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Tuesday 21 Nov 2017

आदरणीय भाई साहिब, सितंबर अंक में नामवर सिंह के बहाने आपने प्रगतिशील लेखक संघ के साथ ही अप्रत्यक्ष रूप में लेखकीय लोकतंत्र की बात भी उठाई है।

गफूर तायर, दमोह
आदरणीय भाई साहिब, सितंबर अंक में नामवर सिंह के बहाने आपने प्रगतिशील लेखक संघ के साथ ही अप्रत्यक्ष रूप में लेखकीय लोकतंत्र की बात भी उठाई है। साहित्यिक सांस्कृतिक संगठनों पर आज अभिव्यक्ति का संकट भी भारी है। कट्टरवादी ताकतें उन्हें बलपूर्वक हिंसा और दबंगई से दबाना चाहते हैं। एक उदाहरण इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन में कतिपय उपद्रवी तत्वों ने जो व्यवधान पैदा कर नाटक रोकने का प्रयास किया। ऐसे समय में वहां कथित संवाद बनाने और वैचारिक विमर्श जैसी चीजें समाप्त हो जाती हैं। संवाद और सहमति-असहमति के रास्ते भी लोकतांत्रिक तरीके से हो तब तो बात बनती है अन्यथा तो वही रह जाना बाकी है जो इप्टा के सम्मेलन में घटित हुआ। आपने उचित ही यह मुद्दा उठाया है कि प्रगतिशील मूल्यों हेतु संघर्षरत लेखकों सहकर्मियों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों को एक होकर प्रतिगामी ताकतों के खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए। यह बात पहले भी प्रलेसं के सम्मेलनों में उठाई जाती रही है। समान स्कूल प्रणाली की शिक्षा, केदारनाथ पांडेय का लेख शिक्षा जगत के लिए ही नहींइस देश के सामुदायिक विकास का सबसे कारगर उपाय है। युद्ध व पराई रोटी (अनु.-तरुशिखा सुरजन) कहानियां शानदार हैं। तरुशिखा का अनुवाद कहानीपन को पूरी शिद्दत से कहानी में उतार देता है, उन्हें मुबारकबाद। राजी सेठ की अपनी बात में अपना कमरा संकलनीय यादगार लेख है। यह संस्मरण हमारे लेखकीय जद्दोजहद की सतरें बड़े आराम से खोलता है। और तो और हमें अपने-अपने लेखन कमरे की याद-आकांक्षा, तड़प-टीस को भी बड़े ही प्यार से शामिल कर ले जाता है-अपने-अपने अतीत में, वर्तमान में। यश मालवीय के नवगीत, मालिनी गौतम की कविताएं उम्दा हैं। मु.हारुन रशीद का साक्षात्कार विवेकी राय पर अच्छा है। लेकिन साक्षात्कार विस्तार मांगता था। विवेकी राय हमारे समय के बड़े रचनाकार हैं। उनकी निबंध शैली मौलिक है और पाठक को रमा ले जाने की ताकत रखती है। गंगा प्रसाद बरसैंया की रम्य रचना वास्तव में रम्य और दमदार है। प्रहलाद अग्रवाल की समीक्षा, भगवान स्वरूप का लेख पाठक की सोच-समझ को समृद्ध करता है। कहानी नीलकांत का सफर और उस पर भाई पल्लव की नजर बहुत सुलझी है, सहजता से कहानी के मूल्यवान होने का पता देती है। सर्वमित्रा जी ने उपसंहार में रियो ओलंपिक और हमारे खेल जगत की दुखती रग पर हाथ रखा है। न केवल खेल, उन्होंने साहित्य, सांस्कृतिक और रंगमंच तथा कला के क्षेत्र की भी बखिया उधेड़ दी है। इन क्षेत्रों में सधी हुई अनदेखी, चालाक-चुप्पी और गुप्त पैंतरोंबाजी ने हमें कहां पहुंचा दिया है। आज वह भी सर्वमित्राजी के इस धारदार लेख से समझ में आ जाता है। उनका यह उपसंहार हिलाकर रख देता है। इस तीखे लेख (तेवर) के लिए मुबारकेें।