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Sunday 19 Nov 2017

अतीत की यात्रा :यूं ही भटकते हुए


मोहन राकेश

एक भिखारिन, अपने बच्चे को छाती से सटाए, होठ उसके गाल पर रखे, अधमुंदी आंखों से फुट-बोर्ड पर लटककर चलती गाड़ी के नीचे उतर गई...।
गाड़ी आवली स्टेशन पर आकर रुक गई।
आवली अर्णाकुलम के पास ही है। किसी ने वहां की नदी के पानी की मुझसे बहुत प्रशंसा की थी। कहा था कि एक बार अवश्य मुझे वहां जाना चाहिए। मैं अपना सामान अर्णाकुलम के होटल में छोडक़र वहां चला आया था।
प्लेटफॉर्म पर उतरकर मैं रेल की पटरी के साथ-साथ चलने लगा। नदी तक जाने के लिए मुझे यही रास्ता बताया गया था। फिर भी दो-एक जगह रुककर मुझे लोगों से पूछना पड़ा। जिस समय नदी के किनारे पहुंचा, एक मल्लाह पार जाने के लिए सवारियों को बुला रहा था। बिना यह सोचे कि पार जाकर क्या होगा, मैं नाव में बैठ गया। पार पहुंचकर मैं किनारे के साथ-साथ चलने लगा। नदी में पानी ज्य़ादा नहीं था। किनारे के उथले पानी में कुछ जगह पशु नहा रहे थे। कुछ जगह पतली ईंटें नावों में भरी जा रही थीं। एक जगह घाट-सा बना था जहां कुछ लोग पानी में डुबकियां लगा रहे थे। सामने पुल था। पुल बहुत ऊंचा था, इसलिए उसके नीचे से गुजरता नदी का पानी बहुत खामोश और उदास न•ार आ रहा था। मैं किनारे के साथ-साथ चलता हुआ पुल के ऊपर पहुंच गया। वहां से नीचे झांकने पर वह पुल मुझे और भी ऊंचा लगा। बहाव के एक तरफ खुली जमीन पर धोबियों ने कपड़े सूखने के लिए फैला रखे थे। सबके सब कपड़े बिलकुल स$फेद थे। उनकी बांहें-टांगे इस तरह फैली थीं कि लगता था वे कपड़े नहीं मनुष्य-शरीर के तरह-तरह के व्यंग्य-चित्र हैं जो स्कूल से लौटते बच्चों ने चाक के चूरे से बना दिए हैं। मैं मन-ही-मन उन बांहों-टांगों को नई-नई व्यवस्था देता कुछ देर वहां खड़ा अपना मनोरंजन करता रहा।  नदी का बहुत बड़ा कैनवास मेरे सामने था। उस हिलते-बदलते  कैनवास में लोग नहा रहे थे, कपड़े धो रहे थे, नावों में ईंटे ले जा रहे थे। पुल की ऊंचाई से देखते हुए लगता था कि जिन्दगी का वह छोटा-सा टुकड़ा, नदी के पानी के साथ, उसी की खामोशी और गति लिए, चुपचाप बहा जा रहा है। मेरा मन होने लगा कि कुछ देर के लिए मैं भी उस कैनवस पर उतर जाऊं- घाट पर कपड़े रखकर नदी के कमर तक गहरे पानी में दो डुबकियां लगा लूं। मैं पुल से नीचे चला गया और का$फी देर बच्चों की तरह घाट पर हाथ रखे उथले पानी में पैर चलाता रहा।
नहा कर निकला, तो मन हो रहा था किसी से बात करूं। ठंडे पानी ने शरीर में स्फूर्ति ला दी थी। मैंने एक मल्लाह से बात करने की कोशिश की, मगर उसमें सफलता नहीं मिलती। भाषा अलग-अलग होने से बात की शुरूआत ही नहीं हो पाई। अगर मुझे कोई खास बात कहनी होती, तो इशारों से भी काम चल सकता था। मगर मेरी इच्छा उस पर मन का कोई भाव प्रकट करने की नहींं, मुंह से बोलकर कुछ कहने की थी। अपनी यात्रा में बहुत कम ऐसे अवसर आए थे जब मुझे अपनी भाषा न जानना उस तरह अखरा हो। मगर उस समय इस बात से मन बहुत उदास हुआ कि मैं वहां अजनबी हूं- इतने लोगों के बीच होकर भी अकेला हूं। इस मजबूरी से कि मैं किसी से बात ही नहीं कर सकता, इतना भी नहीं कह सकता कि पानी बहुत ठंडा है, नहाकर मजा आ गया- मुझे दिनों के बाद घर से दूर होने की चुभन महसूस हुई। धूप में जिस्म सुखाकर कपड़े पहनने तक मैं पुल के कैनवास को देखता रहा। एक ऊंचा मेहराब जो हर चीज को अपनी तरफ खींच रहा था- पानी को, नावों को, लोगों को। दो लडक़े उस मेहराब के ऊपर से पानी की तर$फ झांक रहे थे। उनमें से एक ने पानी में ढेला फेंका। इस बार भी उसी तरह छींटे पड़े। लडक़े दो-एक मिनट यह खेलते रहे। फिर दौड़ते हुए पुल से सडक़ पर चले गए। मेरे पास की कुछ जमीन भी छींटों से भींग गई थी। उससे जो गंध उठ रही थी, वह इतनी परिचित थी कि मेरी अजनबीपन की सहानुभूति कुछ हद तक दूर होने लगी। मैंने गीली मिट्टी को पैर के नाखून से थोड़ा कुरेद दिया, फिर ऊपर की तरफ एक अनजान कच्चे रास्ते पर चल दिया। वह रास्ता घरों के बीच से जाती एक गली-सी थी। एक घर के बरामदे में कुछ बच्चे खेल रहे थे। वहीं पास ही एक स्त्री खरल में चावल पीस रही थी। एक युवक $फर्श पर टांगें फैलाए अखबार पढ़ रहा था। यह उस घर की अपनी दोपहर थी। मुझे अपने उस घर की याद आई जिसमें मेरे बचपन के कई साल गुजरे थे। उस घर की अपनी ही सुबह, अपनी ही दोपहर और अपनी ही शाम होती थी। सुबह शाम जाने की हलचल, दोपहर को रंगीन रोशनदानों से आती धूप की उदासी और शाम को बाहर बैठक में पिताजी के दोस्तों का जमाव। वह सुबह, दोपहर और शाम हमारे घर की संस्कृति थी। अब जिन घरों के पास से गुजर रहा था, उनमें से हर घर की भी अपनी एक अलग संस्कृति थी- रो•ामर्रा के छोटे-छोटे टुकड़ों से बनी संस्कृति जो उस घर के हर व्यक्ति के आज और कल को किसी न किसी रूप में निर्धारित कर रही थी- साथ उस पूरे समूह के आज और कल को जिसकी व्यापक संस्कृति का निर्माण इन छोटी-छोटी संस्कृतियों के योग से होता है। आगे खेत थे। खेतों के साथ मिट्टी की ऊंची मेड़ें बनी थीं। बरसात से उनकी रक्षा के लिए उन्हें नारियल के पत्तों की चटाइयों से ढंका गया था। सामने मैदान की खुली धूप में एक मजदूर ईंटें तोड़ रहा था। पास ही तीन-चार ढांचों जैसे बच्चे, जिनके सिर उनके शरीरों की तुलना में काफी बड़ी लगते थे, एक-दूसरे पर रोड़ें फेंक रहे थे। उनसे कुछ हटकर एक स्त्री अपना सूखा स्तन बच्चे के मुंह में दिए बार-बार उसके गालों की रुखी चमड़ी को चूम रही थी। यह उस परिवार की अपनी दोपहर थी- एक और छोटी-सी संस्कृति!
रात को अर्णाकुलम् में वहां के आम्बलम् का वार्षिकोत्सव था। उस अवसर पर आम्बलम् को चारों ओर से दीयों से सजाया गया था। अंदर देवालय के चारों ओर की जालियां अपने एक-एक झरोखे में टिमटिमाते दीयों की रोशनी में मोम की बनी-सी लग रही थीं। देवालय के सामने का स्वर्ण-स्तंभ, कांपती लौ के नगीनों से जड़ा, किरणों की डोरियों में गूंथा, अपने और उत्सव के महत्व का विज्ञापन कर रहा था। स्तंभ के आसपास की भीड़ में कुछ देर धक्के खाने के बाद मैं आम्बलम् के पिछले भाग की ओर चला गया। उधर उस समय और ज्यादा हलचल थी। तीन बड़े-बड़े हाथी सामने आ रहे थे। लोगों की बहुत बड़ी भीड़ उन्हें घेरे थी। हाथी सुनहरे आभूषणों से सजे थे और उनके हौदों के ऊपर भी सुनहरे छत्र लगे थे। बीच के हाथी की पीठ पर मंदिर के देवता को लाया जा रहा था। वहां लोगों से पता चला कि देवता को कई दिन इसी तरह हाथी की पीठ पर मंदिर के चारों ओर घुमाया जाता है। वह रात आराट् की थी- अर्थात् देवता को जलस्नान कराने की। आराट् के साथ वह उत्सव समाप्त हो जाता था।
हाथियों के आगे तीन आदमी चार-चार जोतों की मशालें लिए चल रहे थे। साथ में पंचवाद्यम् था। लोगों में पंचवाद्यम् सुनने का बहुत उत्साह था। बजाने वाले भी बहुत मगन होकर बजा रहे थे- विशेष रूप से शहनाई वाले।
रास्ते में कई घरों के आगे सजी हुई वेदिकाएं बनी थीं। हर वेदिका के पास हाथियों को रोककर अक्षत्, चंदन आदि से उनकी पूजी की जाती। ज्यों-ज्यों हाथी मंदिर के पास पहुंचे रहे थे, उनके आसपास भीड़ बढ़ती जा रही थी। भीड़ में प्राय: सभी स्त्री-पुरुष नंगे पांव थे। अधिकांश स्त्रियों ने बड़े ढंग से केशों में फूल सजा रखे थे। फूल सजाने की उनकी अलग-अलग शैलियां थी। कुछ ने अपनी साड़ी के साथ फूलों के रंग का मिलान कर रखा था, कुछ ने केशो फूलों की अल्पनाएं बना रखी थीं। हाथी मंदिर की सीमा के पास आ पहुंचे थे, तो लोगों का उत्साह दुगुना-तिगुना बढ़ गया। जोर-शोर से पटाखे चलाए जाने लगे और आतिशबाजी छोड़ी जाने लगी। आराट् का समय बहुत पास आ गया था।
आसपास सभी लोग किसी तरह मंदिर के अंदर पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे थे।  भीड़ के उस दबाव में सांस लेना मुश्किल हो रहा था, इसलिए उल्टा संघर्ष करके मैं किसी तरह भीड़ से बाहर निकल आया। सडक़ पर अब इक्का-दुक्का लोग ही थे। जो मेरी तरह भीड़ से बाहर निकल आए थे और एक तरफ खड़े होकर मंदिर से छूटती आतिशबाजी के रंग देख रहे थे। कुछ मजदूर थे जो अब उन वेदिकाओं को तोड़ रहे थे जिनमें थोड़ी पहले पूजा हुई थी। मैं भीड़ के बाहर आकर अभी दस कदम भी नहीं चला था कि न जाने किस अंधेरे कोने से निकलकर एक व्यक्ति मेरे सामने आ खड़ा हुआ। ‘‘मिस्टर, तुम मुझे कुछ दे सकते हो?’’ उसने अंग्रेजी में कहा। मैं थोड़ा अचकचाकर अपनी जगह पर रुक गया। उस आदमी को मैंने सिर से पांव तक देखा। उसके सिर के बाल सड़ी हुई घास की तरह थे। कई दिनों की बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी एक खुरदुरे बुरुश-जैसी लग रही थी। फटी हुई कमीज की एक कन्नी नीचे लटक रही थी। बांह पर फटा एक कम्बल था जिसे वह बच्चे की तरह छाती से चिपकाए था। नीचे उसने कुछ भी नहीं पहन रखा था।
‘‘तुम्हें क्या चाहिए?’’ मैंने उससे पूछा।
‘‘इकन्नी, दुअन्नी या जो भी तुम दे सको। मैं एक बार से ज्यादा किसी से नहीं मांगता। उसे देना होता है, दे देता है। नहीं देना होता, नहीं देता।’’
वह अच्छी अंग्रेजी बोल रहा था। मैंने सोचा कि कम से कम मैट्रिक तक तो वह पढ़ा ही होगा। ‘‘तुम भीख क्यों मांग रहे हो?’’ मैंने उससे कहा। ‘‘बातचीत से तो तुम खासे पढ़े-लिखे जान पड़ते हो। अंग्रेजी इतनी अच्छी बोल लेते हो...।’’
‘‘मैं तीन भाषाएं इतनी ही अच्छी बोल लेता हूं,’’ वह बोला। ‘‘अंग्रेजी संस्कृत और तमिल।’’ फिर तमिल में कुछ कह कर उसने कालिदास का एक श्लोक पूरा दोहरा दिया- ‘‘रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्...।’’ श्लोक पूरा करते ही उतावले स्वर में बोला, ‘‘बताओ तुम मुझे कुछ दे सकते हो या नहीं?’’
‘‘देने में मुझे एतराज नहीं,’’ मैंने कहा। ‘‘पर मैं जानना चाहता हूं कि तुम पढ़े-लिखे होकर भी भीख क्यों मांग रहे हो?’’
उसकी आंखों में एक चुभन आ गई। ‘‘मैं बेकार हूं और भूखा हूं’’, वह वितृष्णा और कड़वाहट के साथ बोला।
‘‘फिर भी पढ़ा-लिखा आदमी कुछ-न-कुछ काम तो...’’
वह सहसा तिरस्कार-पूर्ण स्वर में हंसा और आगे चल दिया। उस स्वर से मुझे लगा जैसे चलते-चलते उसने मेरे गाल पर थप्पड़ मार दिया हो।
आम्बलम् में बहुत-से पटाखों के साथ छूटने के उत्तान स्वर से मुझे लगा कि आराट् का क्षण आ पहुंचा है।
मैंने एक बार अपने आसपास देख लिया। वह व्यक्ति अंधेरे में न जाने कहां गुम हो गया था।
पुस्तक आखिरी चट्टान तक से साभार
प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन