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Wednesday 22 Nov 2017

नीरज

नीरज
मैं सोच रहा हूं अगर तीसरा युद्ध छिड़ा
इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा?
मैं सोच रहा हूं गऱ ज़मीन पर उगा खून
मासूम हलों की चहल-पहल का क्या होगा?

मैनाओं की नटखटी,  ढिठाई तोतों की
यह शोर मोर का, भौंर भृंग की यह गुनगुन
बिजली की कडक़, तडक़, बदली की चटक मटक
यह जोत जुगनुओं की, यह झींगुर की झुनझुन।

आल्हा की यह ललकार, थाप यह ढोलक की
सूर, मीरा की सीख, कबीरा की बानी
पनघट पर चपल गगरियों की यह छेड़छाड़
राधा की कान्हा से गुपचुप आनाकानी।

क्या इन सब पर खामोशी मौत बिछा देगी
क्या धुंध-धुंआ बनकर सब जग रह जाएगा?
क्या कूकेगी कोयलिया कभी न बगिया में
क्या पपिहा फिर न पिया को पास बुलायेगा?