Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

रात का आखिरी बिगुल भी बज गया

स्व. सतीश चौबे
रात का आखिरी बिगुल भी बज गया
लो, वहां शिविर में।

बैरक वे चुप-चुप कैसे रह गए हैं
अभी जो गूंजते थे
कजलियां, ढोला और
देश के दर्द-भरे गीतों से
मिलिटरी हास्पिटल की
बुझ गई है मद्धम नीली रोशनी
और जनरल वार्ड
गूंजने लगा आहों से-कराहों से
केलो तक जाती
गांव के सीने से गुजरती
पीली पगडंडी हो गई वीरान-वीरान
वहां वे सैनिकों की कैन्टीन के कपाट
भेड़ दिए गए लो बड़ी सुबह तक के लिए
पर, तभी खेतों में
बीच-बीच में ऊगे
इमली के दरख्तों पर के
पीले खट-मिट्ठे फूल
लगे हैं फिर रह-रह कर
सताने, नशा लाने।
ऐसी ही होती है, हमेशा ही
खेतों, दरख्तों से घिरे बैरकों में
गर्मी की शुरू-शुरू की रात।
(कविता संग्रह रोशन हाथों की दस्तकें से)