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Monday 20 Nov 2017

ईरानी तुलबा के नाम (जो अम्न और आजादी की जद्दो-जहद में काम आये)


फैज अहमद फैज
यह कौन सखी हैं
जिनके लहू की अशरफियां छन्-छन्, छन्-छन्
धरती की पैहम प्यासी
कशकोल में ढलती जाती है
कशकोल को भरती जाती है।

ये कौन जवां है, अर्जे-अजम
ये लखलुट
जिनके जिस्मों की
भरपूर जवानी का कुन्दन
यूं खाक में रेजा -रेजा  है
यूं कूचा-कूचा बिखरा है
ऐ अर्जे-अजम, ऐ अर्जे-अजम
क्यों नोच के हंस-हंस फेंक दिये
इन आंखों ने अपने नीलम
इन होंठो ने अपने मर्जां
इन हाथों की बेकल चांदी
किस काम आयी, किस हाथ लगी?

ऐ पूछनेवाले परदेसी
ये तिफ्लो-जवां
उस नूर के नौरस मोती है
उस आग की कच्ची कलियां हैं
जिस मीठे नूर और कड़वी आग से
जुल्म की अंधी रात में फूटा
सुब्हे-बगावत का गुलशन
और सुब्ह हुई मन-मन, तन-तन!

इन जिस्मों का चांदी-सोना
इन चेहरों के नीलम-मर्जां
जगमग, जगमग, रख्शां-रख्शां
जो देखना चाहे परदेसी
पास आये देखे जी भर कर
यह जीस्त की रानी का झूमर
यह अम्न की देवी का कंगन!
पैहम- लगातार, कश्कोल- कटोरा,
अरज़े-अज़म- ईरानी धरती, मरजाँ-
मूँगे, तिफ्ल- बच्चे, नौरस - नये,
रख़्शां-दमकता हुआ,जीसत - जिन्दगी)