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Saturday 18 Nov 2017

बीती सदी में दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिकाएं दुनिया ने देखी हैं, जिनमें न केवल देश बर्बाद हुए बल्कि पीढिय़ों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया।

युद्धविरोधी कविताएं
बीती सदी में दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिकाएं दुनिया ने देखी हैं, जिनमें न केवल देश बर्बाद हुए बल्कि पीढिय़ों के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया। हम कैसी दुनिया चाहते हैं, यह इस वक्त का सबसे कठिन सवाल बन गया है और विश्वशांति सबसे बड़ा सपना। यह विडंबना ही है कि दो विश्वयुद्धों और अनेक छोटे-बड़े युद्धों की त्रासदियों को देखने-अनुभूत करने के बावजूद लड़ाइयों को खत्म करने, बातचीत से विवादों का हल निकालने और भावी पीढिय़ों के लिए शांति भरी दुनिया छोड़ जाने के प्रयास नहींहो रहे हैं या अगर हो भी रहे हैं तो बहुत छोटे स्तर पर। बड़े स्तर पर तो केवल हथियार बन रहे हैं, बिक रहे हैं, रक्षा सौदे हो रहे हैं, गरज यह कि सारा खेल जनता के पैसों पर खेला जा रहा है। एक ओर उसे विश्वशांति का ख्वाब दिखाया जा रहा है, दूसरी ओर शत्रु को तहस-नहस करने के लिए उकसाया जा रहा है। दुनिया के कई देश इस वक्त किसी न किसी तरह के युद्ध में उलझे हुए हैं। कहींविचारधाराओं में मतभेद को स्थान न मिलने के कारण गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है, कहींसत्ता पलटने की साजिशों के कारण लड़ाई हो रही है, किसी देश के प्राकृतिक संसाधन उसके लिए अभिशाप की तरह हो गए हैं तो किसी देश में धर्म के नाम पर लड़ाई छिड़ी हुई है। भारत में ही इस वर्ष के प्रारंभ से पाकिस्तान के साथ संबंधों में तनाव बढऩा जो प्रारंभ हुआ तो इस वक्त युद्ध जैसे हालात बन चुके हैं। सीमा पर रोज ही हमारे जवान या तो शहीद हो रहे हैं या घायल हो रहे हैं। पाकिस्तान की ओर से युद्धविराम का उल्लंघन हो रहा है, हमारी ओर से सर्जिकल स्ट्राइक पर सरकार अपना गुणगान करते नहींथक रही। लेकिन इसका अंत कहां जाकर होगा? क्या भारत-पाकिस्तान एक और युद्ध के लिए तैयार हैं? पिछले युद्धों में जिन समस्याओं का हल नहींनिकल पाया, क्या एक और युद्ध से वे सारी मुश्किलें दूर हो जाएंगी? युद्ध की कीमत कौन चुकाएगा? मान लो अगर परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हुआ, तो क्या हम फिर से पीढिय़ों को खत्म होते देखने, अपाहिज पैदा होते देखने का खतरा उठाने तैयार हैं? प्रश्न कई हैं, जवाब वे लोग देना नहींचाहते, जो जवाबदेह हैं, उन्हें बस वीररस की बातें अच्छी लगती हैं। लेकिन साहित्य में शांति के लिए पर्याप्त स्थान है। देश-विदेश के अनेक कवियों ने युद्ध विरोधी और शांति की पक्षधर कविताएं लिखी हैं, जिनकी एक बानगी इस विशेषांक में पाठक देख सकते हैं। उम्मीद है, इस युद्धकाल में शांति की यह पुकार सुनी जाएगी।
संपादक

जे युद्धे भाई के मारे भाई

रवीन्द्रनाथ ठाकुर


जे युद्धे भाई के मारे भाई
से लड़ाई ईश्वरेर विरुद्धे लड़ाई ।
जे कर धर्मेर नामे विद्वेष संचित ,
ईश्वर के अर्घ्य हते से करे वंचित ।
जे आंधारे भाई के देखते नाहि भाय
से आंधारे अंध नाहि देखे आपनाय ।
ईश्वरेर हास्यमुख देखिबारे पाइ
जे आलोके भाई के देखिते पाय भाई ।
ईश्वर प्रणामे तबे हाथ जोड़ हय ,
जखन भाइयेर प्रेमे विलार हृदय ।

मूल बांग्ला से हिन्दी अनुवाद : मोहनदास करमचंद गांधी
वह लड़ाई ईश्वर के खिलाफ लड़ाई है ,
जिसमें भाई भाई को मारता है ।
जो धर्म के नाम पर दुश्मनी पालता है ,
वह भगवान को अर्ध्य से वंचित करता है ।
जिस अंधेरे में भाई भाई को नहीं देख सकता ,
उस अंधेरे का अंधा तो
स्वयं अपने को नहीं देखता ।
जिस उजाले में भाई भाई को देख सकता है ,
उसमें ही ईश्वर का हँसता हुआ
चेहरा दिखाई पड़ सकता है ।
जब भाई के प्रेम में दिल भीग जाता है ,
तब अपने आप ईश्वर को
प्रणाम करने के लिए हाथ जुड़ जाते हैं ।
स्रोत : हरिजन सेवक, 2 नवंबर 1947
अनुवाद की तारीख , 23 अक्टूबर 1947