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Saturday 18 Nov 2017

अतीत की यात्रा : मेरी जीवन यात्रा


राहुल सांकृत्यायन
1948 का प्रथम दिन बम्बई में आया। सम्मेलन का काम समाप्त हो गया था। नववर्ष का दिन बड़े अमंगल रूप में आरंभ हुआ, 31 को छात्रसंघ ने अपना सम्मेलन करना चाहा। सरकार ने निषेधाज्ञा लगा दी। न मानने पर आंसू वाली गैस और गोलियां चलाई गई। अहिंसा का सबसे ज्यादा ढोल पीटने वाली सरकार के लिए गोली-वर्षा सबसे मामूली बात बन गई। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को भडक़ानेवाले लोगों की कमी नहीं थी। छात्रसंघ इसका विरोधी था। चाहिए तो यह था, कि उन्हें अपने प्रचार के लिए प्रोत्साहित किया जाता।
कांग्रेस यदि साम्प्रदायिक वैमनस्य को रोकना चाहती थी, तो अपने सहायकों की शक्ति को निर्बल नहीं करना चाहिए था। गोली फिर अपने ही लडक़े-लड़कियों पर बरसाई जा रही थी, कई छात्र-छात्राएं घायल हुए। यह उस समय जब कि कश्मीर में युद्ध छिड़ा हुआ था, हैदराबाद कलेजे का कांटा बना हुआ था, देश में रियासतों के प्रतिक्रियावादी राजा और उनके पिट्ठू अपनी सर्वतंत्र स्वतंत्रता को छोडऩे के लिए तैयार नहीं थे, देश आर्थिक तौर पर अत्यंत निर्बल था, और उसकी सामरिक शक्ति की परीक्षा का यह समय था। किसान और मजदूर अर्थात् जनता का सबसे अधिक भाग इस समय प्रिय होना चाहिए था। उनके नेताओं में किसी कांग्रेसी नेता से कम देशभक्ति नहीं थी। अंग्रेजों के हथकंडे जेल और गोली द्वारा स्वतंत्र भारत को सबल नहीं बनाया जा सका। सरकार एक ओर सबको एक होने के लिए कहती और दूसरी तरफ आचरण इस तरह करती थी।
अब तक पश्चिमी पाकिस्तान विशेषकर पंजाब और पश्चिमोत्तम सीमांत हिन्दुओं से खाली हो चुका था। घर-बार छोड़े लाखों लोग सूखे पत्ते की तरह जहां-तहां डोल रहे थे। लड़ाई के वक्त में अंग्रेजों ने बहुत से सैनिक केम्प बनावा दिये थे, जिन्होंने इस समय बड़ा काम दिया। बम्बई में ऐसे तीन बड़े-बड़े केम्पों में दो में सिंधी और एक में पंजाबी रहते थे। सिंधी सभी नगरोंवाले ऑफिसों के क्लर्क, छोटे-मोटे दुकानदार और मिस्त्री का ही काम कर सकते थे। तीनों में मिलाकर 15 हजार नर-नारी रहे होंगे। अभी सहायता के बारे में सरकारी नीति साफ नहीं हुई थी, आशा रखी जाती थी, कि मारवाड़ी व्यापारी मंडल और दूसरे व्यापारी इस बोझ को अपने ऊपर उठाएंगे। वे सहायता कर भी रहे थे, लेकिन कितने दिनों तक? खाने का प्रबंध बुरा नहीं था, लेकिन बहुत से लोग पक्की या टिन की छतों के नीचे नहीं थे। यदि वर्षा हुई, तो कहां जाएंगे? शिक्षा और चिकित्सा का प्रबंधन बहुत असंतोषजनक था। नाना जगहों के एक-सी विषद् के मारे लोग जब चौबीस घंटा एक जगह रहने के लिए मजबूर हुए, तो आपस में झगड़ा भी होता था। शिक्षा के लिए अवैतनिक शिक्षिकाओं को नियुक्त किया गया था। लेकिन इस तरह की बेगार वह कितने समय तक मन लगाकर सकती थीं। कश्मीर में पाकिस्तान सीधे लड़ रहा है, यह किसी से छिपा नहीं था, लेकिन पहले उसने इसे मानने से इंकार किया। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ से इसकी शिकायत की, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ तो अमेरिका और उसके पिट्ठू इंग्लैंड की दुम भर रहा था। ये दोनों स्वयं चाहते थे, कि कश्मीर पाकिस्तान के साथ में चला जाए, इस प्रकार उनको सोवियत रूस की सीमा पर ताल ठोंकने का मौका मिले।
रायपुर- 2 तारीख को कलकत्ता मेल से हम रायपुर के लिए रवाना हुए। सबेरे 8 बजे वर्धा में आनंदजी उतर गये। उनका टिकट भी रायपुर तक था, लेकिन इसमें संदेह था, कि वह वहां पहुंच सकेंगे। नागार्जुनजी के साथ में आगे चले। आगे गोंदिया तक गाड़ी में बहुत भीड़ नहीं थी। फिर लोग अधिकाधिक चढऩे लगे। छत्तीसगढ़ पहाड़ी देश है, पर वहां साल में 50 इंच वर्षा होती है, इसलिए पहाड़ों का हरे जंगलों से ढंका रहना स्वाभाविक है। पहाड़ी जंगलों में बांध डालकर समुद्र सी जलनिधियों का बनाना आसान है। फिर सिंचाई ही नहीं, बिजली पैदा करना भी सहज हो सकता है। छत्तीसगढ़ में ये सुभीते हैं, और इनसे भी अधिक यहां खनिज पदार्थों का अकूत भंडार है, जिसके लिए भिलाई का लौह कारखाना बनने जा रहा था। छत्तीसगढ़ में जिलों के अतिरिक्त 14 परमभट्टारक राजा भी थे, अत: जिनके अधिकारों को भारत सरकार ने ले लिया था- उन्हें वार्षिक पेंशन मिलेगी, और पदवी तथा सम्मान भी पूर्ववत् बना रहेगा। 1 जनवरी से इन रियासतों को मध्यप्रदेश के शासन में दे दिया गया। उसी तरह उड़ीसा वाली रियासतें उड़ीसा में विलीन कर दी गई। सरैकेला और खरसवां को उड़ीसा में मिलाने का बिहार की ओर से विरोध हो रहा था, पीछे उन्हें बिहार को दे दिया गया, जिस पर इसी साल उड़ीसा में विरोध की आग भडक़ उठी। यदि इन दोनों रियासतों के लोगों की भाषा उडिय़ा है, तो उन्हें उड़ीसा को ही देना चाहिए था। लेकिन भाषा, किसी प्रदेश के लोगों की पारस्परिक सबसे जबर्दस्त कड़ी को हमारे राष्ट्र-कर्णधार बिल्कुल तुच्छ समझते हैं। वह गोलियों से भूनकर, लोगों के खून से हाथ रंगने के लिए तैयार हैं, पर भाषा पर आधारित प्रदेश को बनाने के लिए नहीं। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या 45 लाख से ऊपर है। मध्यप्रदेश का यह पिछड़ा हुआ भाग है, यद्यपि वहां के मुख्यमंत्री यहीं के हैं। पिछड़े और उपेक्षित होने से लोगों में छत्तीसगढ़ के अलग प्रदेश होने की भावना स्वाभाविक है। भाषा के अनुसार यहां हिन्दी, बल्कि अवधी का एक रूप छत्तीसगढ़ी बोली जाती है। यहां की भाषा पर पड़ोस की भोजपुरी, बुन्देली, उडिय़ा का और मराठी का कुछ प्रभाव होना स्वाभाविक है।
रायपुर में हमें छत्तीसगढ़ के विद्यार्थी फेडरेशन ने बुलाया था। अगले दिन 4 जनवरी को शनिवार था। सबेरे ही से गोष्ठी शुरू हो गई, जो शाम को सभा में जाते समय ही टूटी। सोशलिस्ट भाइयों से खुलकर बातचीत हुई, विशेषकर सोवियत के बारे में। कितने ही किसान कार्यकर्ता भी गोष्ठी में आए। पता लगा, यहां की सरकार जमींदारों और मालगुजारों को हटाने की अभी बात भी नहीं सोच रही है। रात को 8 बजे के करीब सभा शुरू हुई। बम्बई में सरकार ने जिस तरह छात्रों के साथ खूनी होली खेली थी, उसके कारण यदि उनके नेता वर्धन ने कांग्रेस सरकार से लोहा लेने की बात की, तो कोई आश्चर्य नहीं। कश्मीर और हैदराबाद का झगड़ा सामने देकर गृह-युद्ध को रोकने की बड़ी आवश्यकता थी, लेकिन ताली एक तरफ से थोड़े ही पिटती है। मैंने भी भाषण दिया। रायपुर में हिन्दी के महान कवि पद्माकर की संतानों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई। और इसने बतला दिया, कि हिन्दी के निर्माण में छत्तीसगढ़ -प्राचीन दक्षिण कोसल- किसी से पीछे नहीं रहा।
5 जनवरी के सबेरे 5 बजे हम अब प्रयाग की ओर रवाना हुए। बिलासपुर में गाड़ी बदलनी पड़ी। यहां से कटनी तक अखंड पहाड़ और जंगल चला गया है। जब तक न देखें तब तक आदमी को क्या पता लगता है? यह सारा भूभाग हरा-भरा, और खनिज सम्पत्ति में भी अतिसमृद्ध है। यहां के सभी लोग पिछड़े हुए हैं, जिनमें जनजातियों की संख्या काफी है। जंगलों के ठेके- जिसका अर्थ है अधिक आमदनी- दूसरी जगह के ठेकेदारों के हाथ में जाते हैं, और लोगों को कुलीगिरी करते पेट भरने और तन ढंकने की कोशिश करनी पड़ती है।
रास्ते में कटनी में भी वर्षा होती रही। तीन घंटे बाद यहां से प्रयाग की ट्रेन मिलनेवाली थी। स्टेशन से बाहर निकलकर देखा, सडक़ के दोनों तरफ पंजाबी शरणार्थियों ने अपनी छोटी-मोटी दुकानें खोल रखी हैं। कुछ भोजनालय भी थे। स्थानीय दुकानदार उनसे होड़ लेने में असमर्थ थे, क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा नफा उठाना चाहते थे, बाकि शरणार्थी कम से कम नफे पर अपने सौदे को बेचने के लिए तैयार थे। इस साल प्रयाग में अधकुंभी होने वाली थी। देश में अनाज की बड़ी किल्लत थी। सरकार ने इसकी सूचना देकर लोगों को न जाने की सलाह दी थी। पर कौन सुनने के लिए तैयार था? पंडे यात्रियों को हांके लिए जा रहे थे, ट्रेन में जगह मिलनी आसान नहीं थी। रात के 11 बजे एक्सप्रेस ट्रेन मिली, जो सबेरे 5 बजे प्रयाग पहुंची।
प्रयाग- 6 तारीख को निवास स्थान पर ही रहे। लोला और ईगर की चिट्ठी मिली, जिसमें पैसों की आवश्यकता भी बताई गई थी। लेकिन, यहां के पैसों का वहां मूल्य ही क्या था? बुलाने की तो बात भी नहीं कर सकता था, क्योंकि ईगर के पढऩे का जितना अच्छा प्रबंध वहां हो सकता था, जितनी आसानी से वहां काम मिल सकता था, उसका अभी यहां सपना भी नहीं देखा जा सकता था। इस समय भारत और पाकिस्तान की तनातनी क्या कश्मीर में गुत्थमगुत्था हो रही थी। पाकिस्तान बढ़-बढक़र धमकी दे रहा था। पटेल ने साफ शब्दों में ललकारा- बन्दरघुडक़ी मत दो, यदि लडऩा हो, तो सामने आ जाओ। लेकिन, पाकिस्तान जिन मुरब्बियों के बल पर कूद रहा था, उन्हें मंजूर हो, तभी तो आगे कदम बढ़ा सकता था।
यहां आने पर पता लगा, नागार्जुन का लडक़ा शोभा बीमार है। नागार्जुन का स्वास्थ्य भी हमेशा ही से कमजोर है, जो शोभा को दाय भाग में मिला है। बिचारा वर्षों बीमारी में घुलता रहता है। 8 तारीख को नागार्जुन घर के लिए रवाना हुए। लिखने का अभ्यास धीरे-धीरे छूट गया, अब बोलकर लिखने में बहुत सुभीता मालूम होता था। नागार्जुन लिपिक का काम करते, मुझे यह बहुत बुरा मालूम होता था। मैं और अधिक समय तक उनके श्रम और समय को बर्बाद करने के लिए तैयार नहीं था। साथ ही मुझे किसी लिपिक की जरूरत थी। श्री सत्यनारायण 1944 में इस काम को बड़ी अच्छी तरह कर चुके थे, लेकिन मालूम नहीं इस समय वह खाली थे या नहीं, ऊपर से उनकी छुआछूत के ख्याल से यात्रा करने में कठिनाई थी। साहित्य सम्मेलन के सभापति होने से मुझे इस साल के काफी भाग को यात्रा में बिताना था।
सम्मेलन का अब तक सबसे अधिक काम परीक्षा-विभाग में रहा। सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य जब तक प्रचार था, तब तक यह बुरा नहीं था। परीक्षाओं द्वारा हिन्दी के गंभीर अध्ययन का बहुत व्यापक रूप में काम हुआ। पर, अब परीक्षाओं पर निर्भर रहना ठीक नहीं। आखिर हिन्दी क्षेत्र के विश्वविद्यालय भी अपनी परीक्षाओं द्वारा उस काम को कर रहे हैं। प्रकाशन और साहित्य-सृजन को बढ़ाने की आवश्यकता थी, उसी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत थी। लेकिन, परीक्षा पुस्तकों से जिनको लाभ था, उनकी इस ओर दिलचस्पी नहीं थी। 6 जनवरी से 14 जनवरी तक के लिए मैं अब प्रयाग में बंद था। आत्म-निरीक्षण करते मुझे मालूम हुआ, कि जरा-जरा बात में चित्त विकल हो जाता है। ‘‘काजीजी दुबले शहर के अंदेशे’’ के अनुसार विश्व में कहीं पर भी समान आदर्श और आदर्शवादियों के ऊपर प्रहार या खतरा पैदा होने पर मन चिंतित हो उठता। किसी भी अयुक्त कार्य या विचार को देखकर अंतर उत्तेजित हो जाता- कार्य चाहे सामाजिक दबाव हो, रुढि़ हो या और कोई बात।
प्रयाग के सामने झूसी में प्रभुदत्त ब्रम्हाचारी एक बड़े संत हैं। धार्मिक प्रदर्शन उनके यहां चरम सीमा पर पहुंचा था। संत लोगों का मुझसे भी बहुत संपर्क रहा है, और मैंने अच्छे संतों को हमेशा कोमल स्वभाव का पाया। उस दिन उनकी बनाई-शायद भागवती कथा-पुस्तक मिली, जिसके 215 वें पृष्ठ पर लिखा देखकर चकित हो गया-
‘‘धर्महीन जो कुटिल करे निंदा हरिहर की। गरम संडासी पकिरि जीभ खिंचै वा नर की।’’
ब्रम्हाचारीजी कैसे सुन्दर ढंग से सन्तों की परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं? बोलो नये पैगम्बर प्रभुदत्तजी की जय! सरस भक्ति से काम नहीं चलते देख ब्रम्हाचारी ने गरम संडासी लेने की प्रतिज्ञा की। उनके इष्ट इसी तरह पृथ्वी का बोझ उतारते थे, और अब वह स्वयं उसी पथ के पथिक हैं। पर लोग हाथ में गरम संडासी देखकर ब्रम्हाचारी के पीछे नहीं भागेंगे, बल्कि उस अखण्ड कीर्तन तथा पूजा-पाखण्ड से, जो कि उनके वेदान्त के अनुसार बिलकुल मिथ्या चीज है।
अब मेरे पार्टी से अलग होने की सूचना अखबारों में प्रकाशित हो चुकी थी। बहुतों को बहुत दुख हुआ, और मुझे भी, क्योंकि पार्टी से अलग रह करके भी मैं पार्टी को छोड़ दूसरे का नहीं हो सकता था। मैं वह भी जानता था, कि इसे विरोधी पार्टी के विरुद्ध प्रचार का साधन बनाएंगे। कुछ यह भी कह रहे थे, कि अब रूस जाना नहीं हो सकेगा। मैं 1917 में उसके जन्म के समय से ही सोवियत रूस का मित्र और समर्थक रहा, और सदा रहूंगा। साम्यवाद सदा मेरा आदर्श रहा और आगे भी रहेगा। इसीलिए किसी पत्र में यह छपा देखकर मुझे आश्चर्य और क्षोभ नहीं हुआ- क्या जाने राहुल जी का पार्टी से अलग होना सच्चा नहीं बाहरी दिखावा हो। मुझे उसके सच्चे न होने और बाहरी दिखावे में ही प्रसन्नता थी, क्योंकि पार्टी से अलग होकर मैं अपनी किसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए तैयार नहीं था।  11 तारीख को रविवार था। उस दिन रात्रि-भोजन श्रीनिवासजी के एक मित्र मुसलमान सज्जन के घर हुआ। श्रीनिवास जी को निरामिष भोजन में परहेज नहीं था, मेरे लिए विशेष तौर से सामिष भोजन तैयार किया गया था। मध्यवित्त मुसलमान उस समय और भी चिंतित थे, कितने ही डरकर पाकिस्तान जा चुके थे। हमारे मेबान का भविष्य के लिए चिंतित होना स्वाभाविक था। पूछ रहे थे- कैसे हम अपनी भारत-भक्ति का सबूत दें। हां, सचमुच ही यह बतलाना मुश्किल था। हरेक आदमी हनुमानजी की तरह छाती फाडक़र अपने हृदय में बिराजती भक्ति को कैसे दिखा सकता है? मैंने कहा- और लोगों से जिसमें भिन्नता न दिखाई पड़े, वही रास्ता अच्छा होगा। आखिर कितने लाखों ईसाई भी हमारे यहां हैं, उनको तो इसकी चिंता नहीं हैं, क्योंकि वह भेस और रुचि में अपने दूसरे देशवासियों से भिन्न नहीं हैं। यद्यपि धर्म और अपना कुछ आचार-विचार भी है। उन्होंने ठीक ही कहा- इसमें तो समय लगेगा। इसमें क्या शक है। लेकिन, समय लगने का मतलब एक पीढ़ी की देर है और आरंभ करने के लिए समय लगने की क्या बात है? इसके सिवाय दूसरा रास्ता भी तो नहीं है। एक शिक्षित भद्र मुसलमान हृदय आशंका से भरा हुआथा। वह सोचने लगे, भारत के जनसाधारण से अपने को अलग रखना हमारी भूल है। उधर गांधीजी रेडियो पर बोल रहे थे- उर्दू और नागरी दोनों अक्षर रहें, दोनों भाषाएं भी बरकरार रखी जाए। नही ंतो जनतंत्रता खत्म हो जाएगी। यह भाषा और लिपि का बिलगाव उसी बिलगाव का बाहरी प्रदर्शन था, जो कि हिन्दू-मुसलमान में पाया जाता है, और जिसके कारण आज इस दिन का मुंह देखना पड़ा।
इसी समय लखनऊ से निकलने वाले दैनिक ‘नवजीवन’ के सम्पादक बनने का प्रस्ताव मेरे सामने रखा गया, लेकिन मैं उसके लिए कैसे तैयार हो सकता था! लखनऊ में सारा क्या अधिक समय भी देना मेरे लिए संभव नहीं था। पुस्तकें लिखना, इधर-उधर घूमने जाना था। साथ ही परिभाषा के काम की जिम्मेवारी मैंने अपने ऊपर ले ली थी। फिर ‘नवजीवन’ से संघी और हिन्दू सभाई मनोवृत्ति रखने वाले भी संबंधित थे, जिनके साथ मेरी पटरी कैसे जमती?
पुस्तक मेरी जीवन यात्रा से साभार
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन