ने मुझसे कहा, ‘इस वेश में जाओगी दुलहा का परछन करने!’ वह एक सेट गहने लेकर आयी और मुझसे कहा, ‘इन्हें पहन लो।’ आने के एक दिन पहले भी मुझसे कहा, ‘तुम्हारा दुलहा कमाता तो है; फिर क्या करता है पैसों का? तुम कभी ठीक से लड़ती-झगड़ती नहीं हो उसके साथ?’ बोलिये, क्या जवाब देती मैं उन्हें? अब तो किसी के घर शादी-ब्याह या उत्सव में जाना तक बन्द कर दिया है मैंने। जाऊँ और कहाऊँ कंगला की बीवी! कंगला की कोई इज्जत है क्या!’’
मोहल्ले में मणिशंकर बाबू का घर किसी कंगले का घर नहीं कहा जा सकता था। यों भी एक प्रोफेसर का घर किसी कंगले का घर हो सकता है क्या? जिस घर में सोफा हो, पलंग हो, आलमारियाँ हों, फ्रिज हो, इनवर्टर हो, कम्प्यूटर हो, उसे कंगला का घर नहीं कहा जा सकता? एक सोना नहीं हुआ घर में, तो घर कंगला का हो गया?
मोहल्ले की औरतों ने न भी माना हो, मगर सावित्री देवी खुद को एक कंगला की बीवी ही मान रही थी। पति का कभी वह रूप देखा ही नहीं जिसमें वह पैसे वाला दिखे।
यह तो नहीं कहा जा सकता कि बाप ने बेटी को कुएँ में धकेल दिया था। जब सावित्री देवी पति के घर आयी थी, तब ऐसा नहीं लगा था कि उसका ब्याह किसी कंगले के साथ हो गया है। तो क्या शादी के बाद घर में कंगाली घुस गयी? हाय राम, किसी दिन इस मर्द के मन में यह बात बैठ नहीं जाये कि उसकी पत्नी के पैर शुभ नहीं हैं; कि घर में लक्ष्मी नहीं आयी; कि, हाय राम, दलिद्दरी आ गयी है।
पत्नी कई घरों में सोफा देखकर आयी थी और पति से कहा था, ‘‘हमारे घर में भी एक सोफा होना चाहिये।’’
‘‘सोफा? वह किसलिए?’’
‘‘सबके घर में तो है, भगत जी के घर में, शर्मा जी के घर में, साह जी के घर में। वे भी तो आपकी तरह प्रोफेसर ही हैं। वे लोग हमारे घर आते होंगे, तो क्या सोचते होंगे! सोचते होंगे, किसी सूम का घर है। अब तो मुझे भी अपना यह घर अच्छा नहीं लगता, बहुत खाली-खाली लगता है।’’
‘‘हम दूसरों की बराबरी नहीं कर सकते, सावित्री। साह जी या शर्मा जी ने प्रोफेसरी की कमाई से नहीं सजाया है अपने घर को। उन्हें बाप-दादा की थैली मिली है। मुझे क्या मिला है अपने घर से? गाँव की जमीन बेचकर यहाँ किसी तरह घर बना लिया है; बस, इतना भर। ऐसा नहीं है कि एक सोफा खरीदने का खयाल मेरे मन में कभी नहीं आया है। पिछले दो साल से सोफा खरीदने का खयाल आता रहा है। पैसे का जुगाड़ ही नहीं कर पा रहा हूँ। मगर...अब तुम्हारे मन में भी यह बात आ गयी है, तो कुछ करता हूँ। दफ्तर से कर्ज मिल जायेगा; ले लेता हूँ।’’
फ्रिज खरीदने की इच्छा जाहिर की थी पत्नी ने, तो पति ने सुनाया था, ‘‘फ्रिज! तुम्हें मालूम भी है कि फ्रिज की क्या कीमत होती है? है जरूरी चीज, हर घर की जरूरत है, मगर...ठीक है, देखता हूँ। किस्त पर मिलती है फ्रिज, यह तो पता है मुझे, मगर यह नहीं जान रहा हूँ कि किस्त की रकम कितनी होगी और कब तक भरनी होगी किस्त। दो-तीन साल तो लग ही जायेंगे। करता हूँ पता; देख लेता हूँ किस्त चुका पाऊँगा या नहीं।’’
एक बार घर के रंग-रोगन तक पर त्राहिमाम् कर उठे थे मणिशंकर बाबू। पत्नी ने पति को सुनाया था, ‘‘दिवाली के पहले हमें भी घर का पुचारा करवा लेना है। मैंने रंगसाज से बात कर ली है।’’
‘‘कितने पैसे लगेंगे?’’
‘‘करीब तीन हजार।’’
‘‘तीन हजार? पुचारे में तीन हजार?’’  
‘‘शर्मा जी ने अपने घर में रंग करवाया है। आप देख आइयेगा। बड़ा अच्छा लगता है। उन्हीं के रंगसाज से मैंने बात कर ली है। अभी वह कहीं और काम कर रहा है। तीन-चार दिनों के बाद हमारे पास आयेगा।’’
‘‘तीन हजार का खर्च है, तो कम-से-कम तीन महीने पहले बता देना था। अब अचानक तीन हजार कहाँ से लाऊँ मैं?...बुला लिया है, तब तो काम कराना ही होगा। लगता है, मुझे कर्ज से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी।’’
विदा होने के एक दिन पहले उनके पुराने मित्र दयानाथ जी उनके पास आये थे और उनसे कहा था, ‘‘मणि जी, आपको बहुत उदास देख रहा हूँ। आपको इतना उदास नहीं होना चाहिये। यह तो अच्छा नहीं हुआ कि इस उम्र में आपको छोडक़र चली गयीं वे, मगर आपको इस बात का संतोष और सुख होना चाहिये कि अपने सारे शौक पूरा कर मरी हैं वे।’’
सारे शौक पूरा कर!...मणिशंकर जी ने मित्र की यह बात सुनी और गहरी निगाहों से उन्हें देखा, उनकी आँखों में खुफिया निगाहों से झाँका...मित्र उनका कोई राज जान तो नहीं गया है?...सारे शौक पूरा कर!
सोना का शौक भी? एक तार सोना का शौक?
सावित्राी के साथ बिताये दिन, माह, बरस में झाँकने लगे मणिशंकर बाबू...
जिसे पति महज सोना समझ रहा था, वह क्या पत्नी की नजरों में भी सिर्फ  सोना ही था?
नहीं, ऐसा नहीं था।
अब जाकर उन्हें ज्ञान हो रहा है कि मोल सोना का नहीं है, मोल उस प्यार का है जिसे पत्नी उस सोना में महसूस करती है। गहने में पति का जीवित प्यार होता है, पति के प्यार की धडक़नें होती हैं। मणिशंकर बाबू अपने दिल को टटोलने लगे। उन्हें अपनी पत्नी सावित्री देवी से प्रेम तो था, अगाध प्रेम था, पर पत्नी ने कभी जाना ही नहीं कि उसका पति उसे प्यार भी करता है। उसने मान लिया होगा कि वह घर की दाई है, उससें अधिक कुछ नहीं।
जिस पति ने उससे कभी प्यार ही नहीं किया, उसके साथ अब अगले जन्मों का बन्धन ही क्यों?
अब आज उनकी समझ में आ रहा है कि कब क्या कहा था सावित्री ने और वैसा क्यों कहा था।
करवाचौथ व्रत छोड़े अब तो कई साल हो गये थे। पत्नी ने पति को सूचित कर दिया था, ‘‘अब मैं शरीर से लाचार हो गयी हूँ; अब कोई व्रत-उपवास मुझसे पार नहीं लगेगा। इस साल से करवाचौथ छोड़ रही हूँ मैं।’’
जिउतिया व्रत नहीं छोड़ा था उसने, अन्त-अन्त तक अपने बाल-बच्चों की रक्षा के लिए यह व्रत करती रही। बस, पति को एक किनारे कर दिया था उसने। मणिशंकर बाबू के हृदय में हाहाकार मच गया था।
विवाह के पचास साल पूरे होने पर रमेन्द्र बाबू ने शादी की स्वर्ण जयंती मनायी थी। बहुत भव्य आयोजन किया था उन्होंने। बैंड-बाजा, नाच-गान, भोज-भात...
मणिशंकर बाबू पत्नी के साथ उसे भोज में शरीक हुए थे। घर आकर उन्होंने पत्नी को सुनाया था, ‘‘पति-पत्नी का पचास वर्षों का साथ एक बड़ी बात है, प्रतिमा। कितने खुश दिख रहे थे वे दोनों, जैसे कि इस खुशी से बढक़र और कोई खुशी हो ही नहीं सकती। यह खुशनसीबी हमें भी मयस्सर होगी, सावित्री; अब केवल तीन साल बाकी हैं हमारे पचास में। हम भी मनायेंगे स्वर्ण जयंती, कुछ वैसा ही आयोजन करेंगे जैसा आज हम देखकर आये हैं।’’
अब उन्हें याद आ रहा है कि उस दिन वे अकेले ही खुश हो रहे थे पचास साल की बात पर। सहचरी के चेहरे पर कोई खुशी छलकी नहीं थी।
शायद उस समय ही उसने सोच लिया हो कि इस पचासवें साल को वह अपने जीवन में आने नहीं देगी।
अपने दाम्पत्य जीवन में कभी उसे पति के प्यार का एहसास हुआ ही नहीं। अब तो मणिशंकर बाबू को खुद भी यह सन्देह होने लगा है कि क्या शादी के पचास साल पूरे हो जाने पर वे भी रमेन्द्र बाबू की तरह शादी की स्वर्ण जयंती मनाते? बहुत भव्य आयोजन करते? बैंड-बाजा, नाच-गान, भोज-भात...?
सावित्री ने कभी नहीं जाना कि उसका पति भी उसे प्यार करता है।
शायद यही सच था कि उन्होंने कभी पत्नी को प्यार किया ही नहीं। हमेशा तो झूठ सुनाते रहे थे वे पत्नी को।
पाँच साल गुजर गये पत्नी को गुजरे हुए। अब भी वह हार उन्हें शूल की तरह चुभता रहता है। वे जूझते रहते हैं इस प्रश्न से ‘‘क्या कभी उन्होंने पत्नी को प्यार किया था?’’ अब तो स्पष्ट उत्तर मिलता है कि उन्होंने कभी प्यार किया ही नहीं था। प्रमाण उपस्थित हो जाता है उनके सामने; पत्नी से अलग हुए पाँच साल हो गये और वे अभी भी जिन्दा हैं!