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Tuesday 21 Nov 2017

क्लॉड ईथरली

मुक्तिबोध के अधिकांश पाठकों की तरह मुझे भी, तत्काल याद आने वाली इनामी कहानी है- क्लॉड ईथरली’। यूं मुझे 'मैत्री की मांग' और 'जिंदगी की कतरन’ कहानियां भी अत्यंत महत्वपूर्ण कहानियां लगती हैं लेकिन 'क्लॉड ईथरली’ हिन्दी की अपने ढंग की अनोखी कहानी है। भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण कहानियों में इसे शुमार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जिस तरह 'अंधेरे में’ उनके काव्य संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं उसी तरह क्लॉड ईथरली कहानी उनकी विचारधारा को व्यक्त करती है। दरअसल उनकी प्रतिनिधि रचनाएं चाहे कविताएं हो या कहानियां- आपस में मिलकर एक ऐसा संसार रचती हैं जिसमें उनके काल के मनुष्य की बाह्य परिस्थितियां और उसका अंतर्मन प्रतिबिंबित होता है। वे रचनाएं एक महाकाव्य के विभिन्न सर्गों जैसी हैं। मुक्तिबोध पूंजीवादी व्यवस्था में में जकड़े सामान्य नागरिक की छटपहटाहट, नियति, संघर्ष और मुक्ति के स्वप्न के हिलोरे हैं। समाज की ऊपरी परत के नीचे गतिशील शक्ति धाराओं और व्यक्ति के अंतर्मन में उठते विचारों के द्वंद्व तथा उससे उत्पन्न चिंगारियों की पड़ताल उनके रचनाकर्म का हेतु है। मनुष्य की बेचैनी और मुक्ति की आतुरता का जैसा चित्रण मुक्तिबोध करते हैं वैसा हमारे साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।

क्लॉड ईथरली कहानी पूंजीवादी सभ्यता के दुष्परिणाम युद्घोन्माद और उसके विरुद्घ उठने वाली मानवता की आत्मा को रेखांकित करने वाली प्रतीकात्मक कहानी है। द्वितीय विश्वयुद्घ में अमरीका द्वारा जापान पर एटमबम से किया गया आक्रमण मानवता पर किया गया कुत्सित हमला था। उसके उपरांत सभ्यता संस्कृति पर व्यावसायीकरण उसका अदृश्य अस्त्र है जो दुनिया के देशों पर प्रक्षेपित किया जा रहा है। इसे हमें स्वीकार करना चाहिए कि अमरीकी प्रभाव को हमारी व्यवस्था ने स्वयं ही चुना है। कहानी का एक पात्र कथानायक से कहता है 'भारत के हर बड़े नगर में एक-एक अमरीका है। तुमने लाल ओंठवाली चमकदार गोरी, सुनहरी औरतें नहीं देखी, उनके कीमती कपड़े नहीं देखे, शानदार मोटरों में घूमने वाले अति शिक्षित लोग नहीं देखे? नफीस किस्म की वेश्यावृत्ति नहीं देखी? सेमीनार नहीं देखे? एक जमाने में हम लंदन जाते थे और इंग्लैंड रिटर्न कहलाते थे और आज वाशिंगटन जाते हैं। अगर हमारा बस चले और आज हम उतने ही धनी हों और हमारे पास इतने ही एटमबम और हाइड्रोजन बम हों, राकेट हों तो फिर क्या पूछना!’

यह कहानी स्थान और काल का अतिक्रमण करती है। उपभोक्तावाद से बजबजाती इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के भारत की भी यह कहानी हो सकती है। सत्य के संधान की बेचैनी और तनाव उनके पूरे रचनाकर्म को आप्लावित करता है। 'क्लॉड ईथरली’ का कथानायक एक लेखक है जिसकी मुलाकात अपने ही शहर की एक सड़क पर एक सीआईडी से होती तो परिचय के आदान-प्रदान के दौरान वह कहता है- 'मुझे भी इस धंधे में दिलचस्पी है, हम लेखकों का पेशा इससे कुछ मिलता-जुलता है।‘जासूस दुश्मन की टोह लेता है और उसकी कमजोरियों की तलाश करता है ताकि उसके उद्देश्य की जानकारी हो सके और उससे सुरक्षा के उपाय किए जा सकें। लेखक भी अंतर्मन में पनपते भय और स्वार्थ का संज्ञान करता है। वह मनुष्य की आत्मा में कैद सत्य, शांति कामना और साहस के स्वरूप को भी उजागर करता है। मुक्तिबोध 'अंधेरे में’ तथा 'भूल गलती’ कविताओं में परम अभिव्यक्ति और आत्मा में कैद ईमान को लाने के मानवीय प्रयास का चित्रण करते हैं। क्लॉड ईथरली में वे अनुनयभरी शांति कामना पर मंडराते संकट और संघर्ष को सूचना के केन्द्र में रखते हैं। एक विशेषकाल में, विशेष सामाजिक संरचना में व मनुष्य की वैचारिक उहापोह को पहचानने का प्रयास कविकर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यदि यह सत्य है कि दुनिया में कहीं युद्घोन्माद है तो यह भी सत्य है कि शांति कामना की आवाज भी उतनी ही प्रबल है। यह आवाज आत्मालोचन से पहचानी जा सकती है किन्तु कभी व्यक्ति के भय, प्रमाद और कभी व्यवस्था के दबाव से वह अनसुनी रह जाती है। अधिक संभावना यह होती है कि सत्ता उसे दबा देती है। मुक्तिबोध अपनी रचनाओं में कई प्रतीकों-रूपकों के माध्यम से इसे व्यक्त करते हैं। सृजनधर्मा व्यक्ति के अंत:संघर्ष व्यवस्था के भीतर उसके बाह्य संघर्ष के प्रतिबिंब होते हैं। एक जागरुक व्यक्ति के मन में उठने वाले वैचारिक झंझावात और तनाव को मुक्तिबोध निरंतर परखते हैं। उनके अति प्रसिद्घ कथन ''अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे” को स्वीकार करने वाले पात्र के रूप में क्लॉड ईथरली हैं। वे संघर्ष की जिस व्याप्ति को 'अंधेरे में’, 'ब्रह्म राक्षस’, 'भूल-गलती’ कविताओं और 'ब्रह्म राक्षस का शिष्यÓ जैसी कहानी में चित्रित करते हैं, 'क्लॉड ईथरली’ कहानी उसी का एक आभास है। यह चिंतन का प्रसार है।

कहानी का नैरेटर लेखक एक दुमंजिले मकान पर टिकी एक निसैनी पर, उत्सुकतावश चढ़कर रोशनदान से भीतर झांकता है। उसे बंद कमरे में एक आदमी दिखलाई देता है। गुप्तचर विभाग के एक जासूस से उसे पता चलता है कि वह मकान एक पागलखाना है और इसमें  बंद व्यक्ति क्लॉड ईथरली है। वह नैरेटर को बतलाता है कि ''क्लॉड ईथरली” एक विमान चालक था। उसके एटमबम से हिरोशिमा नष्ट हुआ। वह अपनी कारगुजारी देखने उस शहर गया। उस भयानक बदरंग, बदसूरत कटी लाशों के शहर को देखकर उसका दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। उसको पता नहीं था कि उसके पास ऐसा हथियार है और उस हथियार का यह अंजाम होगा। उसके दिल में निरपराधजनों के प्रेतों, शवों, लोगों के कटे-पिटे चेहरे तैरने लगे।

अमरीकी ने उसे वार हीरो घोषित कर सम्मानित किया। लेकिन क्लॉड ईथरली अपनी व्यवस्था के विरुद्घ होकर गुंडागिरी करने लगा। अपने वार  हीरो को अपराधी कहकर अमरीकी सरकार अपने किरकिरी नहीं कराना चाहती थी अत: उसने यह प्रचारित करना शुरू किया कि यह मानसिक रोगी है अत: उपचार के नाम पर उसे पागलखाने भेज दिया गया। क्लॉड ईथरली की अपराध भावना को मुक्तिबोध एक शांतिप्रेमी की कामना का प्रतीक मानते हैं। यह कामना हर उस व्यक्ति के हृदय में उपस्थित है जो आत्मा को आसानी से सुनता है। जनविरोधी व्यवस्था ऐसे आदमी से न केवल घबराती  है बल्कि उसे खतरनाक भी मानती है।

व्यवस्था द्वारा तय किए गए मापदंडों, विकास के पैमानों और चिंतन पद्घति से हटकर भले कोई जागरुक व्यक्ति कुछ सोचता है, चाहे वह मानवता के व्यापक हित में  ही क्यों न हो, व्यवस्था उसे दबाती है। असहमति के स्वर को खामोश करने में कोई दिक्कत हो तो उनकी व्याख्या, मानसिक रोग के रूप में की जाती है। आत्मधिक्कार से भरे क्लॉड ईथरली की अपराधभावना को छिपाना अमरीकी व्यवस्था के लिए जरूरी समझा गया ताकि मानवता के विरोध में किए गए उसके घृणित आक्रमण के प्रति इसे उत्तरदायी न समझा जाए। अमरीकी व्यवस्था तो विजय प्राप्ति और विश्व पर दबदबा कायम करने की नीयत से किए गए अणु आक्रमण को 'पाप नहीं, महान कार्य मानती थी। देशभक्ति मानती थी।‘ कहानी का गुप्तचर पात्र कहता है- 'जो आदमी आत्मा की आवाज कभी-कभी सुन लिया करता है और उसे बयान कर छुट्टी पा लिया करता है वह लेखक हो जाता है। आत्मा की आवाज को जो लगातार सुनता है, और कुछ कहता नहीं, वह भोला-भाला, सीधा-सादा बेवकूफ है। जो उसकी आवाज को बहुत ज्यादा सुना करता है और वैसा करने लगता है वह समाज विरोधी तत्वों में यों ही शामिल हो जाता है। लेकिन जो आदमी आत्मा की आवाज जरूरत से ज्यादा सुन करके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करता है वह निहायत पागल है। पुराने जमाने में वह संत हो सकता था। आजकल उसे पागल खाने में डाल दिया जाता है।‘

मुक्तिबोध फैंटेसी के माध्यम से पूंजीवादी सभ्यता-संस्कृति से उत्पन्न संकट की ओर इशारा करते हैं जहां विश्व पर हावी होने के लिए युद्घ भी एक निवेश है। इराक पर अमरीकी हमला निकट अतीत की घटना है जिसका लक्ष्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना था। क्लॉड ईथरली कहानी का सत्य आज भी वैसा ही है जैसा मुक्तिबोध के काल में या बीसवींसदी के चौथे-पांचवें दशक में था। क्लॉड ईथरली का जासूस पात्र कहता है- कौन नहीं जानता कि क्लॉड ईथरली अणु युद्घ का विरोध करने वाली आवाज का दूसरा नाम है। ...आध्यात्मिक अशांति का आध्यात्मिक उद्विग्नता का ज्वलंत प्रतीक है। हमारी समाज व्यवस्था चाहे सामंती युग की रही हो या आधुनिक समय की। उसे अस्वीकार करके बेहतर व्यवस्था का संज्ञान करने वाले को वह बर्दाश्त नहीं करना चाहती। हमारे कई ऐसे संतों की उनके काल में उपदेश की गई, यहां तक कि उन्हें पागल करार दे दिया गया, जिन्हें बाद में इतिहास आदर से याद करता है। क्लॉड ईथरली का अपराध बोध युद्घ को वीरता-भाव का पर्याय मानने वाले विचार के मार्ग में बाधक है। सतही राष्ट्रप्रेम के भाव की उत्तेजना से भरे व्यक्ति को शांति का समर्थक पागल लगता है।

संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना व्यक्ति, समाज, व्यवस्था और सत्ता के चरित्र को उज्जवल और संतुलित बनाने के आधार हैं। यह पद केवल सौन्दर्य शास्त्रीय तत्व नहीं है। जिसका संबंध मात्र रचनाकर्म से होता है। यह जीवन सौन्दर्य से जुड़ा पद है जो व्यक्ति और व्यवस्था के विचार स्रोत को यह तमीज देता है कि सौंदर्य के स्वीकार और कुरूप के निषेध को किस तरह परिभाषित किया जाए। मुक्तिबोध का आलोचना कर्म वस्तुत: जीवन की समालोचना है अत: वह 2017 में भी प्रासंगिक है। मुक्तिबोध ने लिखा है- ''साहित्यिक कलाकार अपनी विधायक कल्पना द्वारा, जीवन की पुनर्रचना करता है। जीवन की यह पुनर्रचना कलाकृति बनती है। कला से जीवन की पुनर्रचना होती है वह सारत: उस जीवन का प्रतिनिधित्व करती है कि जो जीवन इसे जगत में वस्तुत: जिया या भोगा जाता है लेखक द्वारा तथा अन्यों द्वारा।“

क्लॉड ईथरली जैसों पर संकट अब पहले से अधिक गहरा है। भारत का अमरीकीकरण जिस तेजी से हुआ है। उसकी चपेट में तो अब हमारे कस्बे और गांव भी हैं। धार्मिक कट्टरता का उन्माद हिंसा की मांग कर रहा है। वह हमारे राजनैतिक दलों की विचारधारा में और युवा पीढ़ी की नसों में प्रवाहित होने को आतुर है। प्रधानमंत्री किसी भी दल का हो वह अमरीकी राष्ट्रपति की तालियों का मुंतज़िर है।