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Sunday 19 Nov 2017

मुक्तिबोध

 

मुक्तिबोध
सन्ध्या की नीलाई में खोये हुए अलसाये
कुहरीले खेतों में
जुआर की रोटी से महकते धुएं में गरमाये गांवों में
तैरता है भव्याकार नील-श्याम मेघ- खण्ड-
छाती में जिसकी तडि़त् की धुकधुकी
में कांैधते हैं विश्व स्वप्न
और काल-भेरी सा धडक़ता वक्ष है
कि जिसकी प्रतिध्वनि सुन
अकुलाई आंखों में विराट-सा चित्र एक
समाता है अकस्मात-
चारों-ओर चारों-छोर
गोल-गोल दिखलाती घूम जाती पृथ्वी यों कि
आंखों के सामने ही तैर जाती जनता की झांकी और
शैतानों की तस्वीर
केवल जिसे देख ही
दानवी शक्तियों के विरुद्ध अधीर हो
लपकती है प्राणों की दमकती शमशीर
नीली-नीली तडि़त-सी खिंचती है प्राणों की बांकभरी करवाल
लपकती है युद्धोत्सुक तड़पी हुई पीर

फूटे हुए घरों और ढही हुई मेहराबों के
धंसे हुुए पुलों पार
झुलसे हुए खेतों, गांवों, मैदानों के आर-पार
दहकती धूप भरे सुनहले प्रसार में से
आती है झनकार, उभरती है झनकार।
गूंजती है घावों भरी,
जीवनानुभवों भरी जिंदगी की झनकार
मानो कि कहीं दूर-
सूखे हुए झरनों के भूखे कूल किनारों पर
खड़े हुए बड़े-बूढ़े
बुजुर्ग दरख्तों की घनी-घनी छाँहों में
लेटे हुए छापेमार दस्तों के कोई शूर
कोई वीर बहादुर
भरे-भरे गले से छेड़ते हैं कष्टग्रस्त
युद्धग्रस्त वतन की कोई गीली-गीली धुन
गहरी याद लिए हुए
कोई दर्दभरा गीत
जिसमें कि कांपती है माँओं की पिताओं की
तड़पती हुई प्रीत
बहते हुए पसीने की ढुलते हुए लहू की
आपस में मिलती हुई धार के मर्म-गीत
ज्ञान के, क्रांति के, मुक्ति के कर्म गीत
वृक्षों की छाँहों से पहाड़ों की खोहों से उठती है झनकार।
गाता है युद्धग्रस्त वतन का पहरेदार
आंखों में अश्रु भरे
गहरी याद करते हुए
स्वदेश की आत्मा से करता है फरियाद
धैर्य की, शक्ति की
पुत्रों की भुजाओं में, धडक़ते वक्ष में
मानव-भविष्य में आस्था की प्रीत की
मुक्ति की, जीत की।