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Saturday 18 Aug 2018

अतीत की यात्रा : जी.एफ.लेकी (1790 ई.)

 शंभुदयाल गुरु
अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में एक और अंग्रेज यात्री भारत आया। इसका नाम था लेकी। एक ओर जहां मध्यप्रदेश क्षेत्र की यात्रा के वृत्तांतों का भरमार है, छत्तीसगढ़ और विंध्य प्रदेश ऐसे इलाके हैं, जहां से होकर बहुत कम यात्री गुजरे हैं। इसका मूल कारण यह है कि इन क्षेत्रों का उत्तर तथा दक्षिण भारत की राजनीति से सीधा वास्ता नहीं पड़ा। विंध्य और सतपुड़ा की दुर्गम पहाडिय़ों और सघन वनों से आच्छादित ये क्षेत्र, शताब्दियों तक राजनीतिक आपा-धापी से सर्वथा दूर रहे हैं। आवागमन के मार्गों और साधनों का यहां अभाव रहा है। इसलिए लेकी द्वारा इन क्षेत्रों की यात्रा अत्यधिक महत्व की है। लेकी ने सन् 1790 में कलकत्ता से नागपुर तक की यात्रा उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के मार्गों से की थी। कुछ समय नागपुर रुकने के बाद वह सिवनी, जबलपुर होता हुआ बघेलखंड क्षेत्र से बनारस चला गया। उसने इन क्षेत्रों के अनेक स्थानों, नदी-पहाड़ों, खेती-बाड़ी, लोगों के रहन-सहन, राजनीतिक परिस्थितियों आदि का बहुत रोचक वर्णन किया गया है।  सौजन्य- शंभुदयाल गुरु, पूर्व संचालक, मध्यप्रदेश जिला गजेटियर्स एवं म.प्र. राजकीय अभिलेखागार
रायपुर जिला
उड़ीसा से संबलपुर-रायपुर राजमार्ग से लेकी ने मई, 1790 में मध्यप्रदेश के रायपुर जिले में प्रवेश किया। उसने बलसोड़ा ग्राम से दो मील दूर महानदी पार की। वह लिखता है कि उस स्थान पर महानदी का पाट 300 गज चौड़ा था। वहां से वह आरंग होता हुआ रीवा ग्राम पहुंचा।
आरंग तथा रीवा ग्राम
लेकी ने लिखा है कि आरंग एक बड़ा और समृद्ध नगर था, जहां अनेक व्यापारी तथा जुलाहे निवास करते थे। आरंग से आगे रीवा ग्राम में आम का एक विस्तृत बगीचा था। अंग्रेजी यात्री ने रीवा ग्राम में आम के बगीचे में एक विशाल तालाब के किनारे पहाड़ डाला । यहां उसे लोगों ने बताया कि महानदी का उद्गम 120 मील दक्षिण-पूर्व में सिहावा के जंगल में एक पहाड़ी से होता है।
नवागांव
रीवा से लेकी उसी रास्ते पर आगे बढ़ा और 6 मील आगे वह नवागांव पहुंचा। उस समय अंधेरा घिरा हुआ था, फिर भी उसने देखा कि नवागांव में एक बड़ी संख्या में पेड़ और तालाब भी था। उसने लिखा है कि वह एक मैदानी इलाके से यात्रा कर रहा था और वहां अनेक ग्राम थे, परन्तु उनमें से कोई ऐसा नहीं था जो एक बड़े यात्री दल को पर्याप्त पानी अथवा विश्राम-स्थल की सुविधा प्रदान कर सके।
रायपुर शहर
दि. 18 मई, 1770 को लेकी रायपुर पहुंचा। उसने लिखा है कि रायपुर एक बड़ा शहर था और अनेक व्यापारी तथा धनाढ्य व्यक्ति वहां निवास करते थे। वहां उसने एक किला देखा जिसकी दीवारों का नीचे का भाग पत्थरों से तथा ऊपरी भाग मिट्टी से निर्मित किया गया था। किले में पांच द्वार तथा अनेक बुर्ज थे। रायपुर शहर में उसने एक विशाल तालाब भी देखा जो चारों ओर से पक्का बंधा हुआ था, परन्तु उसका पानी खराब था।
रतनपुर राज्य
रतनपुर राज्य, जिसमें छत्तीसगढ़ का अधिकांश क्षेत्र शामिल था। कल्चुरियों के शासनकाल में एक समृद्धशाली राज्य था। लेकी ने लिखा है कि रतनपुर एक बहुत अच्छा प्रदेश था और धान की भरपूर खेती के कारण इसे भारत के इस क्षेत्र का वर्दमान होने की संज्ञा दी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल का वर्दमान वह क्षेत्र है जहां प्रचुर मात्रा में धान की खेती होती है।
लेकी के यात्रा वृत्तांत से हमें यह भी ज्ञात होता है कि नागपुर के भोंसल राजा मूधाजी के भाई बिम्बा जी की विधवा पत्नी उस समय जीवित थी और रतनपुर राज्य में उनके प्रति पूर्ण आदर भाव व्यक्त किया जाता था। शासन की कार्यपालन शक्ति महीपतराव के हाथ में थी। उसने लिखा है कि रायपुर की राजस्व आय, जिसमें सामान ढोने वाले जानवरों पर कर भी शामिल था, कुल 70,000 रुपए तथा रतनपुर की राजस्व आय 1,50,000 रुपए थी।
उसकी लेखनी से रतनपुर राज्य की आर्थिक स्थिति में अवनति का  भी संकेत मिलता है, क्योंकि उसके अनुसार बिम्बा जी के शासनकाल में रतनपुर की आय पांच या छह लाख रुपए थी। इस आश्चर्यजनक आर्थिक अवनति का कारण उसे ज्ञात नहीं हो सका। रतनपुर के निवासी सज्जन थे और उन्होंने यात्रियों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया।
दुर्ग
अगले दिन रायपुर से आठ मील की दूरी पर यात्रियों ने खारून नदी पार की और कुम्हारी गांव पहुंचे। वहां से डोंगरघाट के रास्ते लेकी नागपुर के लिए चल पड़ा। अनेक गांव और नालों को पार करते हुए उसने दुर्ग के किले के पास पड़ाव डाला। दुर्ग को लेकी गांव की संज्ञा देता है। इससे स्पष्ट है कि लगभग 200 वर्ष पूर्व, दुर्ग बहुत छोटा रहा होगा। दुर्ग ग्राम में उसने पान के अनेक बगीचे देखे। इसके डेढ़ सौ मील आगे चलकर उसने शिवनाथ नदी देखी जो ढाई सौ गज चौड़ी थी।
डोंगरगढ़
उसने रास्ते में बड़ी संख्या में ग्राम देखे। लेकी कुछ दिन की यात्रा के बाद छीपा ग्राम होता हुआ डोंगरगढ़ पहुंचा। उसने लिखा है कि डोंगरगढ़ के पहले एक किला था, परंतु किला और गांव दोनों ही उसे खंडहर नजर आए। उसने लिखा है कि डोंगरगढ़ के आसपास की पहाडिय़ां नागपुर को रतनपुर या छत्तीसगढ़ से अलग करती थीं। रतनपुर का राजा ‘राजा छत्तीसगढ़’ कहलाता था।
बंजारीगांव
लेकी जिस रास्ते से चल रहा था वह सीधे नागपुर जाता था, परंतु उस रास्ते पर कोई गांव स्थित नहीं था। इसलिए उसने रास्ता बदल दिया। वह एक दूसरे, बंजारे मार्ग से झूरानाला पहुंचा, जिसमें उस गर्मी के मौसम में भी काफी पानी था। झूरानाला के निकट ही महलडोंगरा गांव था। यात्री महलडोंगरा से आठ मील आगे बंजारी में ठहरे गए। लेकी के सहयात्री फारेस्टर ने जिस पेड़ के नीचे डेरा डाला उसकी शाखाओं से अनेक पुरानी घंटिया लटक रही थीं। ये घंटिया अपनी यात्रा सफल हो जाने पर बंजारों द्वारा काली माता को चढ़ाई जाती थीं। लेकी ने लिखा है कि मैंने भी एक टीन चढ़ाया और उन पर अपने प्रवास की तिथि अंकित कर दी। फारेस्टर ने भी एक टीन चढ़ाया और उस पर अपने प्रवास की तिथि अंकित कर दी। फारेस्टर ने एक बकरे की कुरबानी भी दी। बंजारी गांव एक इतने ऊंचे टीले पर बसा था कि उसके कारण नदियां विभिन्न दिशाओं में बहती थीं। उसने लिखा है कि बंजारी ग्राम में दक्षिण-पश्चिम में बाघ नदी बहती थी, जो बैनगंगा में मिलती थी और बैनगंगा गोदावरी में। पूर्व में भूरानाला शिवनाथ से मिलता था और शिवनाथ महानदी से मिल जाती थी।
नवागांव तथा चांदघेरी
इसके आगे वह पहले सघन वन के रास्ते से और फिर बिरले वन के रास्ते से गुजरा। उसने लिखा है कि यह रास्ता बहुत उबड़-खाबड़ था और उस पर इतने बोल्डर बिखरे पड़े थे कि अंधेरी रात में उस पर चलना कठिन था। यहां लेकी ने बाघ नदी के किनारे विश्राम किया। दो दिन के बाद वह नवागांव पहुंचा। जिसके पास उसने एक विशाल जलाशय देखा। उस जलाशय से उसने नहर भी निकली हुई देखी। जिनके द्वारा सिंचाई की जाती थी। नवागांव से दस मील आगे उसने चांदघेरी या सौघेरी नामक ग्राम देखा। उसने लिखा है कि कटक के बाद वह सबसे अधिक जनसंख्या वाला ग्राम था। ग्राम में एक किला और एक बड़ा तालाब था।
भोंसले की ओर से स्वागत
इन गांव के आगे, छिलबन नदी के किनारे यात्रियों ने डेरा डाला। यहां नागपुर के भोंसले राजा की ओर से शेख मुहम्मद अली ने यात्रियों का स्वागत किया। मुहम्मद अली सदा ही अंग्रेजों की अगवानी करने के लिए भेजा जाता था क्योंकि वह बहुत विनम्र और व्यवहार कुशल था। 3 जून, 1770 को लेकी नागपुर पहुंच गया। रास्ते में उसे अनेक गांव मिले, जहां बहुत अच्छी खेती होती थी और स्थान-स्थान पर आम के बगीचे थे। लेकी ने नागपुर के भोंसले राजा का तथा नागपुर राज्य का विस्तार से वर्णन किया है।
उसने लिखा है कि वर्तमान राजा रघुजी भोंसले सादे, सफेद कपड़े पहनता है, परन्तु उसे हीरे और मोती पहनने का शौक है। उसे हाथी तथा घोडिय़ां पालने का भी बेहद शौक है। उसके पास करीब 200 हाथी हैं, जो कि बहुत उत्तम कोटि के हैं। वह करीब 10,000 घुड़सवार सैनिक रखता है। राजा के क्षेत्र से, जिसमें रतनपुर तथा कटक शामिल है, कुल आमदनी 70 लाख रुपए वार्षिक है।
रामटेक
लगभग 3 माह नागपुर रुकने के बाद लेकी 6 सितम्बर, 1790 को जबलपुर और विंध्यप्रदेश के रास्ते से बनारस के लिए रवाना हुआ। कन्हान नदी पार करके वह रामटेक पहुंचा, जहां उसने विश्राम किया। रास्ते में उसे ज्वार के लहलहाते खेत दिखे। उसने देखा कि लंका पर आक्रमण करने के पहले राम ने अपनी सेना रामटेक में एकत्र की थी। उसने लिखा है कि हिन्दू लोग यूरोपवासियों को रावणवंशी मानते हैं और उसका विश्वास है कि लंका में सोने का एक विशाल पहाड़ है। रामटेक में एक पहाड़ी पर मंदिर स्थित है, जहां हिन्दू पूजा करते है। रामटेक से आगे उसे घना जंगल मिला, जिसमें शीशम और सागौन के झाड़ थे।
डोंगरताल
डोंगरताल होता हुआ वह पैनेढोर गांव पहुंचा। इस गांव की घटना का उसने रोचक वर्णन किया है। उसने लिखा है कि जब वह एक पेड़ के नीचे बैठकर नाश्ता कर रहा था तो एक 80 साल का बूढ़ा आदमी उसके पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा कि ‘‘मेरी बहु बहुत बीमार है और गांव का कोई वैद्य उसकी बीमारी समझ नहीं पाया’’ इसलिए उसने लेकी से दवा देने की प्रार्थना की। लेकी ने उसके समझाने की कोशिश की कि वह दवा के मामले में कुछ भी नहीं जानता, परन्तु वह इतना पीछे पड़ गया कि लेकी को उसकी बहू को बुलाना पड़ा। लेकी ने देखा तो वह छोटी उम्र में अत्यंत सुंदर लडक़ी थी और दर्द से कराह रही थी। लेकी ने अपने पास से तीस गोलियां दीं और कहा कि रोज रात को दो गोलियां दी जाएं। फिर लेकी ने भगवान से प्रार्थना की कि वह लडक़ी अच्छी हो जाए, यद्यपि दवा के मामले में अपनी अज्ञानता के कारण उसे कोई फायदा होने की उम्मीद नहीं थी।
नरैला, सिवनी चोपड़ा
अंग्रेज यात्री ने नागपुर-जबलपुर मार्ग पर आगे बढ़ते हुए वर्तमान सिवनी जिले के अनेक स्थानों की यात्रा की। सिवनी से 11 मील नरैला नामक ग्राम में उसने पड़ाव डाला। नरैला में उसने स्वच्छ पानी का एक तालाब देखा। सडक़ के दोनों ओर पर्वत श्रृंखलाएं हैं। रास्ता यद्यपि मैदानी है, परन्तु पथरीला होने के कारण वहां खेती नहीं की जाती। नरैला से लेकी सिवनी चोपड़ा पहुंचा। उसके आसपास खेती होती है। यहां उसने वैनगंगा नदी पार की और चोपड़ा गांव के दूसरी ओर एक मैदान में पड़ाव डाला। उसने लिखा है कि वह स्थान लोहा बनाने के लिए प्रसिद्ध है। लोहा तैयार करने का कार्य मुख्यत: यहां के अफगान निवासी करते हैं और वह अंग्रेज शासित इलाकों को निर्यात किया जाता है।
लेकी ने लिखा है कि डोंगरताल से लेकर लखनादोन के पास तक का इलाका मोहम्मद उम्मे खां पठान की जागीर के अंतर्गत था। उम्मे खां सिवनी में निवास करता था। पठानों ने गोंडवाना और बरार (अब विदर्भ) के उत्तरी इलाकों पर आधिपत्य स्थापित करने में रघुजी भोंसले की सहायता की थी। अत: रघुजी ने प्रसन्न होकर उम्मे खां के पिता को यह जागीर प्रदान की थी। लेकी लिखता है कि उम्मे खां भोंसले राज्य की परवाह नहीं करता था, क्योंकि भोंसले ने लेकी की सहायता करने का जो परवाना दिया था उसके बाद भी जब उम्मे खां ने वैसा ही परवाना जारी किया तब ही लोगों ने यात्रा में उसकी सहायता की।
धूमा ग्राम
लखनादोन से चार मील दक्षिण में धूमा ग्राम में लेकी रुका। यहां उसे शेर नदी मिली जो नागपुर-जबलपुर सडक़ को काटती है। लेकी ने लिखा है कि शेर नदी भोंसले और बाला जी के राज्यों की सीमा रेखा बनाती है। धूमा में लेकी को पठानों का एक दल मिला जो जबलपुर से  बाला जी ने गोंडों के उपद्रव को दबाने के लिए भेजा था। पानी गिरने के कारण सडक़ कीचड़ से भर गई थी इसलिए यात्रियों को चलने में अत्यधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा था।
रामछोर ग्राम
यात्रियों के तंबू गीले थे और कीचड़ से भर गए थे इसलिए लेकी को अपने दल के साथ रामछोर नामक गांव में विश्राम करना पड़ा। यहां मोदी अर्थात अनाज के व्यापारियों ने यात्रियों के ठहरने के लिए मकान बना रखे थे। लेकी लिखता है कि मोदी, यात्रियों को इस शर्त पर मकान में ठहरने की सुविधा देता था कि अनाज उसी से खरीदा जाए। इसी कारण वह अनाज महंगा बेचता था। पठान दल के जमादार ने लेकी पर मेहरबानी की। उसने लेकी के साथ तीन सिपाही कर दिये जो उसे जबलपुर तक भेजने में बहुत सहायक सिद्ध हुए। वे तीनों सिपाही बुंदेलखंडी थे और उनमें से एक इतने जोर से और मधुर कंठ से गाता था कि एक मील तक उसकी आवाज सुनी जा सकती थी।
गढ़ा
जबलपुर, जिसे लेकी ‘जबिलघर’ कहता है, के निकट पहुंचने पर उसने तिलवारा घाट पर नर्मदा पार की। यहां घाट के किनारे एक बहुत अच्छी सराय में ठहराया गया, जो कि बालाजी के आदेश पर यात्रियों के लिए बनवाई गई थी। तिलवारा घाट से आगे उसने बड़ी-बड़ी चट्टानें देखीं। वह गढ़ा होता हुआ गुजरा। उसने लिखा है कि गढ़ा एक प्राचीन नगर था, यहां एक टकसाल स्थापित थी। टकसाल में बल्लाशाही रुपया ढाला जाता था। बुंदेलखंड में उस रुपए का चलन था। गढ़ा और जबलपुर के बीच की सडक़ें बहुत अच्छी हालत में थीं। लेकी ने जबलपुर में एक तालाब के किनारे पड़ाव डाला।
जबलपुर
जबलपुर में लेकी पहाड़ी पर निवास करने वाले एक सिद्ध अथवा बैरागी से मिला। बैरागी ने तीन वर्ष तक एक गुफा में निवास किया था और उसने अधिकांश भारत की यात्रा की थी। बैरागी अंग्रेजी भी जानता था। लेकी को उसने आदर सहित बैठाया। उसने बैरागी को चार रुपए भेंट किए। बालाजी के अमील, गणेश पंडित ने लेकी से भेंट की। लेकी ने उसे एक पगड़ी, कुछ कागज, दो पेंसिल और पान भेंट किया।
उसने लिखा है कि कागज, पेंसिल पाकर भारतीय बहुत प्रसन्न होते हैं। यहां से आधारताल, परियट नदी, पनागर, भूरागढ़ तथा गोसलपुर होता हुआ लेकी सिहोरा पहुंचा। भूरागढ़ में उसने एक बड़ी झील के किनारे डेरा डाला। उसने लिखा कि भूरागढ़ के उत्तर-पश्चिम में स्थित पहाडिय़ों में लौह अयस्क होता है।
गोसलपुर, सिहोरा, बिलहरी
लेकी लिखता है कि गोसलपुर एक बड़ा और स्वच्छ नगर है। गोसलपुर से आगे हिरन नदी पार कर यात्री ने सिहोरा में विश्राम किया। वह लिखता है कि सोहारा बहुत बड़ा ग्राम है, जहां बहुत अच्छा आम का बगीचा है। बाघ और कटनी नदी पार करते हुए लेकी बिलहरी पहुंचा। वह लिखता है कि बिलहरी एक प्राचीन स्थान है, जहां एक गोंड किला है। मराठों ने उसकी मरम्मत करवा ली है।
लेकी ने लिखा है कि बालाजी का राज्य कालपी से, जहां तक निवास करता है, नर्मदा के 35 मील दक्षिण तक फैला है। उसका पुत्र अप्पा साहिब सागर में निवास करता है। जब चुनारगढ़ के रास्ते पर वह आगे बढ़ा तो चौरा ग्राम के पास उसे एक बुंदेला किला मिला। यहां के जमींदार ने लेकी का हाथी पकड़ लिया। उसको शक था कि लेकी के पास बहुत मुहरें हैं। अत: हाथी छोडऩे के लिए उससे 4,000 रुपयों की मांग की गई। बड़ी मुश्किल से 100 रुपए लेकर यात्रियों का हाथी और सामान वापस किया गया। लेकी ने लोगों के इस दुव्र्यवहार की कड़ी आलोचना की है।
रीवा नगर
अपनी यात्रा के दौरान लेकी पहले अमरपाटने और फिर रीवा में रुका। रीवा के राजा अजीत सिंह ने अपने दीवान को उससे मिलने भेजा और उसकी सब आवश्यकताएं पूरी करने का वचन दिया। दूसरे दिन राजा ने भेंट के लिए 20 रुपए के साथ ब्राह्मण भेजा और उसके बाद स्वयं मिलने आया। लेकी ने राजा को छह गज रंगीन कपड़ा, कीमखाब का एक टुकड़ा, मलमल तथा इत्र और पान भेंट किए। लेकी ने लिखा है कि राजा ने सारा राज्य अपने जागीरदारों में बांट दिया है। इससे राज्य की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है और राजा कर्ज में डूबा हुआ है, परन्तु इसके बावजूद रियाया पर कोई जोर-जुल्म नहीं कर सकता। अत: जनता उसे प्यार करती है। राजा किले में रहता है जिसके नीचे बिछिया और बेहर नदियां बहती है। बाद में लेकी 5 अक्टूबर, 1790 को राजा से मिलने किले गया। किले का अधिकांश भाग उसके देखने के लिए खोल दिया गया। राजा ने उसे रेशम, मलमल के कपड़े आदि भेंट किए। लौटकर लेकी ने राजा के पुत्र के लिए सोने का काम की हुई पगड़ी तथा जवाहरातों से मढ़ा हुआ एक आईना भेंट किया। राजा ने अपने इलाके के जमींदारों को आदेश दिया कि उसको रास्ते में परेशान न किया जाए। उसने अपने दो हरकारे भी लेकी के साथ कर दिये। इस प्रकार लेकी बघेलखण्ड होता हुआ, सुहागी घाट से बनारस की ओर चला गया।