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Monday 20 Nov 2017

अतीत की यात्रा : मुअनजोदड़ो

 

 

 

 

ओम थानवी
मुअनजोदड़ो के बारे में धारणा है कि अपने दौर में वह घाटी की सभ्यता का केन्द्र रहा होगा। यानी एक तरह की राजधानी। माना जाता है यह शहर दो सौ हैक्टर क्षेत्र में फैला था। आबादी कोई पचासी हजार थी। जाहिर है, पांच हजार साल पहले यह आज के ‘महानगर’ की परिभाषा को भी लांघता होगा। दिलचस्प बात यह है कि सिंधु घाटी मैदान की संस्कृति थी, पर पूरा मुअनजोदड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था। ये टीले प्राकृतिक नहीं थे। कच्ची और पक्की दोनों तरह की ईंटों से धरती की सतह को ऊंचा उठाया था, ताकि सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके।
मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सडक़ों और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं। यहां की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था अब भी वहीं है। आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिकाकर सुस्ता सकते हैं। वह कोई खंडहर क्यों न हो, किसी घर की देहरी पर पांव रखकर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर कोई अब भी रहता हो। रसोई की खिडक़ी पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं। शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन भी सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तस्वीरों में मिट्टी के रंग में देखा है। यह सच है कि किसी आंगन की टूटी-फूटी सीढिय़ां अब आपको कहीं ले नहीं जातीं; वे आकाश की तर$फ जाकर अधूरी ही रह जाती हैं। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर खड़े हैं, वहां से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झांक रहे हैं।
सबसे ऊंचे चबूतरे पर खड़ा बौद्ध स्तूप है। मगर वह मुअनजोदड़ो की सभ्यता के बिखरने के बाद एक जीर्ण-शीर्ण टीले पर बना था। कोई पच्चीस फुट ऊंचे चबूतरे पर छब्बीस सदी पहले बनी ईंटों से स्तूप को आकार दिया गया। चबूतरे पर भिक्षुओं के कमरे भी हैं। 1922 में जब राखालदास बंद्योपाध्याय यहां आए, तब वे इसी स्तूप की खोजबीन करना चाहते थे। इसके गिर्द खुदाई शुरू करने के बाद उन्हें भान हुआ कि यहां ईसा पूर्व के निशान हैं। धीरे-धीमे यह खोज विशेषज्ञों को सिंधु घाटी सभ्यता की देहरी पर ले आई।
एक सर्पिल पगडंडी पार कर हम सबसे पहले इसी स्तूप पर पहुंचे। पहली ही झलक ने हमें अपलक कर दिया। इसे नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप कहा गया है। शायद सबसे रोमांचक  भी होगा। न आकाश बदला है, न धरती। पर कितनी सभ्यताएं, इतिहास और कहानियां बदल गईं। ठहरे हुए लैंडस्केप में हजारों साल से लेकर पलभर पहले तक की धडक़न बसी हुई है। इसे देखकर सुना जा सकता है। भले  ही किसी जगह के बारे में हमने कितना पढ़-सुन-रखा हो, तस्वीरें या वृत्तचित्र देखे हों, देखना अपनी आंख से देखना है। बाकी सब आंख का झपकना है। जैसे यात्रा अपने पांव चलना है। बा$की सब $कदम-ताल है।
मौसम जाड़े का था, पर दुपहर की धूप बहुत कड़ी थी। सारे आलम को जैसे एक फीके रंग में रंगने की कोशिश करती हुई। यह इलाका राजस्थान से बहुत मिलता-जुलता है। रेत के टीले नहीं हैं। पर खेत हरे हैं। बा$की खुला आकाश और सूना परिवेश। धूल, बबूल। ज्य़ादा गरमी। मगर यहां की धूप का मिजाज जुदा है। राजस्थान की धूप पारदर्शी है। सिंध की धूप चौंधियाती है। तस्वीर उतारते वक्त़ आप कैमरे में जरूरी पुर्जे न घुमाएं तो ऐसा जान पड़ेगा, जैसे दृश्यों के रंग उड़े हुए हों।
पर इससे एक $फायदा हुआ। हमें हर दृश्य पर नजरें दुबारा फिरानी पड़तीं। इस तरह  बार-बार निहारें तो दृश्य ज़ेहन में ठहर जाते हैं। जैसे तस्वीर देखकर उनकी याद ताजा करने की जरूरत शायद कभी न पड़े। स्तूप वाला चबूतरा मुअनजोदड़ो के सबसे $खास हिस्से के एक सिरे पर स्थित है। इस हिस्से को पुरातत्व के विद्वान ‘गढ़’ कहते हैं। चारदीवारी के भीतर ऐतिहासिक शहरों के सत्ता-केन्द्र अवस्थित होते थे, चाहे वह राजसत्ता हो या धर्मसत्ता। बा$की शहर गढ़ से कुछ दूर बसे थे। क्या यह रास्ता भी दुनिया को मुअनजोदड़ो ने दिखाया?
मुअनजोदड़ो की सभी अहम-और अब दुनियाभर में प्रसिद्ध- इमारतों के खंडहर, चबूतरे के पीछे यानी पश्चिम में हैं। इनमें ‘प्रशासनिक’ इमारतें, सभाभवन, ज्ञानशाला और कोठार हैं। वह आनुष्ठानिक कुण्ड या स्नानागार भी जो सिंधु घाटी सभ्यता के अद्वितीय वास्तुकौशल को स्थापित करने के लिए अकेला ही का$फी माना जाता है। असल में यहां एक निर्माण है जो अपने मूल स्वरूप के बहुत नजदीक बचा रह सका है। बा$की इमारतें इतनी उजड़ी हुई हैं कि कल्पना और बरामद चीजों के जोड़ से उनके उपयोग का अंदाजा भर लगाया जा सकता है।
मुअनजोदड़ो नगर नियोजन की अनूठी मिसाल है: इस जुमले का मतलब आप बड़े चबूतरे से नीचे की तरफ देखते हुए सहज ही भांप सकते हैं। इमारतें भले खंडहरों में तब्दील हो चुकी हों, मगर ‘शहर’ की सडक़ों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। यहां की कमोबेश सारी सडक़ें सीधी हैं। या फिर आड़ी। वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ‘नियोजन’ बहुत मिलता है। लेकिन वह रहन-सहन को नीरस ही बनाता है। शहरों में नियोजन के नाम पर भी हमें अराजकता ज्यादा हाथ लगती है। ब्रासीलिया या चंडीगढ़ और इस्लामाबाद ‘ग्रिड’ शैली के शहर हैं जो आधुनिक नगर नियोजन के प्रतिमान ठहराए जाते हैं। लेकिन उनकी बसाहट शहर के खुद विकसने का कितना अवकाश छोड़ती है, इस पर बड़ी शंका पैदा होती है।
मुअनजोदड़ो की साक्षर सभ्यता एक सुसंस्कृत समाज की स्थापना थी, लेकिन उसमें नगर नियोजन और वास्तुकला की आ$िखर कितनी भूमिका थी? स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ‘गढ़’ है और ठीक सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती। उसके पीछे पांच किलोमीटर दूर सिंधु नदी बहती है। पूरब की इस बस्ती से दक्षिण की तरफ नजर दौड़ाते हुए पूरा पीछे घूम जाएं तो आपको मुअनजोदड़ो के खंडहर हर जगह दिखाई देंगे। दक्षिण में जो टूटे-फूटे घरों का जमघट है, वह कामगारों की बस्ती है। कहा जा सकता है, इतर वर्ग की। सम्पन्न समाज में वर्ग भी होंगे। लेकिन क्या निम्न वर्ग वहां नहीं था? कयास लगाया गया है कि निम्न वर्ग के घर इतनी मजबूत सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पांच हजार साल तक टिक सके। होंगे तो उनकी बस्तियां और दूर रही होंगी। यह भी है कि सौ साल में इस इलाके के एक तिहाई हिस्से की खुदाई ही हो पाई है। अब वह भी बंद है।
हम पहले स्तूप के टीले से कुण्ड के विहार की दिशा में उतरे। दायीं तरफ एक लम्बी गली दिखती है। इसके आगे कुण्ड है। पता नहीं सायास है या संयोग कि धरोहर के प्रबंधकों ने उस गली का नाम दैव मार्ग (डिविनिटि स्ट्रीट) रखा है। माना जाता है कि उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग था। किसी छोटे स्विमिंग-पूल की-सी शक्ल वाला कुण्ड $करीब चालीस $फुट लम्बा और पच्चीस फुट चौड़ा है। गहराई सात फुट। कुण्ड में उत्तर और दक्षिण में सीढिय़ां उतरती हैं। इसके तीन तर$फ कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पांत में आठ स्नानाघर हैं। इनमें किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता। सिद्ध वास्तुकला का यह भी एक उदाहरण है। इस कुण्ड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुण्ड का पानी रिस न सके और बाहर का ‘अशुद्ध’ पानी कुण्ड में न आए, इसके लिए कुण्ड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ हैा। पाश्र्व की दीवारों के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है, जिसमें रिसाव रोकने के लिए प्राकृतिक डामर का प्रयोग है। कुण्ड में पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआं है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआं है। इसे भी कुण्ड के आनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। कुण्ड से पानी को बहाने के लिए नालियां हैं। खासियत यह है कि ये भी पक्की ईंटों से बनी हैं और उनसे ढंकी भी हैं।
पक्की और आकार में समरूप धूसर ईंटें सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्ट पहचान मानी ही गई हैं, ढंकी हुई नालियों का उल्लेख भी पुरातात्विक विद्वान और इतिहासकार जोर देकर करते हैं। पानी-निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के आदि-इतिहास में नहीं मिलता। कुण्ड के बाद हमने ‘गढ़’ का फेरा लगाया। कुण्ड के दूसरी तर$फ विशाल कोठार है। कर के रूप में हासिल अनाज शायद यहां जमा किया जाता था। इसके निर्माण रूप-खासकर चौकियों और हवादारी-को देखकर ऐसा कयास लगाया गया है। यहां नौ-नौ चौकियों की तीन कतारें हैं। उत्तर में एक गली है जहां बैलगाडिय़ों का- जिनके प्रयोग के साक्ष्य मिले हैं- ढुलाई के लिए आवागमन होता होगा। ठीक इसी तरह का कोठार हड़पप्पा में भी पाया गया है।
यह जगजाहिर है कि सिंधु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं, उन्नत खेती भी होती थी। बरसों यह माना जाता रहा कि सिंधु घाटी के लोग अन्न उपजाते नहीं थे, उसका आयात करते थे। नई खोज ने इस ख्य़ाल को निर्मूल साबित किया है। बल्कि अब कुछ विद्वान मानते हैं कि यह मूलत: खेतिहर और पशुपालक सभ्यता थी। लोहा तब नहीं था। पर पत्थर और तांबें की बहुतायत थी। पत्थर सिंध में था। तांबे की खानें राजस्थान की तरफ थीं। इनके उपकरण खेती-बाड़ी में प्रयोग किए जाते थे। जबकि मिस्र और सुमेर में चकमक और लकड़ी के उपकरण इस्तेमाल होते थे।
इतिहासकार इर$फान हबीब के मुताबि$क यहां के लोग रबी की फसल लेते थे। कपास, गेहूं, जौ, सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई में मिले हैं। वह सभ्यता का तर युग था, जो धीमे-धीमे सूखे में ढल गया।
विद्वानों का मानना है कि यहां ज्वार, बाजरा और रागी की फसल भी होती थी। लोग खजूर, खरबूजे और अंगूर उगाते थे। झाडिय़ों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती होती थी। कपास को छोडक़र बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा गया है। कपास के बीज भले नहीं, पर सूती कपड़ा मिला है। वह दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। दूसरा सूती कपड़ा तीन हजार ईसा पूर्व का है, जो जाडर्न में मिला। मुअनजोदड़ो में सूत की कताई-बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी। रंगाई का एक छोटा कारखाना खुदाई में माधोस्वरूप वत्स को मिला था। छालटी (लिनन) और ऊन कहते हैं यहां सुमेर से आयात होते थे। शायद सूत उनको निर्यात होता हो, जैसे बाद में सिंध से मध्य एशिया और यूरोप को सदियों हुआ। प्रसंगवश, सुमेरी यानी मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मुअनजोदड़ो के लिए ‘मेलुआ’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
कुण्ड के उत्तर-पूर्व में एक बहुत लम्बी-सी इमारत के अवशेष हैं। इसके बीचोबीच बड़ा दालान है। तीन तरफ बरामदे हैं। इनके साथ कभी छोटे कमरे रहे होंगे। पाकिस्तानी पुरातत्व विभाग के दक्षिण केन्द्र के निदेशक एहसान नदीम का कहना है कि धार्मिक अनुष्ठानों में ज्ञानशालाएं सटी हुई होती थीं; उस नजरिए से इसे ‘कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स’ माना जा सकता है। दक्षिण में एक और भग्न इमारत है। इसमें बीस खम्भों वाला एक बड़ा हॉल है। नदीम के मुताबिक यह राज्य सचिवालय, सभा-भवन या कोई सामुदायिक केन्द्र रहा होगा।
गढ़ की चारदीवारी लांघकर हम बस्तियों की तरफ बढ़े। ये ‘गढ़’ के मुकाबले छोटे टीलों पर बनी हैं, इसलिए इन्हें ‘नीचा नगर’ कहकर भी पुकारा जाता है। खुदाई की प्रक्रिया में टीलों का आकार घट गया है। कहीं-कहीं वे फिर जमीन से जा मिले हैं और बस्ती के कुएं, लगता है, धरती छोडक़र मीनारों की शक्ल में बाहर निकल आए हैं।
पूरब की बस्ती ‘रईसों की बस्ती’ है। हालांकि आज के युग में पूरब की बस्तियां $गरीबों की बस्तियां मानी जाती हैं। मुअनजोदड़ो इसका उलट था। यानी बड़े घर, चौड़ी सडक़ें, ज्यादा कुएं। मुअनजोदड़ों के सभी खंडहरों को खुदाई कराने वाले पुरातत्ववेत्ताओं का संक्षिप्त नाम दे दिया गया है। जैसे ‘डीके’ क्षेत्र- यानी दीक्षित काशीनाथ की खुदाई। यों यह ‘डीके’ क्षेत्र ही दोनों बस्तियों में सबसे महत्वपूर्ण है। शहर की मुख्य सडक़ यहीं पर है। यह बहुत लम्बी सडक़ है। कभी पूरे शहर को नापती होगी। अब आधा मील बची है। इसकी चौड़ाई तैंतीस फुट है। मुअनजोदड़ो से तीन तरह के वाहनों के साक्ष्य मिले हैं। इनमें सबसे चौड़ी बैलगाड़ी रही होगी। इस सडक़ पर दो बैलगाडिय़ां एक साथ आसानी से आ-जा सकती हैं। सडक़ वहां पहुंचती है, जहां कभी ‘बाजार’ था।
इस सडक़ के दोनों ओर घर हैं। लेकिन सडक़ की ओर सारे घरों की सि$र्फ पीठ दिखाई देती है। यानी कोई घर सडक़ पर नहीं खुलता; उनके प्रवेश-द्वार अंदर गलियों में है। दिलचस्प संयोग है कि चंडीगढ़ में ठीक यही शैली साठ साल पहले ली कार्बूजिए ने इस्तेमाल की। वहां भी कोई घर मुख्य सडक़ पर नहीं खुलता। आपको किसी के घर जाने के लिए पहले मुख्य सडक़ से सेक्टर के भीतर दाखिल होना पड़ता है; फिर घर की गली में, फिर घर में। क्या ली कार्बूजिए ने यह सीख मुअनजोदड़ो से ली? कहते हैं, कविता में से कविता निकलती है। कलाओं की तरह वास्तुकला में भी कोई प्रेरणा चेतन-अवचेतन में ऐसे ही स$फर नहीं करती होगी?
ढंकी हुई नालियां मुख्य सडक़ के दोनों तर$फ समांतर दिखाई देती हैं। बस्ती के भीतर भी इनका यही रूप है। हर घर में एक स्नानघर है। घरों के भीतर से पानी या मैले की नालियां बाहर हौदी तक आती हैं और फिर नालियों के जाल से जुड़ जाती हैं। कहीं-कहीं वे खुली हैं, पर ज्यादातर  बंद हैं। स्वास्थ्य के प्रति मुअनजोदड़ोवासियों के सरोकार की यह उम्दा मिसाल है। अमत्र्यसेन कहते हैं कि मुअनजोदड़ो के चार हजार साल बाद तक अवजल-निकासी की ऐसी व्यवस्था देखने में नहीं आई।
बस्ती के भीतर छोटी सडक़ें हैं। उनसे छोटी गलियां भी। छोटी सडक़ें नौ से बारह फुट तक चौड़ी हैं। इमारतों से पहले जो चीज दूर से ध्यान खींचती है, वह है कुओं का प्रबंधन। ये कुएं भी एक ही आकार की पकी हुई ईंटों से बने हैं। इरफान हबीब कहते हैं, सिंधु घाटी सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है, जो कुएं खोदकर भू-जल तक पहुंची। उनके मुताबिक केवल मुअनजोदड़ो में सात सौ के करीब कुएं थे। बड़े व्यापारियों और किसानों के आंगन में शायद अपने कुएं रहे होंगे। नदी, कुएं, कुण्ड और बेजोड़ जल-निकासी। क्या सिंधु घाटी सभ्यता को हम जल संस्कृति कह सकते है?
मुअनजोदड़ो की बड़ी बस्ती में पुरातत्वी काशीनाथ दीक्षित के नाम पर दो हल्के हैं। पहला ‘डीके-जी’ है। इसके घरों की दीवारें ऊंची और मोटी हैं। मोटी दीवार का अर्थ यह लगाया जाता है कि उस पर दूसरी मंजिल भी रही होगी। कुछ दीवारों में छेद हैं जो संकेत देते हैं कि दूसरी मंजिल उठाने के लिए शायद यह शहतीरों की जगह रही हो। सभी घर ईंट के हैं। एक ही आकार की ईंटें- 1:2:4 के अनुपात की। सभी भट्ठी में पकी हुईं। हड़प्पा से हटकर, जहां पक्की और कच्ची ईंटों का मिला-जुला निर्माण उजागर हुआ है। मुअनजोदड़ो में पत्थर का प्रयोग मामूली हुआ। हमें कहीं-कहीं सि$र्फ नालियां अनगढ़ पत्थरों से ढंकी दिखाई दीं।
इन घरों में दिलचस्प बात यह है कि सामने की दीवार में केवल प्रवेश-द्वार बना है, कोई खिडक़ी नहीं है। खिड़कियां शायद ऊपर की मंजिल में हुआ करती हों। बड़े घरों के भीतर आंगन के चारों तरफ बने कमरों में खिड़कियां जरूर हैं। बड़े आंगन वाले घरों के बारे में समझा जाता है कि वहां कुछ उद्यम होता होगा। जैसे कुम्हारी का काम या कोई धातु-कर्म। हालांकि सभी घर खंडहर हैं और दिखाई देने वाली चीजों से हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं। छोटे घर हैं और बड़े भी। लेकिन सब एक कतार में हैं। ज्यादातर घरों का आकार तकरीबन तीस-गुणा-तीस फुट का होगा। कुछ इससे दुगने और तिगुने आकार के हैं। इनकी वास्तु शैली कमोबेश एक-सी प्रतीत होती है। व्यवस्थित और नियोजित शहर में शायद इसका भी कोई कायदा नगरवासियों पर आयद हो। एक घर को ‘मुखिया’ का घर कहकर पुकारा जाता है। इसमें दो आंगन और करीब बीस कमरे हैं। डीके-बी और सी हल्का आगे पूरब में है। दाढ़ी वाले ‘याजक-नरेश’ की मूर्ति इसी तरफ के एक घर में मिली थी। डीके-जी की ‘मुख्य सडक़’ पर दक्षिण की ओर बढ़े तो डेढ़ फर्लांग की दूरी पर ‘एचआर’ हलका है। सडक़ उसे दो भागों में बांट देती है। यह हल्का हेराल्ड हरग्रीव्ज के नाम पर है, जिन्होंने 1924-25 में राखालदास बंद्योपाध्याय के बाद खुदाई करवाई थी। यहीं पर एक बड़े घर में कुछ कंकाल मिले थे, जिन्हें लेकर कई तरह की कहानियां इतिहास में बनती-बिगड़ती रहीं। प्रसिद्ध ‘नर्तकी’ शिल्प भी यहीं एक छोटे घर की खुदाई में निकला। एक बड़ा घर है जिसे उपासना-केन्द्र समझा जाता है। इसमें आमने-सामने की दो चौड़ी सीढिय़ां ऊपर की (ध्वस्त) मंजिल की तरफ जाती हैं। सबसे पहले भारतीय पुरातत्व विभाग के आ$िखरी-और पाकिस्तान के पहले-महानिदेशक मार्टिमर वीलर ने इसे ‘टेंपल’ की संज्ञा दी थी। पश्चिम में- गढ़ी के ठीक पीछे- माधोस्वरूप वत्स के नाम पर वीएस हिस्सा है। यहां वह ‘रंगरेज का कार$खाना’ भी लोग चाव से देखते हैं, जहां जमीन में ईंटों के गोल गड्ढे उभरे हुए हैं। अनुमान है कि इनमें रंगाई के बड़े बर्तन रखे जाते थे। दो कतारों में सोलह छोटे एक-मंजिला मकान हैं। एक $कतार मुख्य सडक़ पर है, दूसरी पीछे की छोटी सडक़ की तरफ। सबमें दो-दो कमरे हैं। स्नानघर यहां भी सब घरों में हैं। बाहर बस्ती में कुएं सामूहिक प्रयोग के लिए हैं। ये कर्मचारियों या कामगारों के घर रहे होंगे।
मुअनजोदड़ो में कुओं को छोडक़र लगता है, जैसे सब कुछ चौकोर या आयताकार हो। नगर की योजना, बस्तियां, घर, कुण्ड, बड़ी इमारतें, ठप्पेदार मुहरें, चौपड़ का खेल, गोटियां तौलने के बाट आदि सब। छोटे घरों में छोटे कमरों के खंडहर समझ में आते हैं। पर बड़े घरों में छोटे कमरे देखकर अचरज होता है। इसका एक अर्थ तो यह लगाया गया है कि शहर की आबादी काफी रही होगी। दूसरी तरफ यह विचार सामने आया है कि बड़े घरों में निचली (भूतल) मंजिल में नौकर-चाकर रहते होंगे। ऐसा अमेरिकी नृशास्त्री ग्रेगरी पोसेल का मानना है। बड़े घरों के आंगन में चौड़ी सीढिय़ां हैं। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढिय़ां नहीं है। शायद यहां लकड़ी की  सीढिय़ां रही हों, जो कालान्तर में नष्ट हो गई। संभव है ऊपर की मंजिल में ज्यादा खिड़कियां, झरोखे और साज-सज्जा रही हो। लकड़ी का इस्तेमाल भी बहुत संभव है पूरे घर में होता हो। कुछ घरों में बाहर की तरफ सीढिय़ों के संकेत हैं। यहां शायद ऊपर और नीचे अलग-अलग परिवार रहते होंगे। छोटे घरों की बस्ती में छोटी संकरी सीढिय़ां हैं। उनके पायदान भी ऊंचे हैं। ऐसा जगह की तंगी की वजह से होता होगा। गौर किया कि मुअनजोदड़ो के किसी घर में खिड़कियों या दरवाजों पर छज्जों के चिन्ह नहीं हैं। गरम इलाकों के घरों में छाया के लिए तो यह आम प्रावधान होता है। क्या उस वक्त यहां इतनी कड़ी धूप नहीं पड़ती होगी? मुझे मुअनजोदड़ो की जानी-मानी मुहरों पर अँकित पशुओं की आकृतियों का ख्याल आया। शेर, हाथी या गैंडा इस मरु-भूमि में कैसे हो सकते हैं? क्या उस वक्त यहां जंगल थे? यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि यहां अच्छी खेती होती थी। पुरातत्वी शीरीन रत्नागर का कहना है कि सिंधु-वासी कुओं से सिंचाई कर लेते थे। दूसरे, मुअनजोदड़ो की किसी खुदाई में नहर होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। यानी बारिश उस काल में काफी होती होगी। क्या बारिश घटने और कुओं के अत्यधिक इसेतमाल से भू-गर्भ जल भी पहुंच से दूर चला गया? क्या पानी के अभाव में यह इलाका उजड़ा और उसके साथ सिंधु घाटी की सभ्यता भी?
मुअनजोदड़ो में उस रो हवा बहुत तेज बह रही थी। किसी बस्ती के टूटे-फूटे घर में दरवाजे या खिडक़ी के सामने से हम गुजरते तो सांय-सांय की ध्वनि में हवा की लय साफ पकड़ में आती थी। वैसे ही जैसे सडक़ पर किसी वाहन से गुजरते हुए किनारे की पटरी के अंतरालों में रह-रहकर हवा के लयबद्ध थपेड़े सुनाई पड़ते हैं। सूने घरों में हवाएं और ज्यादा गूंजती हैं। इतनी कि कोनों का आंधियारा भी सुनाई पड़े। यहां एक घर से दूसरे घर में जाने के लिए आपको वापस बाहर नहीं आना पड़ता। आखिर सब खंडहर हैं। अब कोई घर जुदा नहीं है। एक घर दूसरे में खुलता है। दूसरा तीसरे में। जैसे पूरी बस्ती एक बड़ा घर हो।
लेकिन घर एक नक्शा ही नहीं होता। उसका एक चेहरा और संस्कार होता है। भले ही वह पांच हजार साल पुराना घर क्यों न हो। हम में हर कोई वहां पांव आहिस्ता उठाते हुए एक घर से दूसरे घर में बेहद धीमी गति से दाखिल होता था। मानो मन में अतीत को टटोलने की जिज्ञासा ही न हो, किसी अजनबी घर में अनधिकार चहल-कदमी का अपराध-बोध भी हो। सब जानते थे यहां अब कोई बसने नहीं आएगा। लेकिन यह मुअनजोदड़ो के पुरातात्विक अभियान की खूबी थी कि मिट्टी में इंच-दर-इंच कंघी कर इस कदर शहर, उसकी गलियों और घरों को ढूंढा और सहेजा गया है कि एक अहसास हर वक्त साथ रहता है : कल कोई यहां बसता था।
  पुस्तक  मुअनजोदड़ो से साभार
        प्रकाशक - वाणी प्रकाशन