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Saturday 18 Nov 2017

अतीत की यात्रा : देवात्मा हिमालय


प्रबोध कुमार सान्याल

भूमिका
युह पुस्तक बांग्ला में लिखी है, और मैं बहुद खेद के साथ यह कहता हूं कि मैं बांग्ला पढ़ नहीं सकता। भारत की इस गरीयसी भाषा से अनभिज्ञ हूं, इसके लिए हमेशा दुखी रहूंगा। मूल पुस्तक मैं पढ़ नहीं पाया, मगर भाषान्तर के द्वारा बहुत से संक्षिप्त अंश मैं पढ़ चुका हूं, उससे मैं विशेष रूप से आकृष्ट हुआ हूं। पहाड़-पर्वत, जहां भी हैं, हमें प्रिय हैं। परन्तु हिमालय ने मुझमें एक अद्भुत चाव विस्तार किया है, उससे जो कुछ भी संलग्न है वही मेरे अंतर को छूता है। ये पहाड़ पर्वत भारत के विस्तीर्ण भू-भाग की चोटी पर नगाधिराज के रूप में विराजमान हैं; मात्र इतना ही नहीं, प्रत्येक भारतवासी के अंतर मन तक वे अपना गहन संदेश पहुंचाते हैं। इतिहास के उषाकाल से ही हिमालय हमारे जातीय जीवन के साथ जुड़ा हुआ है और सि$र्फ हमारी राष्ट्रनीति को ही वह प्रभावित करता रहा है; यही नहीं, हमारी शिल्पकला, हमारे साहित्य, हमारे पुराण और धर्म के साथ भी यह पर्वतश्रेणी  घनिष्ठरूप से जुड़ी है। सुदूर अतीत से हजारों-हजार वर्षों से हमारे जातीय जीवन के विकास में भी हिमालय ने जो हिस्सा लिया है, मुझे लगता है, पृथ्वी पर और कहीं अन्य पहाड़ या गिरिश्रेणियां वह करने में सक्षम नहीं हुई।  इसलिए इस अतिप्राचीन और अतिमहान मित्र और रक्षक के विषय में लिखी सभी रचनाओं का मैं आदर करता हूं और खासकर उनका स्वागत करता हूं, जिन रचनाकारों ने सिर्फ एक भौगोलिक दृष्टि से ही हिमालय को नहीं देखा बल्कि जिन्होंने मित्रवत् उसे छाती से लगाया। एक ओर तो उसका सौंदर्य और काव्य है, दूसरी तरफ जैसा है जर-डरावना, उसी प्रकार है भाव-गहनता। हिमालय के इसी भिन्न-भिन्न भाव-बोध के संग जो अपने-अपने स्वर मिला सकते हैं, वे ही हिमालय का रस ले सकते हैं। इस ग्रंथ के लेखक प्रबोधकुमार सान्याल ने हमारे इस महान मित्र और संगी के साथ अपने अंतर का स्वर गहराई से मिलाया है- यह उनकी लेखनी से साफ समझ में आता है।  और कोई जो इस पुस्तक को पढ़ेंगे, उनकी अन्तर्दृष्टि में इस पुस्तक के द्वारा हिमालय की आकर्षण शक्ति का रहस्य, कुछ परिमाण में, उद्घाटित होगा; एवं युग-युगान्तर से, वंश-परंपरागत हिमालय की गिरिश्रृंखला हमारे देशवासियों के मन में जो मोहनी-माया विस्तार करती आई है, उसकी, कुछ अंशों में, वे उपलब्धि कर पाएंगे।    -जवाहरलाल नेहरू, 18 सितम्बर, 1955, नई दिल्ली
समग्र हिमालय है शैव और शाक्तों की क्रीड़ा-भूमि। जितने ही दुर्गम में जाइए महादेव और पार्वती के मंदिर सर्वत्र मिलेंगे। जितनी दूर जाओ, जहां मन चाहे जाओ, महाकाली स्थापित हैं! शक्ति की आराधना आदिमकाल से चली आ रही है। उत्तर-पश्चिम सीमांत से शुरू कर पेशावर से रावलपिंडी, झेलम, सियालकोट, जम्मू, पठान-कोट; इसके आगे पंजाब आ जाओ, हिमाचल प्रदेश में कांगड़ोकुल में आ जाओ शिमला में, गढ़वाल में, कुमायूं में सि$र्फ शिव और दुर्गा, चंडी महाकाली महिषमर्दिनी। इसके बाद उत्तर की ओर बढ़े, समग्र कश्मीर में शिव और शक्ति की पूजा। उत्तर आओ, नीचे कुमायूं में, फिर पूर्व की ओर तिब्बत में प्रवेश करो, मानसरोवर के पथ पर पाओगे, शक्ति की आराधना। तिब्बत में खोचरनाथ, गुफा के भीतर महाकाली की मूर्ति प्रस्थापित है। अमावस में पशु-बलि वहां का विधान है। हिन्दू दर्शन की वनस्पतियों से ही विभिन्न शाखा-प्रशाखाएं निकलती हैं- कौन शैव है, कौन शाक्त, कौन है बौद्ध। भारतीय धार्मिक संस्कृति युगों से परस्पर में एकता की सृष्टि कर रही है। यह संस्कृति राष्ट्र की किसी सीमा-रेखा को नहीं मानती, राजनीति के नाप-जोख को नहीं स्वीकारा। तुषारावृत्त सैकड़ों गिरिश्रृंखलाओं ने अवरोध की परवाह नहीं की। मात्र आंतरिक धर्म-विश्वास की शक्ति से सदा-सदा से यह हिमालय को आरपार करती आई है। ठीक इसी कारण से ही सिक्किम पहुंचकर मुझे लगा यह तिब्बत का हिस्सा है, नेपाल में खड़े होकर सोचो, यह भारत का हिस्सा है। जिन्होंने कुमायूं, कांगड़ा, हिमालय प्रदेश, लद्दाख अथवा इसके आसपास उत्तर बिहार के किसी-किसी उत्तरांचल में भ्रमण किया है, या जो शिमला से तिब्बत होकर हिन्दुस्तान रोड होकर किन्नर देश गए हैं, वे जानते हैं, टुकड़ों में तिबब्त इसी भारत में बिखरा पड़ा है। फिर देखता हूं कि तिब्बत की अनगिनत गुफाओं में हिन्दू देव-देवियों का पूजा-पाठ होता है, तब समझ में आता है कि टुकड़ों में भारत ही तिब्बत के मर्म में अनादिकाल से डेरा डाले हैं।
उत्तर बिहार पारकर जब सगौली के अरसौल स्टेशन पर गाड़ी से उतरा, तब ऐसे बहुत सारे तर्क मेरे मन को घेरे रहे। मैं नेपाल जा रहा था। पालित साहब साथ थे। उनकी चाल कुछ धीमी थी। यहां यह कह रखना ठीक है; इस बार की यात्रा में कुछ रुपए-पैसे की कमी थी, इसलिए पालित साहब ने सोने का एक हार अपने पास रख लिया था। यह है किसका, यह सवाल ही अप्रासंगिक है। लेकिन यह सवाल आगे उठ सकता है, इसलिए पहले से ही कह रखना ठीक है। उस समय रक्सौल में शाम छपछपा रही थी। अगल-ब$गल दो स्टेशन हैं, उनमें एक है भारतीय रक्सौल, दूसरा नेपाली। पार-पत्र के लिए कोई असुविधा नहीं थी, फिर भी दो पैसे लग ही गए और दोनों के नाश्ते में लग गया चारेक आने। दोनों देश के पहरेदार थे अगल-बगल। यह शिवरात्रि का अवसर था। पशुपतिनाथ का मेला लगता है, भिन्न-भिन्न यात्रियों की आवाज ही थी। इस समय किसी बंगाली क्रांतिकारी युवक का पुलिस को धोखा देकर नेपाल में चले जाना असंभव नहीं, या नेपाल के अस्त्र-शस्त्र भी लाना संभव है। जो भी हो, यहां से अमलेकगंज अंदा•ान तीस मील होगा। उस समय दो व्यक्तियों का रेल किराया दस आने से अधिक नहीं था। तीसरे दर्जे की दो टिकटें लेकर हम दोनों अमलेकगंज की गाड़ी पर जा बैठे। पालित साहब, पता नहीं कहां से भर मुंह पान पा गए थे, साथ ही •ार्दा भी। निश्चिंत मन उन्होंने बीड़ी का कश लगा लेने के बाद कहीं कहा, ‘‘सेकण्ड क्लास की टिकटें ले लेते तो कुछ खास ज्यादा तो लगता नहीं। इस गाड़ी में भीड़  बहुत है।’’ इस बार की तीर्थयात्रा के मद में उन्होंने कुछ चंदा भी दिया था, लेकिन उतने चंदे से तो हावड़ा से मोकामा घाट तक ही तीसरे दर्जे में आया जा सकता था। मगर मुझे खुशी थी कि इस यात्रा में एक हंस-बोला साथी मिला। अप्रासंगिक बात कहने की गुंजाइश यहां है। लम्बे दिनों के भ्रमण से मुझे यह ज्ञान था कि हिमालय में बहुत से स्थान ऐसे हैं जहां अभ्यास का भोजन, पीने का पानी और तरह-तरह की विलास की चीजें़ दुष्प्राप्य हैं। इस कारण दैनिक जीवन के तरह-तरह के अभ्यास त्याग, बहुत से उपकरमों से मन हटाए बिना पग-पग पर मन खराब होगा ही। अभाव के कांटे चुभेंगे ही। हमारी खिलौने जैसी ट्रेन गाड़ी गांव के बीच से गुजरती है और हम अँधेरे से देखते रहते हैं कि गांव के लिए कोई खास बातें नहीं है। बहुत से यात्री पैदल ही जा रहे हैं, उनका तम्बू सडक़ के इधर-उधर तना हुआ है। इस रेल सडक़ के अलावा पूरे नेपाल में यातायात का कोई दूसरा जरिया नहीं है। उस समय नेपाल के राजा त्रिभुवन विक्रम को नेपाल की त्रिसीमा के बाहर जाने का हुक्म नहीं मिला था, और त्रिभुवन विजय विक्रम को बड़े गर्व से महाराज या प्रधानमंत्री या प्रधान सेनापति ने एक प्रकार से नजरबंदी बना रखा था।
यह है हिमालय का तराई इलाका। सभी नदी-नाले, झरने और जल-प्रपात की गति इधर ही है। वर्षा इधर अधिक है; और इधर जैसे खूब $फसल होती है, वैसे ही लोग मलेरिया से परेशान भी खूब रहते हैं। यह तराई इला$का यहीं खत्म नहीं हुआ। दक्षिण कुमायूं से शुरू हो समग्र उत्तरप्रदेश बिहार, बंगाल, सिक्किम, दक्षिण भूटान और उत्तर-पूर्व आसाम तक फैला है। इसकी लम्बाई हजार मील न सही, लगभग इतनी ही जरूर है। समग्र हिमालय से तुषार विगलित धाराएं उतरती हैं। मिट्टी वगैरह वर्षा और आंधी तूफान से बहती हुई वन-जंगलों को उखाड़-पछाड़ कर इस विशाल तराई इलाके में फैल जाती है। इस इलाके के घने घुप्प जंगलों की तुलना मात्र पहले के सुन्दरवन से ही की जा सकती है। कुमायूं के पूर्व प्रांत शिलगढ़ पर्व से काल-गिरि, टनकपुर, पीलीभीत, मोइलनी, कौड़ीबाजार होकर जोगबानी की ओर से होते हुए जलपाइगुड़ी, शुक्ना, अलीपुरदुआर और दक्षिण सिक्किम पार कर आसाम तक जाया जा सकता है। इस हिमालय की तराई इलाकों में जिस प्रकार सैकड़ों पुराने स्थापत्य, मंदिर, देवालय तथा बहुत सारे ऐतिहासिक तत्व मिलते हैं, वैसे ही इसके भयानक जंगलों में हाथी, बाघ, रीछ, चीता, गेंडे विभिन्न जातियों के हरिण, सैकड़ों वर्णों के पंछी और जहरीले सर्प आदि इस विशाल भू-भाग के चप्पे-चप्पे में सदा से बिना बाधा-विघ्न के वास करते आ रहे हैं। हिमालय में सर्वत्र फैली ओषध-वन भूमि और खनिज सम्पदा आज भी अजात है, जिन्हें ढूंढ निकालकर रासायनिक परीक्षणगृहों में परीक्षा करने के बाद करोड़ों रुपयों की सि$र्फ आय ही नहीं हो सकती है, बल्कि इस विशाल अरण्य की विविध औषध-लताओं से इस आणविक युग में मनुष्य-अनुपलब्ध मृत संजीवनी भी मिल सकती है। इस जमाने में अविश्वसनीय कुछ भी नहीं है।
वीरगंज के विशाल जंगल के एक हिस्से में हमारी गाड़ी बहुत ही धीमी चाल से गुजर रही है। पता चला है कि महाराजा हाथी पर सवार होकर आज इधर शिकार खेलने आए हैं। जंगल के किनारे-किनारे उनके लोगों के तम्बू ताने गए हैं। रात में कुछ नर नहीं आता, क्योंकि किसी प्रकार की सरकारी बत्ती का कोई इंतजाम नहीं है। मिट्टी का तेल भारतवर्ष से आता है जिसका मूल्य अधिक पड़ता है। नेपाल को अंधेरे में ही रखना ठीक है। क्योंकि सभ्यता के प्रकाश में ही राज्य के निवासी अपनी दुर्दशा देखकर स्वयं सिहर उठेंगे और फिर महाराज के हाथ से शासन की लगाम छूट जाएगी! इसके अलावा जातिगत बौद्ध होने पर भी उन्हें शक्ति पूजा के द्वारा उत्साहित किया जाता है। क्योंकि लड़ाई में अंग्रेजों की सहायता के लिए गोरखा सैनिक बिना भेजे राज्य का आय-व्यय संतुलित नहीं हो सकता। बिलकुल निर्भय शीत-रक्त वाले गोरखों के सिवा और कोई दुश्मन पक्ष पर हमला नहीं बोल सकता। यहां तक कि सीमांत के पठान, बलूचिस्तानी, राजपूत, जाट तक गोरखा सेना को देखकर पीछे हट जाते हैं। समग्र भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, सुदूर पश्चिम, अरब और उत्तरी अफ्ऱीका में, युरॅप के बहुत सारे हिस्सों में अपनी निर्भीकता, तेजस्विता और निर्दयता के लिए ये गोरखे प्रसिद्ध हैं। उन्हें बचपन से यही शिक्षा मिलती है कि दुश्मन के लिए निर्दयी बनो। इतने विवश और अनुशासित, कष्ट-सहिष्णु और बलिष्ठ सरल स्वभाव के तथा इनके जैसा विश्वसनीय कहीं कोई नहीं मिलता। अंग्रेजों के मंदभाग्य-काल में प्राय: सभी श्रेणियों के $फौजी जत्थे बागी हो उठे थे मगर गोरखा फौ की विद्रोह की चर्चा कभी सुनी नहीं गई।
अमलेकगंज आखिरी स्टेशन है। हम जब उतरे, उस समय रात हो चुली थी। स्टेशन है पहाड़ की गोद में। चारों ओर अंधेरा। मिट्टी के तेल को बत्तियों में इधर-उधर मारवाडिय़ों की कई दुकानें दिखीं। उतने में ही उन्होंने डण्डी-पल्ला लटका लिया है। कैंची और कटपीस के कपड़े रख छोड़े हैं और वहीं डालडा के जले हुए घी में पूरियां बनाते हैं। किसी जमाने में जयपुर, उदयपुर, चित्तौड़, बीकानेर और जैसलमेर के वे अधिपति थे। इसे वे और हम सभी आज भूल गए हैं। व्यापार के साथ वीरता को $कायम वे नहीं रख सके। गाड़ी से उतरकर रात बिताने को ठौर ढूंढने के पहले ही पालित साहब जिद कर बैठे कि $गरम चाय पीऊंगा। इस बीच लोगों की भीड़ बहुत बढ़ गई है। रात काटने की जगह हो सकता है मिल सकती थी मगर स्वयं मुझे कभी नरककुण्ड अच्छा नहीं लगा। फलस्वरूप तरह-तरह के कच्चे मालों से भरी दुकान घर में रात कटने लायक जगह मिल गई। चारों ओर जंगल और पहाड़ों की तराई के घुप्प अँधेरे के सिवा और कहीं भी कुछ नहीं दिखता। लेकिन इस दुकान से जुड़े घर की फर्श पर कम्बल लपेटकर जब लेटा रहा, तब मुझे रावलपिंडी की वही दवाओं के गोदाम की याद हो आई। सैकड़ों प्रकार की दवाओं की मिश्रित तेज गंध से सारी रात मैं टहलने को मजबूर हुआ था। सी.आई.डी. की निगाहों में कोप-भाजन बनने के भय से उस जेठ की रात को घर से निकल नहीं सका, और यहां भी इस कच्चे माल की आढ़त से और कच्ची लकड़ी के बने घर के बाहर निकलकर एक बार भी सांस नहीं ले सका। कारण, इस अमलेकगंज के बाजार में कल रात भी एक नरभक्षी बाघ एक औरत को उठा ले गया। नतीजा यह कि हम लोगों के घर को चारों तरफ से एकदम बंद कर दिया गया। अंदर जाड़े में कांप रहे थे सभी। पालित साहब अपने साथ बिस्तर का एक गट्ठर लेते आए थे। उस पर मजे से सोकर जर्दे वाला पान चबा, बीड़ी सुलगा, नसवार ठूंसकर बोले, ‘‘आपका हिमालय आपका हो रहे। आपके साथ जुडऩे के बाद और क्या बढ़ा है, पता नहीं।’’ उन्हें लाया मैं अपनी गरज से था, इसलिए डरा-डरा सा रहता था। उनके आराम और सुख-सुविधा की तर$फ मेरी नर लगी रहती। वे तनिक ऊब के साथ बोले, मुंह ठंड से फट गया है। बाजार में चक्कर काट रहा था वैसलिन खरीदने के लिए। जंगली लोग उसका नाम ही नहीं जानते! अजब-गब देश है यह। पतली रजाई मजे से ओढक़र करवट फेरकर वे सो गये। इसके बाद चैन से सोने के पहले एक बार बोले, बाघ अगर दरवाजे पर हमला करे तो मुझे उठा दीजिएगा। अमलेकगंज से भीमपैड़ी है चौबीस-एक मील पहाड़ी पर। सबेरे के समय जाड़ा पड़ा है, हवा बह रही है ठंडी। पूरा जंगल ठंड से अन्यमनस्क हो उठा है। जाड़े की मीठी धूप अभी भी अमलेकगंज में नहीं उतरी है। पूरब की पर्वत श्रृंखलाओं ने धूप को रोक रखा है बहुत दूर तक। उत्तर और पश्चिम में अंधेरे से ढंके जंगलों में खास कुछ दिखता नहीं। पहाड़ के नीचे से बागमती नदी बह रही है। यह नदी नेपाल से बिहार उतरकर लगता है मुंगेर की ओर होकर गंगा में मिली है। ठीक मैं नहीं जानता। मगर उत्तरप्रदेश और बिहार को जल देती चली  है नेपाल की ही नदी। सारदा मेरी, राप्ती, कालीगंडक, त्रिशूलगंगा और गंडक- ये सभी उतर आई है नेपाल से। नेपाल और उत्तर बिहार का पानी पाकर गंगा गौरवगर्विता हुई है।
मोटर गुजर रही है पहाड़ी पथ से। यह पथ अनजान नहीं है। शुक्ना से तिनघरिया, गौहाटी से शिलांग, कालका से शिमला, पिण्डी से मारी, जम्मू से बनिहाल, कोटद्वार से लैन्सडाउन, तिस्ता से दार्जिलिंग, ज्वालामुखी से कांगड़ा या रंगपो से गैंटॉक- ये मेरे सब जाने हुए पथ हैं। मगर फिर भी लगता है, ये मेरे लिए  हमेशा से आश्चर्यजनक हैं। उनके एक-एक पत्थर ने मुझे जैसे युग-युवगों से मोह मंदिर बना रखा है। वे मुझे खींच लाए हैं बार-बार अपने बीच। यहीं मैं मानव-समुदाय की परंपरागत वंशानुक्रमिक देश-देशांतर के भीतर से हजारों वर्षों से उन्हें देखता आ रहा हूं। हर चट्टान ने बात की है मेरे कानों में, इतिहास सुनाया है। उसका रहस्योद्घाटन किया है। बहुत कुछ ज्ञापित कराया है, उससे भी अधिक दिखाया। पहाड़ों की सूनी कन्दराओं में सैवाल से भरी प्राचीन चट्टानों की गंध से मेरा मन कितने दिनों तक अमत्र्य लोक में खोया रहा है। सृष्टि के आदि में जिन दिनों गलित अग्निकुण्ड जमाने लगा था, उन दिनों का मैं प्रथम जीव हूं, जैसे कीट-कीटाणु उसके बाद सरिसृप में मैं हूं; उसके भी बाद मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन आदि अवतारों के मध्य विवर्तन से चला आ रहा हूं मैं युग-युगान्तर से। मैं आया हूं आदिवासियों की चेतना से। वन्य बर्बर मानवेतर प्राणियों के भीतर से मैं गुजरता हुआ अपनी उसी प्राथमिक इतिवृत्त में आ पहुंचा हूं। रामायण में, महाभारत में, आवर्तित होता हुआ यह मैं अंत में आ पहुंचा हूं, आर्य सभ्यता में। हजारों वर्षों की अपनी कहानी मैं सुनता आ रहा हूं। इस हिमालय को गवाह बनाकर उसके उसी पेट में, कोटर में, गहन गुफाओं में, छाया में, मेरी प्राण-सत्ता छिपी है। तभी उस गुल्मलता समाकीर्ण पत्थरों के ढेर में से अपनी अमर आत्मा को बार-बार पाकर मेरा मन रोता है। भटकता हूं। मेरा मन झरनों के किनारे-किनारे प्राचीन पाइन की छाया में। भयावने प्रस्तर के स्तूपों में और गिरिमेखलों के अगल-बगल। मेरा अति-पुरातन प्राण उन ओक-वृक्षों की शाखाओं में और पुष्पित आर्कीड की लताओं में तथा रेडोड्रेनड्रान के गुच्छों में लिपटा रहता है। प्रत्येक कीट-पतंगों, सरिसृप पत्थर-रत्नों के अणु-परमाणुओं में, प्रत्येक झरने के जल-बिन्दुओं में, प्रत्येक वनस्पति की लताओं-पत्रों के शिरा-उपशिराओं में मैं अपने अस्तित्व की उपलब्धियां पाता चला जा रहा हूं।
पुस्तक देवतात्मा हिमालय से साभार
हिन्दी अनुवाद - छेदीलाल गुप्त
प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ