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Sunday 27 May 2018

धनुष पर चिडिय़ा


धनुष पर बैठी चिडिय़ा को वह देखती है पहली बार
दीवार पर लटका धनुष उसे नागवार लगता था
हमेशा एक हिंसक स्मृति की तरह
गलत जगह और समय में टंगा हुआ बेबात

पर अभी इस पीली रोशनी में
उसे नहीं लगा चिडिय़ा बाण की तरह छूटकर
फिर जा टकराएगी या टपक पड़ेगी लहूलुहान
पके फल की तरह धनुष के इस खतरनाक पेड़ से

चिडिय़ा धनुष से नहीं उसके देखने से आतंकित है
जबकि वह चिडिय़ा के कारण पुलकित धनुष से आज
उसने उससे जो बेखबर इस वाकये को पढ़ रहा था
कहा आहिस्ते, देखी तुमने चिडिय़ा धनुष पर
वह देखता रहा चिडिय़ा को धनुष समेत
फिर अपने समेत उसे देखकर बोला
तुम भी तो चिडिय़ा हो मेरी इसी तरह
अब वह चिडिय़ा को नहीं धनुष को देख रही थी
उस पढ़ते हुए की तरह
और सुन रही थी प्रत्यंचा को
उसमें अपनी गंध के साथ।