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Wednesday 22 Nov 2017

मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा

 

 
चंद्रकांत देवताले
मैं मरने से नहीं डरता हूं
न बेवजह मरने की चाहत संजोए रखता हूं
एक जासूस अपनी तहकीकात बखूबी करे
यही उसकी नियामत है


किराये की दुनिया और उधार के समय की
कैंची से आज़ाद हूं पूरी तरह
मुग्ध नहीं करना चाहता किसी को
मेरे आड़े नहीं आ सकती सस्ती और सतही मुस्कुराहटें

मैं वेश्याओं की इज्जत कर सकता हूं
पर सम्मानितों की वेश्याओं जैसी हरकतें देख
भडक़ उठता हूं पिकासो के सांड की तरह
मैं बीस बार विस्थापित हुआ हूं
और ज़ख्मों की भाषा और उनके गूंगेपन को
अच्छी तरह समझता हूं
उन फीतों को मैं कूड़ेदान में फेंक चुका हूं
जिनमें भद्र लोग जिंदगी और कविता की नापजोख करते हैं
मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा
कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नही छोड़ा
और मैंने उन लोगों पर यकीन कभी नहीं किया
जो घृणित युद्ध में शामिल हैं
और सुभाषितों से रौंद रहे हैं
अजन्मी और नन्ही खुशियों को

मेरी यही कोशिश रही
पत्थरों की तरह हवा में टकराएं मेरे शब्द
और बीमार की डूबती नब्ज़ को थामकर
ताज़ा पत्तियों की सांस बन जाएं
मैं अच्छी तरह जानता हूं
तीन बांस चार आदमी और मु_ी भर आग
बहुत होगी अंतिम अभिषेक के लिए
इसीलिये न तो मैं मरने से डरता हूं
न बेवजह शहीद होने का सपना देखता हूं

ऐसे जिंदा रहने से नफरत है मुझे
जिसमें हर कोई आए और मुझे अच्छा कहे
मैं हर किसी की तारीफ  करता भटकता रहूं
मेरे दुश्मन न हों
और इसे मैं अपने हक़ में बड़ी बात मानूं