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Monday 20 Nov 2017

उपसंहार


सर्वमित्रा सुरजन
यात्राओं का यह उत्सव अंक मनुष्य की उत्सुकता, जिज्ञासा, नित नए अन्वेषण की ललक, अथाह का थाह लेने की साहसी प्रवृत्ति और कभी न थमने की ऊर्जा को ध्यान में रखकर निकाला गया। जब इसकी सूचना हमने पूर्व के अंकों में दी तो यायावरी के अनन्य प्रणेता राहुल सांकृत्यायन का उदाहरण दिया था और अनुरोध किया था, कि रचनाकार अपनी अविस्मरणीय यात्राओं के वृत्तांत हमें भेजें। हम आभारी हैं सभी रचनाकारों के जिन्होंने अपने अनूठे, रोचक यात्रा वृत्तांत हमें भेजें।
मुझे यह कहने में अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि रचनाकारों के योगदान के कारण इस सुंदर दुनिया की निराली छटा का कुछ हिस्सा हम इस अंक में बिखेर पाए हैं। हर यात्रा की अपनी कहानी, अपनी तासीर, अपनी यादें होती हैं, यह बात इन यात्रा वृत्तांतों में उभर कर आती है। कश्मीर से लेकर केरल और यूनान से लेकर स्विट्जरलैंड के विभिन्न संस्मरण इस अंक में शामिल हैं। कोई दूर देश की यात्रा कर एक प्राचीन सभ्यता से साक्षात्कार करता है, तो कोई अपने बचपन के गांव, शहर की ओर लौटता है। बहुत से लेखकों ने अपनी उन यात्राओं का वर्णन किया है, जहां वे हमेशा से जाना चाहते थे और जब वहां जाने का अवसर मिला, तो पूरी तरह उसमें रम कर लौटे। कश्मीर पर उर्मिला शुक्ल और निर्मला डोसी ने अपने-अपने संस्मरण लिखे। दोनों ने वहां की प्राकृतिक खूबसूरती का आनंद लिया तो स्थानीय लोगों की पीड़ा को गहराई से महसूस किया। एक स्थान का वर्णन दो लेखक भाव एक होने पर भी किस तरह अलग-अलग तरीके से करते हैं, यह इन वृत्तांतों को पढक़र पता चलता है। यही बात गोवर्धन यादव की थाइलैंड यात्रा और राधा बोस की कान्हा किसली यात्रा से निकल कर सामने आती है, जिसमें वे दोनों शेर से अपने साक्षात्कार का बयान कर रहे हैं। मोतीलाल ने सारंडा के सघन वन का रोमांचक वर्णन किया है। इंदिरा मिश्र ने यूनान यात्रा के विस्तृत विवरण का थोड़ा सा हिस्सा हमें भेजा है और उत्सुकता जगाई है कि इस स्थान के बारे में थोड़ा और जाना जाए। यही बात उर्मिला जैन की जेनेवा यात्रा पढक़र महसूस होती है। ओमप्रकाश कादयान, पूनम मिश्र , सुमित्रा अग्रवाल, रेशमी पांडा मुखर्जी, विनोद साव, वंदना अवस्थी इनके आलेखों में समुद्र के विभिन्न रूप-रंग और अलग-अलग जगह के समुद्र के अलग-अलग मिजाज का परिचय मिलता है। श्रीकृष्ण त्रिवेदी और ललित सुरजन ने क्रमश: अफ्रीका और अमरीका की यात्राओं का वर्णन करीब दो दशक बाद किया है। अजीत कुमार जी ने अपनी पुरानी यात्राओं को बड़ी शिद्दत से याद किया है। सुरेश शॉ , सेराज खान बातिश, हरदर्शन सहगल अपने देस की यात्राओं को बड़े उत्साह से बता रहे हैं। डा. सुधेश ने साहित्यिक यात्रा को वर्णित किया है। डा.श्यामबाबू शर्मा सिक्किम की अनूठी संस्कृति से परिचित कराते हैं तो पवन चौहान किन्नर कैलाश से। मनीष वैद्य ने मुगलकाल की एक और प्रेम कहानी से परिचित कराया है। इला कुमार और प्रेम कुमार ने अपनी यात्राओं पर डायरी पाठकों के लिए प्रस्तुत की है।
इस अंक में हमने अतीत की कुछ यात्राओं को भी शामिल किया है। बलराज साहनी, मोहन राकेश, जी एफ लेकी, प्रबोध कुमार सान्याल, राहुल सांकृत्यायन और ओम थानवी के यात्रा वृत्तांत इस विधा के अनुपम उदाहरण हैं। उनकी पुस्तकों के ये अंश पूरी पुस्तक पढऩे की उत्सुकता जगाते हैं। उम्मीद हैं पाठक इनका भरपूर आनंद लेंगे।
स्थानाभाव के कारण इस अंक में बहुत सी रचनाओं का उपयोग हम नहींकर पाए और कुछ को संपादित करना पड़ा। जिन रचनाओं का उपयोग इस अंक में नहींहो सका है, उन्हें आगामी अंकों में प्रकाशित किया जाएगा। घुमक्कड़ी का उत्सव आप और हम मनाते रहें, इन्हींशुभकामनाओं के साथ।